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परीक्षा के नतीजों से बच्चों पर नहीं बनेगा दबाव, मानसिक सेहत को लेकर गुजरात सरकार का नया कदम

छात्रों की मानसिक सेहत के लिए गुजरात सरकार का फैसला
छात्रों की मानसिक सेहत के लिए गुजरात सरकार का फैसला

Student Mental Health: गुजरात सरकार ने स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की मानसिक सेहत को ध्यान में रखते हुए नए नियम लागू किए हैं। अब राज्य के माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूलों को विद्यार्थियों की मानसिक परेशानियों को गंभीरता से लेना होगा। इसके लिए स्कूलों में काउंसलर की व्यवस्था, वेलनेस टीम का गठन और शिक्षकों को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी ट्रेनिंग देना अनिवार्य किया गया है। ये नियम कक्षा 9 से 12 तक के विद्यार्थियों पर लागू होंगे। जिन स्कूलों में 100 या उससे अधिक विद्यार्थी हैं, वहां कम से कम एक योग्य काउंसलर रखना जरूरी होगा। इसके अलावा, परीक्षा में कम अंक आने पर किसी बच्चे को दूसरे विद्यार्थियों से अलग नहीं बैठाया जा सकेगा और न ही पूरी कक्षा के सामने उसका मजाक उड़ाया जा सकेगा।

सरकार का मानना है कि पढ़ाई का दबाव, परीक्षा में अच्छे नंबर लाने की चिंता, परिवार की उम्मीदें और भविष्य को लेकर होने वाली परेशानियां बच्चों की मानसिक सेहत पर असर डालती हैं। ऐसे में स्कूलों की जिम्मेदारी केवल पढ़ाई कराने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उन्हें विद्यार्थियों की भावनात्मक और मानसिक स्थिति का भी ध्यान रखना होगा।

Student Mental Health: किन स्कूलों पर लागू होंगे नए नियम?

गुजरात सरकार ने गुजरात सेकेंडरी एंड हायर सेकेंडरी एजुकेशन रेगुलेशंस, 1974 में बदलाव करते हुए नए प्रावधान जोड़े हैं। ये नियम गुजरात माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (GSHSEB) से जुड़े स्कूलों में लागू होंगे। इनके दायरे में कक्षा 9 से 12 तक के विद्यार्थियों को रखा गया है। नए नियमों के तहत हर स्कूल में वेलनेस टीम बनाना, काउंसलर की व्यवस्था करना और शिक्षकों के साथ दूसरे कर्मचारियों को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी ट्रेनिंग देना जरूरी होगा। इसके अलावा, किसी विद्यार्थी के आत्महत्या करने या खुद को नुकसान पहुंचाने का खतरा होने पर स्कूल को तुरंत मदद उपलब्ध करानी होगी।

हर स्कूल में बनेगी वेलनेस टीम

नए नियमों के अनुसार, प्रत्येक स्कूल को नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में स्कूल वेलनेस टीम बनानी होगी। इस टीम के काम की हर साल समीक्षा भी की जाएगी। इसमें स्कूल के प्रिंसिपल, एक काउंसलर या जिम्मेदारी संभालने वाला शिक्षक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विभाग के एक-एक शिक्षक, स्कूल मैनेजमेंट कमेटी का एक सदस्य, एक गैर-शिक्षण कर्मचारी और दो विद्यार्थी शामिल होंगे।वेलनेस टीम का मुख्य काम बच्चों के व्यवहार और मानसिक स्थिति पर ध्यान देना होगा। अगर कोई विद्यार्थी लगातार उदास रहता है, अकेले रहने लगता है, पढ़ाई को लेकर बहुत तनाव में है या उसके व्यवहार में अचानक बदलाव दिखाई देता है, तो टीम उसकी परेशानी समझने की कोशिश करेगी। जरूरत पड़ने पर उसे काउंसलर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सहायता भी दिलाई जाएगी।

Student Mental Health: 100 या उससे ज्यादा विद्यार्थी होने पर काउंसलर जरूरी

सरकार ने स्कूलों में काउंसलर की व्यवस्था विद्यार्थियों की संख्या के आधार पर तय की है। जिन स्कूलों में 100 या उससे अधिक विद्यार्थी पढ़ते हैं, वहां कम से कम एक योग्य काउंसलर, मनोवैज्ञानिक या सोशल वर्कर रखना अनिवार्य होगा। संबंधित व्यक्ति को बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी ट्रेनिंग मिली होनी चाहिए।वहीं, 100 से कम विद्यार्थी वाले स्कूलों को बाहरी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से संपर्क की व्यवस्था करनी होगी। जरूरत पड़ने पर वे नजदीकी सरकारी स्वास्थ्य केंद्र से भी सहायता ले सकेंगे। इसके अलावा स्कूल जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम और टेली-मानस सेवा का भी इस्तेमाल कर सकेंगे।

क्या है मनो-मित्र पहल?

