West Bengal Election: 2021 के बंगाल चुनाव से लेकर 2026 की तैयारियों तक की यह पूरी कहानी राजनीति से कहीं आगे जाकर जमीन पर किए गए काम, अनुभव और बदलते हालात को दिखाती है। इसमें ऐसे कई किस्से सामने आते हैं जो नेताओं के फैसलों, कार्यकर्ताओं की मेहनत और जमीनी सच्चाई को करीब से समझाते हैं। यह सफर बताता है कि कैसे समय के साथ रणनीतियां बदलीं और संगठन को मजबूत करने के लिए लगातार नए तरीके अपनाए गए।

साल 2021 का बंगाल चुनाव…
2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान एक नेता ने मालदा के एक गांव का दर्दनाक अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि वहां एक ऐसा परिवार मिला, जिसके दो बेटों की हत्या कर दी गई थी, और घर में कमाने वाला कोई नहीं बचा था। जब वे उस घर पहुंचे तो केवल सास और बहू ही मौजूद थीं। पहले सास बाहर आईं, जिन्होंने सिर्फ एक धोती पहनी हुई थी। फिर जब वे अंदर गए तो बहू भी वही धोती पहनकर बाहर आईं। पूछने पर पता चला कि घर में सिर्फ दो धोती थीं, जिनमें से एक फटी हुई थी, इसलिए दोनों महिलाएं बारी-बारी से वही एक सही धोती पहनकर बाहर आती थीं। घर की हालत बहुत खराब थी और मकान गिरने की स्थिति में था।
उस समय नेता ने अपने पास मौजूद जितने भी पैसे थे, वे उन्हें देकर लौट आए। बाद में उन्होंने यह पूरा मामला गृह मंत्री अमित शाह को बताया। अमित शाह ने निर्देश दिया कि ऐसे जरूरतमंद कार्यकर्ताओं की सूची तैयार की जाए और उनकी जरूरत के अनुसार आर्थिक सहायता दी जाए। इसके बाद इन परिवारों के लिए हर महीने 8 से 10 हजार रुपये की मदद तय की गई, जो अब तक जारी है। चुनाव के बाद बंगाल के कई इलाकों जैसे नंदीग्राम, संदेशखाली, कूचबिहार, हावड़ा, हुगली और 24 परगना में रेप, हत्या और आगजनी जैसी घटनाएं हुईं, जिनका आरोप टीएमसी के लोगों पर लगाया गया। बताया गया कि बीजेपी कार्यकर्ता और उनके परिवार इन घटनाओं के शिकार बने।

