MLC Election: हाल ही में चार राज्यों में विधान परिषद की 28 सीटों पर चुनाव हुए हैं। इन चुनावों के नतीजों के बाद एमएलसी यानी विधान परिषद सदस्यों की भूमिका एक बार फिर चर्चा में आ गई है। ऐसे में लोगों के मन में कई सवाल हैं कि एमएलसी कौन होते हैं, उनका चुनाव कैसे किया जाता है और उनके पास क्या अधिकार होते हैं? इसके अलावा, उन्हें हर महीने कितना वेतन मिलता है और सरकार की ओर से कौन-कौन सी सुविधाएं दी जाती हैं? आइए आसान भाषा में इन सभी सवालों के जवाब जानते हैं।
MLC Election: चार राज्यों में विधान परिषद चुनाव के नतीजे
हाल ही में उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक में विधान परिषद की 28 सीटों पर चुनाव हुए। उत्तर प्रदेश में 11 सीटों पर हुए चुनाव में भाजपा ने 6 सीटें जीतीं, जबकि समाजवादी पार्टी को 5 सीटों पर जीत मिली। बिहार की 8 सीटों में से भाजपा और जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के गठबंधन ने 4 सीटें हासिल कीं। दरभंगा शिक्षक सीट पर जनसुराज के उम्मीदवार ने जीत दर्ज की। वहीं, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) को 1 और निर्दलीय उम्मीदवारों को 2 सीटें मिलीं।महाराष्ट्र में विधान परिषद की 5 सीटों में से विपक्षी महा विकास आघाड़ी (एमवीए) ने 3 और सत्तारूढ़ महायुति ने 2 सीटें जीतीं। नागपुर सीट पर कांग्रेस ने फिर से जीत हासिल की। नागपुर को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का गढ़ माना जाता है। वहीं, कर्नाटक में भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) के गठबंधन ने सभी 4 सीटों पर कब्जा किया। राज्य की सत्तारूढ़ कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली।
एमएलसी कौन होते हैं?
एमएलसी का पूरा नाम मेंबर ऑफ लेजिस्लेटिव काउंसिल (Member of Legislative Council) है। हिंदी में इन्हें विधान परिषद सदस्य कहा जाता है। विधान परिषद राज्य के विधानमंडल का उच्च सदन होती है। जिन राज्यों में विधान परिषद मौजूद है, वहां दो सदनों वाली व्यवस्था लागू होती है। इसमें विधानसभा को निचला सदन और विधान परिषद को उच्च सदन कहा जाता है। एमएलसी राज्य में कानून बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं और अलग-अलग मुद्दों पर सदन में अपनी बात रखते हैं।
MLC Election: विधान परिषद बनाने का क्या प्रावधान है?
देश के हर राज्य में विधान परिषद होना जरूरी नहीं है। किसी राज्य में विधान परिषद का गठन करना है या नहीं, इसका फैसला संविधान में तय प्रक्रिया के अनुसार होता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 169 में किसी राज्य में विधान परिषद बनाने या पहले से मौजूद परिषद को समाप्त करने का प्रावधान दिया गया है।इसके तहत सबसे पहले राज्य विधानसभा को विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित करना होता है। इसके बाद संसद कानून बनाकर उस राज्य में विधान परिषद का गठन कर सकती है या उसे समाप्त कर सकती है। वर्तमान में देश के 6 राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में विधान परिषद मौजूद है।
विधान परिषद में कितने सदस्य होते हैं और चुनाव कैसे होता है?
संविधान के अनुसार, किसी राज्य की विधान परिषद में कम से कम 40 सदस्य होने चाहिए। वहीं, सदस्यों की अधिकतम संख्या उस राज्य की विधानसभा के कुल सदस्यों की संख्या के एक-तिहाई तक हो सकती है। अलग-अलग राज्यों में विधान परिषद के सदस्यों की संख्या अलग होती है। इनके चुनाव में अलग-अलग वर्गों को प्रतिनिधित्व दिया जाता है।
विधान परिषद के कुल सदस्यों में से एक-तिहाई का चुनाव स्थानीय निकायों जैसे जिला परिषद और नगरपालिकाओं के प्रतिनिधि करते हैं। एक-तिहाई सदस्यों को राज्य विधानसभा के विधायक चुनते हैं। इसके अलावा, एक-बारहवां हिस्सा स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों से और एक-बारहवां हिस्सा माध्यमिक स्कूलों, कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों के शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों से चुना जाता है। वहीं, कुल सदस्यों में से एक-छठा हिस्सा राज्यपाल मनोनीत करते हैं। इनमें कला, विज्ञान, साहित्य, समाज सेवा और सहकारिता आंदोलन जैसे क्षेत्रों में विशेष योगदान देने वाले लोगों को जगह दी जा सकती है। इस व्यवस्था के जरिए विधान परिषद में स्थानीय निकायों, शिक्षकों, स्नातकों और विभिन्न क्षेत्रों में योगदान देने वाले लोगों को प्रतिनिधित्व मिलता है।
MLC Election: एमएलसी बनने के लिए क्या योग्यता होनी चाहिए?
