इंदौर (Indore) के बंगाली चौराहे के पास ग्रेटर बृजेश्वरी कॉलोनी में तड़के लगी आग ने एक पूरे परिवार की खुशियां हमेशा के लिए बुझा दीं। रबर कारोबारी मनोज पुगलिया, उनकी गर्भवती बहू और रिश्तेदारों समेत कुल 8 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई। आग इतनी तेजी से फैली कि घर के अंदर मौजूद लोगों को संभलने का भी मौका नहीं मिला। हादसे के बाद मलबे में सिर्फ जले हुए कमरे, टूटे दरवाजे और उन सवालों की गूंज बची है जिनका जवाब अब भी तलाशा जा रहा है।
स्थानीय लोगों के मुताबिक हादसे की शुरुआत तड़के करीब साढ़े तीन बजे हुई। पड़ोसी अभिषेक ने बताया कि उस समय घर के बाहर चार्जिंग पर लगी कार के बोनट से हल्का धुआं उठता दिखाई दिया।
Indore अग्निकांड
शुरू में लोगों को लगा कि शायद मामूली तकनीकी दिक्कत होगी, लेकिन देखते ही देखते आग तेज हो गई। कुछ ही मिनटों में धुआं और लपटें बढ़ने लगीं। आसपास के लोगों ने तुरंत घरवालों को जगाने और आग बुझाने की कोशिश की, मगर आग तेजी से फैलती चली गई। कॉलोनी के लोगों का कहना है कि उन्होंने फायर ब्रिगेड को कई बार फोन किया, लेकिन मदद समय पर नहीं पहुंची। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार सूचना देने के बाद भी दमकल की पहली गाड़ी आने में करीब एक घंटा लग गया। स्थानीय पार्षद राजीव जैन का भी कहना है कि अगर दमकल जल्दी पहुंच जाती तो आग ग्राउंड फ्लोर से आगे नहीं बढ़ती। देर होने के कारण आग दूसरी मंजिल तक पहुंच गई और ऊपर सो रहे लोग बाहर निकल ही नहीं सके।
फायर ब्रिगेड का दावा
दूसरी तरफ फायर कंट्रोल रूम का रिकॉर्ड अलग कहानी बता रहा है। कंट्रोल रूम के अनुसार पहला कॉल सुबह 4 बजकर 1 मिनट पर दर्ज हुआ। अगले ही मिनट गांधी हॉल फायर स्टेशन को सूचना भेज दी गई और वहां से दमकल रवाना कर दी गई। लॉग बुक के मुताबिक फायर ब्रिगेड की टीम 4 बजकर 19 मिनट पर घटनास्थल पहुंच गई। यानी विभाग का कहना है कि सूचना मिलने के बाद महज 17 मिनट में गाड़ी मौके पर पहुंच गई थी।
कॉल करने वाले का बयान
फायर कंट्रोल रूम की लॉग बुक में दर्ज नाम कलश जैन का है, जिन्होंने सबसे पहले आग की सूचना दी थी। उन्होंने बताया कि उन्होंने करीब 3 बजकर 55 मिनट पर कॉल किया था। उनका कहना है कि दमकल की पहली गाड़ी कम से कम आधे घंटे बाद पहुंची। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि कॉल के समय और कंट्रोल रूम में दर्ज समय के बीच अंतर क्यों है। जांच के दौरान यह भी सामने आया कि कॉलोनी की संकरी गलियां भी राहत कार्य में बड़ी बाधा बनीं। दमकल की गाड़ियां सीधे घर तक नहीं पहुंच पाईं और रास्ते में ही फंस गईं। पीछे के रास्ते से पहुंचने की कोशिश की गई, लेकिन वहां भी वाहन को मोड़ने और निकालने में समय लग गया। इस देरी ने आग को और फैलने का मौका दे दिया।
लोहे की जालियां बनीं ‘डिजिटल पिंजरा’
हादसे में एक और बड़ी समस्या सामने आई। आग लगते ही घर की बिजली बंद हो गई, जिससे दरवाजों पर लगे डिजिटल लॉक काम करना बंद कर गए। अंदर मौजूद लोग दरवाजा नहीं खोल सके। वहीं खिड़कियों पर लगी लोहे की जालियों ने बाहर निकलने का रास्ता भी बंद कर दिया। नतीजा यह हुआ कि कई लोग आग और धुएं के बीच घर के अंदर ही फंस गए। हादसे के बाद यह भी आशंका जताई जा रही है कि घर के अंदर गैस सिलेंडर फटने से आग और भड़क गई थी। अगर शुरुआती समय में आग पर काबू पा लिया जाता तो शायद नुकसान कम हो सकता था। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दमकल समय पर पहुंची थी या कहीं सिस्टम की देरी ने आठ जिंदगियों को निगल लिया। इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आएंगे, लेकिन फिलहाल यह हादसा शहर की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर गया है।
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