कई बार बच्चे अपनी परेशानियां माता-पिता या शिक्षकों को बताने में झिझकते हैं, लेकिन अपने दोस्तों से बात करना उन्हें आसान लगता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए सरकार ने मनो-मित्र (Mano-Mitra) पहल शुरू की है। इसके तहत हर स्कूल की वेलनेस टीम में दो विद्यार्थियों को शामिल किया जाएगा। ये विद्यार्थी अपने साथियों की बातें सुनेंगे और उन्हें शुरुआती भावनात्मक सहायता देंगे।अगर किसी बच्चे की परेशानी गंभीर है, तो मनो-मित्र उसे स्कूल के काउंसलर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से बात करने के लिए प्रोत्साहित करेंगे। हालांकि, उनकी भूमिका शुरुआती मदद तक ही सीमित रहेगी। वे किसी पेशेवर काउंसलर की जगह नहीं लेंगे।

Student Mental Health: परीक्षा और रिजल्ट के समय बच्चों को मिलेगी अतिरिक्त मदद

बोर्ड परीक्षाओं के समय विद्यार्थियों पर अच्छे अंक लाने का दबाव बढ़ जाता है। वहीं, रिजल्ट आने से पहले कम नंबर मिलने की चिंता भी कई बच्चों को परेशान करती है। इसे देखते हुए सरकार ने स्कूलों को ऐसे समय में अतिरिक्त काउंसलिंग और मार्गदर्शन की व्यवस्था करने के निर्देश दिए हैं। खासतौर पर बोर्ड परीक्षा के दौरान, रिजल्ट आने के समय, कक्षा 8 से 9 में जाने और कक्षा 10 से 11 में प्रवेश के समय विद्यार्थियों को अधिक सहायता दी जाएगी।

कम नंबर आने पर बच्चों को नहीं किया जाएगा शर्मिंदा

नए नियमों में स्कूलों को साफ निर्देश दिया गया है कि वे परीक्षा के अंकों के आधार पर विद्यार्थियों को अलग-अलग समूहों में नहीं बांट सकेंगे। अगर किसी बच्चे के नंबर कम आते हैं, तो उसे पूरी कक्षा के सामने डांटना, उसका मजाक उड़ाना या दूसरे विद्यार्थियों से उसकी तुलना करना भी प्रतिबंधित होगा। स्कूलों को हर बच्चे के साथ सम्मान से पेश आना होगा। किसी विद्यार्थी को सिर्फ इसलिए कमतर नहीं समझा जा सकेगा, क्योंकि उसके नंबर दूसरे बच्चों से कम हैं।सरकार का उद्देश्य स्कूलों में ऐसा माहौल तैयार करना है, जहां बच्चे बिना डर के पढ़ सकें और अपनी कमजोरियों को सुधारने की कोशिश कर सकें। इसके साथ ही विद्यार्थियों को यह महसूस कराया जाएगा कि परीक्षा में कम अंक आने से उनकी योग्यता या क्षमता तय नहीं होती।

Student Mental Health: योग, खेल और संगीत जैसी गतिविधियों को मिलेगा बढ़ावा

विद्यार्थियों को पढ़ाई के तनाव से दूर रखने के लिए स्कूलों में योग, ध्यान, खेलकूद, संगीत, नृत्य, पेंटिंग और बागवानी जैसी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाएगा। इन गतिविधियों से बच्चों को पढ़ाई के अलावा अपनी पसंद के काम करने का मौका मिलेगा। इससे वे अपनी रुचि और प्रतिभा को भी पहचान सकेंगे।इसके अलावा, स्कूलों में शिकायत और सुझाव देने के लिए बॉक्स लगाए जाएंगे। चाइल्ड हेल्पलाइन और वेलनेस टीम के संपर्क नंबर भी ऐसी जगह लगाए जाएंगे, जहां विद्यार्थी उन्हें आसानी से देख सकें।