विधान परिषद का सदस्य बनने के लिए उम्मीदवार का भारत का नागरिक होना जरूरी है। उसकी उम्र कम से कम 30 साल होनी चाहिए। इसके साथ ही उसे संसद की ओर से बनाए गए कानूनों के तहत निर्धारित अन्य योग्यताएं भी पूरी करनी होती हैं। उम्मीदवार संबंधित राज्य के किसी विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र का मतदाता होना चाहिए। इसके अलावा, कोई व्यक्ति एक ही समय में सांसद और विधायक नहीं हो सकता।
एमएलसी का कार्यकाल कितने साल का होता है?
विधान परिषद एक स्थायी सदन है। इसे विधानसभा की तरह भंग नहीं किया जा सकता। इसके प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल 6 साल का होता है। हालांकि, सभी सदस्यों का कार्यकाल एक साथ समाप्त नहीं होता। हर 2 साल में एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त हो जाते हैं और खाली हुई सीटों को भरने के लिए चुनाव कराए जाते हैं।विधान परिषद की बैठकों की अध्यक्षता सभापति करते हैं। उनकी अनुपस्थिति में उपसभापति सदन की कार्यवाही संभालते हैं। सभापति और उपसभापति का चुनाव विधान परिषद के सदस्य अपने बीच से करते हैं।
MLC Election: विधान परिषद के अधिकार और काम क्या हैं?
एमएलसी राज्य में कानून बनाने की प्रक्रिया में हिस्सा लेते हैं। वे राज्य से जुड़े अलग-अलग मुद्दों पर चर्चा कर सकते हैं और सरकार के मंत्रियों से सवाल पूछ सकते हैं। राज्य सूची और समवर्ती सूची के विषयों से जुड़े सामान्य विधेयक विधान परिषद में पेश किए जा सकते हैं। परिषद के सदस्य इन पर चर्चा करते हैं और विधायी प्रक्रिया में अपनी राय रखते हैं।हालांकि, धन विधेयक यानी मनी बिल के मामले में विधान परिषद के अधिकार सीमित हैं। मनी बिल केवल विधानसभा में पेश किया जा सकता है। विधानसभा से पारित होने के बाद इसे विधान परिषद के पास भेजा जाता है। परिषद को 14 दिनों के भीतर इसे वापस करना होता है। अगर इस अवधि में विधेयक वापस नहीं किया जाता, तो इसे दोनों सदनों से पारित माना जाता है।
इसके अलावा, एमएलसी राज्य सरकार के मंत्रियों से अलग-अलग मुद्दों पर सवाल पूछ सकते हैं और उनके खिलाफ प्रस्ताव भी ला सकते हैं। लेकिन विधान परिषद सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित नहीं कर सकती। संविधान संशोधन के मामलों में राज्य विधानमंडल की भूमिका संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर तय होती है।कुल मिलाकर, विधान परिषद कानून बनाने और सरकार के कामकाज पर चर्चा करने में अहम भूमिका निभाती है, लेकिन इसकी शक्तियां विधानसभा से कम होती हैं। खासकर धन विधेयक के मामले में विधानसभा को अधिक अधिकार दिए गए हैं। इसी वजह से समय-समय पर विधान परिषद की उपयोगिता और अधिकारों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। इसकी तुलना संसद के उच्च सदन राज्यसभा से भी की जाती है, लेकिन दोनों की संवैधानिक शक्तियां एक जैसी नहीं हैं।
क्या एमएलसी मुख्यमंत्री या मंत्री बन सकता है?
हां, विधान परिषद का सदस्य मुख्यमंत्री या राज्य सरकार में मंत्री बन सकता है। इसके लिए विधानसभा का सदस्य होना जरूरी नहीं है। संविधान के तहत विधान परिषद के सदस्य को भी मुख्यमंत्री या मंत्री बनने का अधिकार दिया गया है।

MLC Election: एमएलसी को कितना वेतन मिलता है?
एमएलसी को मिलने वाला वेतन सभी राज्यों में एक जैसा नहीं होता। हर राज्य अपने कानूनों और नियमों के अनुसार विधान परिषद के सदस्यों का वेतन, भत्ते और दूसरी सुविधाएं तय करता है। इसलिए उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में एमएलसी को मिलने वाली राशि अलग-अलग हो सकती है।उत्तर प्रदेश में एमएलसी के वेतन, भत्ते और पेंशन से जुड़े नियमों में साल 2025 में संशोधन किया गया था। उत्तर प्रदेश राज्य विधानमंडल सदस्य व मंत्री सुख-सुविधा विधि (संशोधन) अधिनियम, 2025 के तहत ये बदलाव 1 अप्रैल 2025 से प्रभावी माने गए हैं।
उत्तर प्रदेश में एमएलसी को कितना वेतन और भत्ता मिलता है?
