Home » राष्ट्रीय » ग्रीन पटाखे क्या हैं? दिवाली पर सुप्रीम कोर्ट ने दी मंजूरी, आम पटाखों से कितने अलग हैं?

ग्रीन पटाखे क्या हैं? दिवाली पर सुप्रीम कोर्ट ने दी मंजूरी, आम पटाखों से कितने अलग हैं?

दिवाली पर ग्रीन पटाखे जलाने के नियम जानें
दिवाली पर ग्रीन पटाखे जलाने के नियम जानें

Green Crackers Rules: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में दिवाली के मौके पर प्रमाणित ग्रीन पटाखे जलाने की अनुमति दे दी है। यह छूट 7 नवंबर को छोटी दिवाली और 8 नवंबर को दिवाली के दिन दी गई है। हालांकि, इसके लिए कुछ शर्तें भी तय की गई हैं। लोगों को निर्धारित समय के अंदर ही पटाखे जलाने की अनुमति होगी। इसके अलावा, पटाखों की खरीद और बिक्री को लेकर भी सख्त नियम लागू किए गए हैं।दिल्ली-एनसीआर में हर साल दिवाली के दौरान प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने त्योहार मनाने और पर्यावरण की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है। लेकिन सवाल यह है कि ग्रीन पटाखे क्या होते हैं? ये सामान्य पटाखों से कितने अलग हैं और इनसे प्रदूषण किस तरह कम होता है? साथ ही, इन्हें खरीदने और बेचने के लिए क्या नियम बनाए गए हैं? आइए जानते हैं।

Green Crackers Rules: ग्रीन पटाखों पर सुप्रीम कोर्ट का क्या है फैसला?

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली-एनसीआर में प्रमाणित ग्रीन पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल की अनुमति दी। हालांकि, यह छूट केवल तय समय और निर्धारित शर्तों के अनुसार ही मिलेगी। अदालत ने छोटी दिवाली और दिवाली के दिन पटाखे जलाने के लिए सुबह 6 बजे से 7 बजे और रात 8 बजे से 10 बजे तक का समय तय किया है। इन समयसीमाओं के खत्म होने के बाद पटाखे जलाने पर फिर से पूरी तरह प्रतिबंध लागू हो जाएगा।अदालत ने पटाखे जलाने के लिए कुछ जगहों को प्रतिबंधित क्षेत्र भी घोषित किया है। अस्पतालों, नर्सिंग होम, प्राथमिक और जिला स्वास्थ्य केंद्रों, वृद्धाश्रमों, शिक्षण संस्थानों और अधिसूचित शांत क्षेत्रों के 300 मीटर के दायरे में पटाखे जलाने की अनुमति नहीं होगी। संबंधित अधिकारियों को इन जगहों की पहचान करके जमीन पर चिह्नित करने और इन्हें ‘नो-क्रैकर जोन’ के रूप में घोषित करने का निर्देश दिया गया है। इन प्रतिबंधित क्षेत्रों की जानकारी आम लोगों को भी देनी होगी।

पटाखों की बिक्री और खरीद के लिए क्या नियम हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने ग्रीन पटाखों की बिक्री को लेकर भी सख्त निर्देश दिए हैं। इनके अनुसार, पटाखे केवल लाइसेंस प्राप्त दुकानदारों और जिला प्रशासन की ओर से निर्धारित बाजारों या स्थानों पर ही बेचे जा सकेंगे। ई-कॉमर्स वेबसाइट और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से पटाखों की बिक्री और डिलीवरी पर पूरी तरह रोक लगाई गई है। किसी वेबसाइट पर पटाखों की कीमत या उनकी जानकारी उपलब्ध होने का मतलब यह नहीं है कि उन्हें ऑनलाइन ऑर्डर करना कानूनी रूप से सही है।इसके अलावा, दिल्ली-एनसीआर में बाहर से पटाखे खरीदकर लाने पर भी प्रतिबंध रहेगा। ग्राहकों को अपने जिले और प्रशासन की ओर से निर्धारित बिक्री की तारीखों और स्वीकृत उत्पादों के नियमों का पालन करना होगा।

Green Crackers Rules: नियम तोड़ने पर क्या होगी कार्रवाई?