West Bengal Election: 2026 चुनाव से जुड़ा अनुभव
2026 के बंगाल चुनाव से जुड़ा एक और अनुभव सामने आता है, जब आसनसोल में अमित शाह की एक चुनावी रैली की जिम्मेदारी संभाली जा रही थी। उस दौरान बीजेपी के जिला अध्यक्ष ने चार दिन तक अपना मोबाइल फोन बंद रखा और रैली के दिन ही उसे चालू किया। इस पर रैली के बाद अमित शाह से शिकायत की गई। उन्होंने पूरी बात ध्यान से सुनी और कहा कि ऐसे लोगों की सूची बनाई जाए, लेकिन अभी एक्शन और काम पर ध्यान देना जरूरी है। उनका संदेश साफ था कि जो संसाधन उपलब्ध हैं, उन्हीं के साथ पूरी ताकत से काम किया जाए और जीत पर फोकस रखा जाए। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव के समय यह नहीं देखना है कि किसने क्या नहीं किया, बल्कि यह देखना है कि किसने क्या किया और आगे क्या करना है। यह बातें यूपी बीजेपी के प्रदेश मंत्री अभिजात मिश्रा और एक अन्य बीजेपी नेता ने साझा कीं।
बीजेपी की जीत की रणनीति के प्रमुख चेहरे
बंगाल में बीजेपी की चुनावी रणनीति कई बड़े नेताओं की योजना और लगातार मेहनत का परिणाम मानी जाती है। इसमें सबसे प्रमुख भूमिका अमित शाह, उनके सहयोगी सुनील बंसल और संगठन के वरिष्ठ नेता शिवप्रकाश सिंह की रही। इन सभी ने मिलकर संगठन को मजबूत करने और चुनावी रणनीति को जमीन पर उतारने का काम किया।
अमित शाह की रणनीति: हार से सीखकर जीत की तैयारी
2021 के चुनाव परिणाम आने के बाद दो दिन में विस्तृत समीक्षा की गई। अमित शाह ने सुनील बंसल और शिवप्रकाश सिंह को जुलाई के पहले सप्ताह तक हार की पूरी रिपोर्ट तैयार करने को कहा। इस समीक्षा में तीन मुख्य कारण सामने आए। पहला, चुनाव के बाद कार्यकर्ताओं और समर्थकों में टीएमसी की हिंसा का डर बना हुआ था। दूसरा, कुछ सीटों पर घुसपैठियों के कारण बीजेपी की रणनीति की जानकारी लीक हो गई थी। तीसरा, बूथ स्तर पर संगठन को और मजबूत करने की आवश्यकता थी ताकि जमीनी पकड़ बेहतर हो सके।
सुनील बंसल का ग्राउंड मिशन
सुनील बंसल को 2023 में बंगाल भेजा गया ताकि वे पंचायत चुनाव से लेकर 2026 विधानसभा चुनाव तक संगठन को मजबूत कर सकें। उनका मुख्य फोकस जमीनी स्तर पर संगठन खड़ा करना था। इस दौरान अमित शाह और सुनील बंसल के बीच लगातार बैठकें होती रहीं, जिनकी संख्या सैकड़ों में थी। जनवरी 2025 के बाद यह संवाद और भी तेज हो गया। सुनील बंसल हर सप्ताह दिल्ली जाकर रिपोर्ट देते थे और बंगाल की हर छोटी-बड़ी स्थिति की जानकारी साझा करते थे। उन्होंने राजस्थान के 15 से 18 वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की एक विशेष टीम भी तैयार की, जिसे बंगाल में लगाया गया।

भवानीपुर में चुनावी रणनीति
राजस्थान के वरिष्ठ नेता राजेंद्र राठौड़ को भवानीपुर सीट की जिम्मेदारी दी गई। उन्होंने बताया कि चुनाव से कुछ महीने पहले ही वे बंगाल पहुंच गए थे, जबकि उनकी टीम पहले से ही वहां काम कर रही थी। इस क्षेत्र में गंदगी, टूटी सड़कों और खराब बुनियादी ढांचे को मुख्य मुद्दा बनाया गया। लोगों से सवाल किया गया कि क्या ममता बनर्जी के क्षेत्र के लोग ऐसी स्थिति में रहने के हकदार हैं।
इसके अलावा, पिछले चुनाव में वोट देने वालों पर दबाव और डर की स्थिति भी सामने आई थी। कुछ लोगों के घरों की पाइपलाइन काटने और कचरा फेंकने जैसी घटनाओं का भी जिक्र किया गया। इस बार इन सभी डर को खत्म करने के लिए सेंट्रल फोर्स की मदद ली गई और लोगों को भरोसा दिया गया कि चुनाव के बाद भी सुरक्षा बनी रहेगी। हर वार्ड में अलग-अलग प्रवासी अध्यक्ष नियुक्त किए गए, जिनमें अधिकतर राजस्थान से थे।
माइक्रो मैनेजमेंट और प्रवासी प्रभारियों की रणनीति
बीजेपी ने बंगाल में एक मजबूत माइक्रो मैनेजमेंट सिस्टम बनाया। हर जिले में स्थानीय प्रभारी के ऊपर एक प्रवासी प्रभारी नियुक्त किया गया ताकि किसी तरह की रणनीति लीक न हो सके। जादवपुर सीट पर राजस्थान के अशोक सैनी को जिम्मेदारी दी गई। उन्होंने बताया कि वे तीन महीने पहले से वहां डटे हुए थे और पूरे इलाके में संगठन को मजबूत किया गया।
जादवपुर में 352 बूथ थे, जिनमें हर बूथ पर 3 से 4 बैठकें की गईं। कुल मिलाकर 1000 से ज्यादा बैठकें आयोजित हुईं। हर 4-5 बूथ मिलाकर एक शक्तिकेंद्र बनाया गया। सभी 10 वार्डों में पार्टी कार्यालय खोले गए। हालांकि कई जगह हार भी मिली, लेकिन कार्यकर्ताओं को फिर से सक्रिय किया गया। स्थानीय मंदिर समितियों और क्लबों से लगातार संपर्क रखा गया और सामाजिक नेटवर्क मजबूत किया गया।
डर और दबाव की राजनीति पर रणनीतिक वार
बीजेपी नेताओं के अनुसार, अमित शाह की टीम ने बंगाल में डर की राजनीति को खत्म करने और भरोसा बढ़ाने के लिए विशेष रणनीति बनाई। इसके तहत कई राजनीतिक संदेश और नारे तैयार किए गए। कुछ रैलियों में टीएमसी के कार्यकर्ताओं और पुलिस को खुले तौर पर चेतावनी देने जैसे बयान भी रणनीति का हिस्सा बताए गए, ताकि जनता के बीच मजबूत राजनीतिक संदेश जाए और डर का माहौल टूटे।