उत्तर प्रदेश में विधान परिषद के सदस्यों को मूल वेतन के साथ निर्वाचन क्षेत्र भत्ता और सचिवीय भत्ता दिया जाता है। इसके अलावा, निर्धारित नियमों और पात्रता के अनुसार उन्हें दैनिक भत्ता, दौरा भत्ता और चिकित्सा सुविधा के बदले राशि भी मिलती है।उत्तर प्रदेश में एमएलसी का मूल वेतन 35,000 रुपये प्रति माह है। इसके साथ 75,000 रुपये निर्वाचन क्षेत्र भत्ता और 30,000 रुपये सचिवीय भत्ता दिया जाता है। इस तरह इन तीनों को मिलाकर हर महीने कुल 1.40 लाख रुपये मिलते हैं। इसके अलावा, सदन या समिति की बैठक में शामिल होने पर प्रत्येक पात्र दिन के लिए 2,500 रुपये दैनिक भत्ता मिलता है। जनसेवा से जुड़े कामों के लिए निर्धारित शर्तों के तहत प्रत्येक पात्र दिन पर 2,000 रुपये दौरा भत्ता दिया जाता है। वहीं, बाह्य रोगी चिकित्सा सुविधा के बदले 45,000 रुपये प्रति माह की राशि का प्रावधान है।नियमों के मुताबिक, वेतन और दैनिक भत्तों में हर 5 साल में लागत-मुद्रास्फीति सूचकांक के आधार पर संशोधन करने का प्रावधान भी है।
MLC Election: एमएलसी को वेतन के अलावा कौन-कौन सी सुविधाएं मिलती हैं?
उत्तर प्रदेश में एमएलसी को वेतन और भत्तों के अलावा यात्रा तथा अन्य खर्चों के लिए भी कई सुविधाएं दी जाती हैं। सदस्यों को एक साल में अधिकतम 5 लाख रुपये तक के रेल यात्रा कूपन मिल सकते हैं। वहीं, पूर्व एमएलसी के लिए रेल कूपन की सालाना सीमा 1.5 लाख रुपये तय की गई है।निर्धारित शर्तों के तहत सदस्य रेल कूपन के बदले हवाई यात्रा कूपन लेने या हवाई यात्रा के किराये की भरपाई कराने का विकल्प भी चुन सकते हैं। निजी वाहन के ईंधन खर्च के मामले में संशोधन के बाद पहले से तय 25,000 रुपये की राशि के स्थान पर सदस्य की ओर से चुनी गई राशि का प्रावधान किया गया है। पूर्व एमएलसी के लिए ईंधन खर्च के बदले नकद राशि लेने की सालाना सीमा 1 लाख रुपये है। इसके अलावा, अगर कोई सदस्य अपने रेल कूपन का इस्तेमाल नहीं करता है, तो निर्धारित प्रक्रिया के तहत कूपन वापस करने पर उसके बराबर राशि नकद दी जा सकती है।
पूर्व एमएलसी को कितनी पेंशन मिलती है?
उत्तर प्रदेश में विधान परिषद के पूर्व सदस्यों को जीवनभर पेंशन देने का प्रावधान है। साल 2025 में हुए संशोधन के बाद उनकी मूल पेंशन बढ़ाकर 35,000 रुपये प्रति माह कर दी गई है। इसके अलावा, अगर किसी सदस्य ने अपना पहला पूरा 6 साल का कार्यकाल पूरा किया है, तो उसे 2,000 रुपये प्रति माह अतिरिक्त पेंशन मिलती है। इस तरह उसकी कुल पेंशन 37,000 रुपये प्रति माह हो जाती है।अगर किसी पूर्व सदस्य ने एक कार्यकाल से अधिक समय तक सेवा की है, तो एक कार्यकाल से ज्यादा की सेवा के प्रत्येक पूरे साल के लिए 2,000 रुपये प्रति माह अतिरिक्त पेंशन देने का प्रावधान है। वहीं, अगर किसी सदस्य ने 6 महीने या उससे अधिक, लेकिन 1 साल से कम समय तक सेवा की है, तो पेंशन की गणना के लिए उसे 1 साल की सेवा माना जाता है। इसके अलावा, अगर कोई पूर्व एमएलसी किसी दूसरी पेंशन का भी पात्र है, तो कानून के प्रावधानों के अनुसार उसे एमएलसी की पेंशन के साथ दूसरी पेंशन भी मिल सकती है।
MLC Election: एमएलसी की मृत्यु के बाद परिवार को कितनी पेंशन मिलती है?
अगर किसी मौजूदा या पूर्व एमएलसी की मृत्यु हो जाती है, तो निर्धारित नियमों और शर्तों के अनुसार उसके परिवार को भी पेंशन का लाभ मिल सकता है। इसके तहत पात्र पति या पत्नी को परिवार पेंशन दी जा सकती है। अगर पति या पत्नी जीवित नहीं हैं, तो पात्र नाबालिग बच्चों या अविवाहित बेटियों को इसका लाभ मिल सकता है।परिवार पेंशन की राशि सदस्य की मृत्यु के समय लागू पेंशन या 30,000 रुपये प्रति माह में से जो भी अधिक होगी, उसके बराबर हो सकती है। अगर एक से ज्यादा लोग परिवार पेंशन पाने के पात्र हैं, तो कुल राशि उनके बीच बराबर हिस्सों में बांटी जाती है।