शिक्षकों को साल में दो बार मिलेगी ट्रेनिंग

बच्चों की मानसिक परेशानी को पहचानने की जिम्मेदारी केवल काउंसलर की नहीं होगी। स्कूल के सभी शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को भी इसके लिए तैयार किया जाएगा। नए नियमों के अनुसार, सभी कर्मचारियों को साल में कम से कम दो बार मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से ट्रेनिंग लेनी होगी।इस ट्रेनिंग में उन्हें बताया जाएगा कि बच्चों में तनाव के लक्षण कैसे पहचानें, आत्महत्या के खतरे को कैसे समझें और मानसिक संकट से गुजर रहे विद्यार्थी की मदद किस तरह करें। अगर कोई बच्चा खुद को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है या आत्महत्या जैसा कदम उठाता है, तो उसे किसी भी हालत में अकेला नहीं छोड़ा जाएगा। स्कूल को तुरंत मेडिकल या आपातकालीन सहायता उपलब्ध करानी होगी।

Student Mental Health: बच्चों की निजी जानकारी रखनी होगी गोपनीय

कई बार बच्चे इस डर से काउंसलर को अपनी परेशानी नहीं बताते कि उनकी निजी बातें दूसरे लोगों तक पहुंच जाएंगी। सरकार ने इस चिंता को भी ध्यान में रखा है। नए नियमों के तहत विद्यार्थियों की काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी गोपनीय रखनी होगी। उनकी निजी जानकारी या काउंसलिंग के रिकॉर्ड किसी अनधिकृत व्यक्ति के साथ साझा नहीं किए जा सकेंगे। जानकारी केवल उन्हीं लोगों को दी जा सकेगी, जिन्हें बच्चे की सुरक्षा, इलाज या देखभाल के लिए इसकी जरूरत होगी।

बुलिंग और भेदभाव की शिकायतों पर होगी कार्रवाई

स्कूलों को विद्यार्थियों की सुरक्षा के लिए शिकायत दर्ज कराने की गोपनीय व्यवस्था बनानी होगी। इसमें परेशान करने, मारपीट, बुलिंग, साइबर बुलिंग, रैगिंग और यौन उत्पीड़न से जुड़ी शिकायतें शामिल होंगी। इसके अलावा जाति, धर्म, भाषा, लिंग, आर्थिक स्थिति या दिव्यांगता के आधार पर किसी विद्यार्थी के साथ भेदभाव होने पर भी कार्रवाई करनी होगी।अगर स्कूल को किसी बच्चे की गंभीर परेशानी या खतरे की जानकारी होने के बावजूद समय पर जरूरी कदम नहीं उठाए जाते और इससे उसे नुकसान पहुंचता है, तो स्कूल की जवाबदेही तय की जा सकती है। ऐसे मामलों में लागू कानूनों के तहत कानूनी या अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जा सकती है।

Student Mental Health: जिला कलेक्टर करेंगे स्कूलों के काम की निगरानी

नए नियमों को सही तरीके से लागू कराने के लिए जिला स्तर पर एक निगरानी समिति बनाई जाएगी। इसकी अध्यक्षता जिला कलेक्टर करेंगे। यह समिति स्कूलों में नियमों के पालन की जांच करेगी और गंभीर घटनाओं व शिकायतों की समीक्षा करेगी। जरूरत पड़ने पर स्कूलों को व्यवस्था में सुधार करने के निर्देश भी दिए जाएंगे।इसके साथ ही स्कूलों को विद्यार्थियों के लिए करियर गाइडेंस की सुविधा भी उपलब्ध करानी होगी। इसके तहत बच्चों को उच्च शिक्षा, कौशल विकास, व्यावसायिक शिक्षा और अपना कारोबार शुरू करने जैसे विकल्पों की जानकारी दी जाएगी।

बच्चों की मानसिक सेहत को ध्यान में रखकर लिया गया फैसला

आज के समय में बच्चों पर पढ़ाई में अच्छे अंक लाने, प्रतियोगिता में आगे रहने और भविष्य को बेहतर बनाने का दबाव लगातार बढ़ रहा है। कई बार इस वजह से वे तनाव और अकेलेपन का सामना करते हैं, लेकिन अपनी परेशानी किसी से साझा नहीं कर पाते। गुजरात सरकार के नए नियमों का उद्देश्य ऐसे विद्यार्थियों को समय पर सहायता उपलब्ध कराना है। अब स्कूलों को केवल परीक्षा के नतीजों पर ध्यान देने के बजाय बच्चों की मानसिक सेहत, उनकी भावनाओं और समस्याओं को भी समझना होगा।