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इंडियन यूथ कांग्रेस पदाधिकारियों पर गिरी गाज के क्या मायने समझे जाएं?

Ramlila Maidan rally: इंडियन यूथ कांग्रेस पदाधिकारियों पर गिरी गाज के क्या मायने समझे जाएं?
Ramlila Maidan rally: इंडियन यूथ कांग्रेस पदाधिकारियों पर गिरी गाज के क्या मायने समझे जाएं?
Ramlila Maidan rally: कांग्रेस आलाकमान और विपक्ष के नेता राहुल गांधी को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि किसी भी जन आंदोलन या विरोध-प्रदर्शन की सफलता नेतृत्वकारी ताकतों (Leading Forces ) की क्षमता पर निर्भर करती है।यदि नेता जनता को अपनी बात से सहमत कराने की क्षमता रखते हैं, तो लोग ख़ुद-ब-ख़ुद उनके पीछे जुटने लगते हैं।इस संंबंध में मशहूर शायर और गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी का यह शेर आंदोलनकारियों के बीच बहुत लोकप्रिय रहा है- 
“मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर,
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया।”
कहने का तात्पर्य यह है कि यदि कोई व्यक्ति दृढ़ निश्चय के साथ किसी ठोस मुद्दे पर आगे बढ़ता है, तो लोग खुद उससे जुड़ने लगते हैं और लोगों का जुड़ते रहना अंतत: एक बड़े आंदोलन (कारवाँ) का आकार ले लेता है। नेतृत्वकारी ताकतों में यदि दम हो, तो उन्हें न किसी को अनुशासन का भय दिखाने की जरूरत पड़ती है और न ही बहुत ज्यादा तामझाम की। लोकनायक जेपी के आंदोलन में तो समस्त देश की जनता सड़कों पर उतर चुकी थी। इसके बाद भी बहुत से ऐसे आंदोलन हुए जिनमें आम लोगों का आक्रोश सड़कों पर उमड़ पड़ा।

बेहर समन्वय और संवाद की जरूरत

खबर है कि इंडियन यूथ कांग्रेस (IYC) ने 7 राज्यों के अपने 200 से अधिक पदाधिकारियों को इसलिए निलंबित कर दिया कि उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त(CEC) ज्ञानेश कुमार के मुद्दे पर ‘इंडिया’ गठबंधन द्वारा रामलीला मैदान में बुलाई गई रैली में भाग नहीं लिया।मध्य प्रदेश के 60, गुजरात के 49, पश्चिम बंगाल के 26, उत्तर प्रदेश के 11, तेलंगाना के 14, हरियाणा के 10 और झारखंड के 32 पदाधिकारियों को निलंबित किये जाने का समाचार है। इस तरह कुल 202 पदाधिकारियों पर कार्रवाई की गई।हालांकि यह किसी भी पार्टी का अपना निर्णय  या अंदरूनी विषय है कि वह अपने पदाधिकारियों को क्या निर्देश देती है और पालन न करने पर क्या कार्रवाई करती है। इसमें भला किसी की क्या दिलचस्पी हो सकती है, लेकिन यह बात समझ से परे है कि आखिर अनुशासन के डंडे तले कैसे कोई बड़ा आंदोलन चलाया जा सकता है? आंदोलन के लिए अनुशासन का डंडा दिखाने की नहीं, बल्कि बेहर समन्वय और संवाद की जरूरत होती है।संगठन के कार्यकर्ता और लोग खुद मुद्दे से जुड़ते जाते हैं। हाँ, अनुशासन के नाम पर इतना ध्यान अवश्य रखना पड़ता है कि आंदोलन अनुशासित ढंग से ही चले, इसमें कहीं से अराजकता की घुसपैठ न हो जाए।

कार्रवाई की जरूरत क्यों?

यह सच है कि कोई प्राइवेट कंपनी अपने कर्मचारियों को लंबे समय तक अनुशासन का भय दिखा सकती है, लेकिन राजनीतिक पार्टियों में ऐसा संभव नहीं। राजनीति में तो कार्यकर्ताओं के पास बहुत से विकल्प मौजूद होते हैं। वे किसी और पार्टी का दामन थाम सकते हैं।राजनीतिक कार्यकर्ता को किसी मुद्दे से जोड़ने के लिए अनुशासन के डंडे की नहीं, बल्कि यह बताने की जरूरत होती है कि राष्ट्रहित में यह मुद्दा कितना महत्वपूर्ण है। सवाल उठ सकते हैं कि जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी या इंडिया गठबंधन के नेताओं की बात मानकर लाखों लोग दिल्ली आने वाले थे, तो क्यों नहीं आए? आज युवा कांग्रेस पदाधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जरूरत क्यों पड़ी? साफ है कि कांग्रेस को भी अहसास हो गया है कि देश की जनता में रामलीला मैदान में अपेक्षित भीड़ न जुटने का संदेश जा चुका है। यही वजह है कि उसे अपने उन पदाधिकारियों पर कार्रवाई की जरूरत पड़ी जो रैली में नहीं पहुंचे। 

Ramlila Maidan rally:  जनता क्या चाहती है?

संभव है कि यूथ कांग्रेस के कुछ पदाधिकारी आवश्यक मजबूरियों के चलते रैली में शामिल न हो पाए हों,  लेकिन जो मजबूरी न होने के बावजूद अनुपस्थित रहे,  उनके बारे में क्या समझा जाए? वे क्यों कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के नेताओं की बात को गंभीरता से नहीं ले पाए? जब इंडिया गठबंधन की सबसे प्रमुख पार्टी के पदाधिकारी ही अपने नेताओं की बात से समहमत नहीं हो पा रहे हैं, तो फिर इंडिया गठबंधन के नेता कैसे ‘वोट चोरी’ के मुद्दे पर देशव्यापी आंदोलन चला पाएंगे? ध्यान रहे कि लोकतंत्र में जो पार्टियां अपनी बात से जनता को सहमत करने की क्षमता रखती हैं, जनता उन्हीं के हाथों में अपना भविष्य सौंपती है।