दिल्ली-एनसीआर में पटाखे बनाने वाली कंपनियों और कारोबारियों के लिए प्रशासन के पास सुरक्षा राशि जमा करना अनिवार्य किया गया है। अगर कोई निर्माता या विक्रेता अदालत के आदेशों और निर्धारित नियमों का उल्लंघन करता है, तो उसकी जमा राशि जब्त की जा सकती है। वहीं, किसी कंपनी के बनाए गए ग्रीन पटाखे नकली पाए जाने या तय मानकों का पालन नहीं करने पर उसका लाइसेंस रद्द किया जा सकता है।सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि सीमित समय के लिए प्रमाणित ग्रीन पटाखों के इस्तेमाल की अनुमति देकर त्योहार और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाया जा सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि दिल्ली-एनसीआर में बाहर से अवैध रूप से लाए जाने वाले पारंपरिक पटाखे ग्रीन पटाखों की तुलना में ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं।

ग्रीन पटाखे क्या होते हैं?

ग्रीन पटाखे कम प्रदूषण फैलाने वाले पटाखे होते हैं। इन्हें खास वैज्ञानिक तकनीक और रासायनिक फॉर्मूले के आधार पर तैयार किया जाता है, ताकि जलने के दौरान सामान्य पटाखों की तुलना में कम धुआं और हानिकारक गैसें निकलें। इनके विकास और प्रमाणन में वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-नीरी) की अहम भूमिका है।इन पटाखों को इस तरह बनाया जाता है कि इनसे निकलने वाले धूल के कण और प्रदूषण फैलाने वाली गैसों की मात्रा कम रहे। हालांकि, ग्रीन पटाखों का मतलब यह नहीं है कि इनसे बिल्कुल प्रदूषण नहीं होता। इनका उद्देश्य सामान्य पटाखों के मुकाबले प्रदूषण को कम करना है।

Green Crackers Rules: सामान्य पटाखे कैसे बनते हैं?

पारंपरिक पटाखे पुराने रासायनिक फॉर्मूले और अलग-अलग कच्चे पदार्थों की मदद से तैयार किए जाते हैं। जलने के बाद इनसे काफी मात्रा में धुआं, राख और छोटे प्रदूषणकारी कण निकलते हैं। इनमें पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे प्रदूषक भी शामिल होते हैं।सामान्य पटाखों में बेरियम, सीसा, आर्सेनिक और पारा जैसी भारी धातुओं का इस्तेमाल किया जाता है। इनके निर्माण में एल्युमिनियम की मात्रा भी काफी अधिक हो सकती है। इसके अलावा, रासायनिक प्रतिक्रिया के लिए पोटैशियम नाइट्रेट और सल्फर जैसे पदार्थों का इस्तेमाल होता है। पटाखे जलने पर इनसे सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसें निकलती हैं।पारंपरिक पटाखों का खोल भी आकार में बड़ा होता है और इन्हें बनाने में ज्यादा कच्चे माल का इस्तेमाल किया जाता है। इस वजह से इनके जलने के बाद काफी मात्रा में राख और दूसरे अवशेष बचते हैं, जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं।

सामान्य पटाखों से कितने अलग हैं ग्रीन पटाखे?

ग्रीन पटाखों को सामान्य पटाखों की तुलना में कम प्रदूषण फैलाने के उद्देश्य से तैयार किया जाता है। इनके निर्माण में कम कच्चे माल का इस्तेमाल होता है और इनका खोल भी छोटा रखा जाता है। इनमें राख का इस्तेमाल नहीं किया जाता, जिससे जलने के बाद निकलने वाले अवशेष कम रहते हैं।आवाज के मामले में भी ग्रीन पटाखे सामान्य पटाखों से अलग होते हैं। इनसे अपेक्षाकृत कम शोर होता है और ये नियंत्रित लौ के साथ कम समय तक जलते हैं। इनके स्वीकृत रासायनिक फॉर्मूले में बेरियम, सीसा, आर्सेनिक और पारा जैसी जहरीली भारी धातुएं शामिल नहीं होतीं। इसके अलावा, इनमें एल्युमिनियम की मात्रा भी काफी कम रखी जाती है।ग्रीन पटाखों के निर्माण के दौरान जिओलाइट और आयरन ऑक्साइड जैसे विशेष पदार्थ मिलाए जाते हैं। ये पदार्थ पटाखे जलने के दौरान निकलने वाले धूल और धुएं को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। इनके इस्तेमाल से पार्टिकुलेट मैटर का उत्सर्जन करीब 30 फीसदी तक कम हो सकता है। साथ ही, सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसों का उत्सर्जन भी कम होता है।