शिवप्रकाश सिंह की भूमिका
शिवप्रकाश सिंह ने आरएसएस और बीजेपी के बीच तालमेल बनाने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने बंगाल में हिंदू संगठनों जैसे वीएचपी, आरएसएस और बजरंग दल को सक्रिय किया। इसके अलावा धार्मिक संस्थानों, मठों और मंदिरों से लगातार संपर्क बनाए रखा गया। नादिया जैसे क्षेत्रों में इस्कॉन जैसे संगठनों के साथ भी कार्यक्रम किए गए।
व्यापारी वर्ग के साथ भी संवाद किया गया, जो पहले सरकार से असंतुष्ट था। धीरे-धीरे चुनाव के करीब आते-आते उनका रुख बदलने लगा। आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों ने पिछले तीन वर्षों में लगभग 2 लाख छोटी-बड़ी बैठकें कीं, जिससे जमीनी स्तर पर नेटवर्क मजबूत हुआ।
सोशल मीडिया और डिजिटल रणनीति
बीजेपी आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने सोशल मीडिया पर मजबूत नेटवर्क तैयार किया। लगभग 3000 इन्फ्लुएंसरों को जोड़ा गया, जिनके पास कम से कम 5000 फॉलोअर्स थे। इन्हें कंटेंट और प्रचार के लिए भुगतान किया गया और पिछले चार महीनों से ये लोग डिजिटल कैंपेन में सक्रिय रहे।

संगठन विस्तार और बूथ स्तर की मजबूती
भूपेंद्र यादव की देखरेख में मंडल और बूथ स्तर पर हजारों कार्यकर्ताओं की नियुक्ति की गई। इन्हें मासिक वेतन, भोजन और अन्य सुविधाएं दी गईं ताकि वे लगातार संगठन के लिए काम कर सकें।
सुवेंदु अधिकारी की भूमिका
ममता बनर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ चुके सुवेंदु अधिकारी को रणनीतिक भूमिका नहीं, बल्कि संगठनात्मक सहयोग की भूमिका दी गई। उनके स्थानीय नेटवर्क और राजनीतिक प्रभाव का उपयोग बीजेपी की रणनीति को जमीन पर उतारने के लिए किया गया, जिससे चुनावी अभियान को मजबूती मिली।
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