vote chori allegation: इंडिया गठबंधन की रामलीला मैदान रैली को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने तीखा हमला किया है कि ‘ये वोट बचाओ रैली नहीं, बल्कि घुसपैठिया बचाओ रैली थी।’ उन्होंने कहा कि कांग्रेस एसआईआर को रोककर देश की मतदाता सूची में बांग्लादेशी घुसपैठियों को बचाना चाहती है, लेकिन राहुल गांधी और कांग्रेस को जितना भी जोर लगाना है, लगाने दो, भाजपा एक-एक घुसपैठिए को मतदाता सूची और देश से बाहर निकालकर ही दम लेगी। उन्होंने कहा कि पूरी की पूरी कांग्रेस एंड कंपनी एसआईआर को रोकने में लगी है, क्योंकि ये घुसपैठिए उनका वोट बैंक हैं, लेकिन भाजपा एसआईआर के साथ मजबूती से खड़ी है।केंद्रीय गृह मंत्री ने राहुल गांधी और कांग्रेस को संसद के विशेष सत्र में ‘वोट चोरी’ और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के मुद्दों पर बहस करने की खुली चुनौती दी है।
दूध का दूध और पानी का पानी हो
अब यह कांग्रेस के रणनीतिकारों और विपक्ष के नेता राहुल गांधी पर निर्भर करता है कि वे गृह मंत्री अमित शाह की चुनौती को स्वीकार करें या नजरंदाज कर दें, लेकिन इसमें देखने वाली बात यह है कि गृह मंत्री ने दूसरी बार चुनौती दी है।यदि अब भी विपक्ष चुनौती स्वीकार नहीं करता है, तो सवाल उठ सकते हैं कि जब कांग्रेस और राहुल गांधी ‘वोट चोरी’ और ‘एसआईआर’ को लेकर ‘मॉक पार्लियामेंट’ का आयोजन कर सकते हैं, तो फिर उन्हें संसद के भीतर सीधी बहस से क्या दिक्कत है? कायदे से ऐसी बहस की चुनौती तो खुद विपक्ष की ओर से आनी चाहिए थी? क्या विपक्ष नहीं चाहता है कि संसद में बहस के माध्यम से देश के सामने दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए? क्या विपक्ष के पास संसद में बहस के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं? ये सवाल इसलिए भी जनता के दिलो-दिमाग में स्वाभाविक रूप से उठ सकते हैं कि खुद INDIA गठबंधन का मानना रहा है कि जब संसद के भीतर मुद्दों पर बहस का मौका न मिले या सरकार उनकी बात न सुने, तो जनता के बीच जाकर आवाज उठाना जरूरी हो जाता है।अब तो सरकार खुद बहस का अवसर दे रही है। फिर लोकतंत्र में रचनात्मक बहसें होती रहनी चाहिए।
vote chori allegation: बहस से क्या होगा?
हालांकि गृह मंत्री अमित शाह के बयान पर कांग्रेस की ओर से भी तीखी प्रतिक्रियाएं आने लगी हैं, लेकिन अभी तक आई इन प्रतिक्रियाओं से लगता नहीं कि कांग्रेस सदन में बहस की चुनौती स्वीकार करने के मूड में है।ऐसा लगता है कि संसद या किसी निर्धारित बहस में सत्तारूढ़ दल से सीधे उलझने के बजाय विपक्ष जनता के बीच आंदोलन और कानूनी मोर्चे पर अपना विरोध जारी रखना बेहतर समझता है।विपक्ष की रणनीति अपने हिसाब से उचित हो सकती है, लेकिन यदि सदन में विपक्ष अपने मुद्दों को मुखर और तार्किक ढंग से उठाए तो निश्चित ही जनता में इसका व्यापक प्रभाव होगा।फिर जनता में यह संदेश भी जाएगा कि विपक्ष इतना सक्षम है कि सत्ता पक्ष की किसी भी चुनौती का डटकर मुकाबला कर सकता है। देखना है कि राहुल गांधी अब क्या निर्णय लेते हैं?