Green Crackers Rules: सुप्रीम कोर्ट ने ग्रीन पटाखों पर क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने ग्रीन पटाखों पर क्या कहा?
Green Crackers Rules: ग्रीन पटाखों की पहचान कैसे करें?

बाजार में असली ग्रीन पटाखों की पहचान करना भी जरूरी है। केवल किसी पैकेट पर ग्रीन, ईको फ्रेंडली या प्रदूषण मुक्त लिखे होने से वह प्रमाणित ग्रीन पटाखा नहीं बन जाता। ग्राहकों को खरीदारी करते समय पैकेट पर दी गई जानकारी और प्रमाणन की जांच करनी चाहिए।असली ग्रीन पटाखों के पैकेट पर निर्माता कंपनी का नाम, पंजीकरण संख्या और पेट्रोलियम एवं विस्फोटक सुरक्षा संगठन (पीईएसओ) के लाइसेंस की जानकारी होनी चाहिए। इसके अलावा, पैकेट पर आधिकारिक ग्रीन क्रैकर का लोगो और उत्पाद से जुड़ा क्यूआर कोड भी होना जरूरी है। क्यूआर कोड स्कैन करके निर्माता और उत्पाद से संबंधित जानकारी की पुष्टि की जा सकती है।

ग्रीन पटाखों के निर्माण के लिए क्या हैं नियम?

ग्रीन पटाखों की गुणवत्ता और प्रमाणिकता बनाए रखने के लिए इनके निर्माण की प्रक्रिया भी निर्धारित की गई है। इन्हें बनाने का काम केवल वही कंपनियां कर सकती हैं, जो सीएसआईआर-नीरी के साथ पंजीकृत हैं। इसके साथ ही निर्माताओं के लिए पेट्रोलियम और विस्फोटक सुरक्षा संगठन (पीईएसओ) से लाइसेंस लेना अनिवार्य है।निर्माण के बाद हर पैकेट पर आधिकारिक ग्रीन क्रैकर का लोगो और प्रमाणन से जुड़ा क्यूआर कोड लगाना जरूरी है। इन नियमों का उद्देश्य नकली ग्रीन पटाखों की बिक्री रोकना और ग्राहकों तक निर्धारित मानकों वाले उत्पाद पहुंचाना है।

Green Crackers Rules: किन फॉर्मूलों से तैयार किए जाते हैं ग्रीन पटाखे?

ग्रीन पटाखों को कम प्रदूषण फैलाने के उद्देश्य से अलग-अलग वैज्ञानिक फॉर्मूलों के आधार पर विकसित किया गया है। इनमें सेव वॉटर रिलीजर, सेफ थर्माइट क्रैकर और सेफ मिनिमल एल्युमिनियम प्रमुख हैं।

सेव वॉटर रिलीजर: इस तरह के पटाखे फूटने के दौरान जलवाष्प यानी पानी की बेहद छोटी बूंदें छोड़ते हैं। ये बूंदें हवा में मौजूद धूल और प्रदूषण फैलाने वाले छोटे कणों को अपने साथ सोखने में मदद करती हैं।

सेफ थर्माइट क्रैकर: इसे थर्माइट के संशोधित रासायनिक फॉर्मूले से तैयार किया जाता है। इसमें पोटैशियम नाइट्रेट और सल्फर का इस्तेमाल नहीं किया जाता। इससे धुआं कम निकलता है, जबकि पटाखे से रोशनी भी मिलती है।

सेफ मिनिमल एल्युमिनियम: इस तरह के पटाखों में एल्युमिनियम का इस्तेमाल बहुत कम मात्रा में किया जाता है। इससे सामान्य पटाखों की तुलना में प्रदूषण और आवाज दोनों को कम रखने में मदद मिलती है।