Sabarimala SC Hearing: धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़े मामलों पर सुप्रीम कोर्ट में आज लगातार दूसरे दिन सुनवाई होगी। यह सुनवाई नौ जजों की संविधान पीठ कर रही है। मंगलवार को पहले दिन करीब पांच घंटे तक बहस चली, जिसमें केंद्र सरकार ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी पारंपरिक रोक का समर्थन किया।
सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि मंदिर में महिलाओं को प्रवेश न देने का मतलब उनका अपमान करना नहीं है। भारत में महिलाओं को देवी के रूप में सम्मान दिया जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि सबरीमाला मंदिर की परंपरा को ‘अस्पृश्यता’ यानी संविधान के अनुच्छेद 17 से जोड़ना सही नहीं है। उनके अनुसार छुआछूत पहले जाति के आधार पर होती थी, जबकि यह मामला उससे अलग है।

परंपरा बनाम छुआछूत पर सवाल
तुषार मेहता ने आगे कहा कि जैसे लोग मस्जिद, मजार या गुरुद्वारे में जाते समय सिर ढंकते हैं, वैसे ही सबरीमाला मंदिर की भी अपनी खास परंपराएं हैं। इन परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए। उनका कहना था कि यह धार्मिक आस्था और संप्रदाय की स्वतंत्रता का विषय है और इसमें अदालत को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
इस पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ में मौजूद एकमात्र महिला जज, जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि यदि किसी महिला को उसके मासिक धर्म के कारण मंदिर में प्रवेश से रोका जाता है, तो क्या इसे ‘छुआछूत’ नहीं माना जाएगा? उन्होंने यह भी कहा कि संविधान ने छुआछूत को पूरी तरह खत्म कर दिया है।
अदालत में भेदभाव को लेकर तीखी बहस
सुनवाई के दौरान अदालत और सरकार के बीच कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई।सरकार का कहना था कि 2018 में महिलाओं को मंदिर में प्रवेश देने वाला फैसला सही तरीके से नहीं लिया गया था और सभी धर्मों की परंपराओं का सम्मान जरूरी है। सरकार ने यह भी कहा कि सिर ढकने जैसे नियम किसी के अधिकारों का उल्लंघन नहीं होते।इसके जवाब में जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि सामाजिक बुराई और धार्मिक परंपरा में फर्क हो सकता है, लेकिन संविधान के सिद्धांत हर दिन और हर स्थिति में एक समान होने चाहिए।

सरकार ने दोहराया कि सबरीमाला की परंपरा को ‘अस्पृश्यता’ कहना गलत है, क्योंकि छुआछूत पहले जाति के आधार पर लागू होती थी। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने फिर पूछा कि अगर मासिक धर्म के आधार पर महिलाओं को रोका जा रहा है, तो क्या इसे भेदभाव या छुआछूत नहीं माना जाना चाहिए?
सरकार ने यह भी कहा कि अदालत को यह तय नहीं करना चाहिए कि कोई धार्मिक प्रथा आधुनिक है या वैज्ञानिक। केवल वही प्रथाएं रद्द की जानी चाहिए जो सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ हों। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि सामाजिक बुराई और धार्मिक परंपरा में अंतर हो सकता है, लेकिन किसी भी तरह के भेदभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
Sabarimala SC Hearing: सुप्रीम कोर्ट में 50 से ज्यादा पुनर्विचार याचिकाएं
धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश से जुड़ा विवाद पिछले करीब 26 वर्षों से अदालतों में चल रहा है। वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से फैसला दिया था कि सभी उम्र की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति होनी चाहिए। इसके बाद इस फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं।
अब सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक 50 से अधिक याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। अदालत ने तय किया है कि याचिकाकर्ता और उनके समर्थन में पक्ष रखने वाले वकील 7 से 9 अप्रैल तक अपनी दलीलें देंगे, जबकि फैसले का विरोध करने वाले पक्ष 14 से 16 अप्रैल के बीच अपनी बात रखेंगे।

पांच अहम मामलों पर सुप्रीम कोर्ट करेगा फैसला
इस सुनवाई के दौरान अदालत केवल सबरीमाला मामले तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि महिलाओं से जुड़े कई अन्य धार्मिक विवादों पर भी विचार करेगी।
- सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश
सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी। अब बड़ी पीठ यह तय करेगी कि वह फैसला सही था या नहीं। - दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना
2017 में एडवोकेट सुनीता तिवारी ने याचिका दाखिल कर कहा कि यह प्रथा महिलाओं के साथ भेदभाव करती है और नाबालिग लड़कियों के अधिकारों का उल्लंघन करती है। अदालत यह तय करेगी कि क्या यह प्रथा मौलिक अधिकारों के खिलाफ है। - मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश
2016 में यास्मीन जुबैर अहमद पीरजादा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने की अनुमति देने की मांग की थी। कोर्ट यह तय करेगा कि क्या महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोका जा सकता है। - पारसी महिलाओं का अग्नि मंदिर में प्रवेश
2012 में पारसी महिला गुलरुख एम गुप्ता ने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। उन्होंने कहा कि हिंदू व्यक्ति से शादी करने के बाद उन्हें अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोका गया। सुप्रीम कोर्ट अब तय करेगा कि क्या गैर-पारसी से शादी करने पर पारसी महिला को मंदिर में जाने से रोका जा सकता है। - मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े लैंगिक भेदभाव
सुप्रीम कोर्ट यह भी तय करेगा कि क्या धार्मिक गतिविधियों में जेंडर के आधार पर भेदभाव को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना जाना चाहिए।

सात संवैधानिक सवालों पर होगी बहस
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सात बड़े संवैधानिक प्रश्न तय किए हैं, जिन पर विस्तृत बहस होगी। इनमें धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा, धार्मिक संप्रदायों के अधिकार, संविधानिक नैतिकता की परिभाषा और धार्मिक प्रथाओं में अदालत के हस्तक्षेप की सीमा जैसे मुद्दे शामिल हैं। साथ ही यह भी तय किया जाएगा कि क्या किसी दूसरे धर्म का व्यक्ति जनहित याचिका के जरिए किसी धार्मिक परंपरा को चुनौती दे सकता है।
सबरीमाला विवाद कैसे शुरू हुआ
सबरीमाला मंदिर में पहले 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर रोक थी। इसका कारण महिलाओं के मासिक धर्म और भगवान अयप्पा के ब्रह्मचर्य व्रत को बताया जाता था। इसी नियम को लेकर विवाद शुरू हुआ।
यह मामला 1990 में सामने आया और बाद में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। 2006 में अदालत ने इस पर नोटिस जारी किया और 2008 में मामला तीन जजों की पीठ को भेजा गया। 2016 में सुनवाई शुरू हुई और 2017 में इसे पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेज दिया गया।
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने 4-1 के बहुमत से फैसला देते हुए सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दे दी और इस प्रतिबंध को असंवैधानिक बताया। फैसले के बाद विरोध के बीच बिंदु कनकदुर्गा और बिंदु अम्मिनी नाम की दो महिलाओं ने मंदिर में प्रवेश भी किया।
बाद में 2019 में यह मामला नौ जजों की बड़ी संविधान पीठ को भेज दिया गया और इसके साथ अन्य धर्मों से जुड़े महिला प्रवेश के मामलों को भी जोड़ दिया गया। अब अदालत इन सभी मुद्दों पर एक साथ सुनवाई कर रही है।








