Fuel import: भारत ने साफ कर दिया है कि वह रूस से कच्चे तेल की खरीद सिर्फ अपने व्यावसायिक हितों को ध्यान में रखकर कर रहा है और अमेरिकी प्रतिबंधों में ढील मिले या नहीं, इससे भारत की नीति पर कोई असर नहीं पड़ेगा। पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने सोमवार को मीडिया ब्रीफिंग में कहा कि भारत पहले भी रूस से तेल खरीद रहा था, छूट के दौरान भी खरीद जारी रही और अब भी जारी है। उन्होंने कहा कि भारत के लिए सबसे अहम बात ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक हित हैं। देश में कच्चे तेल की कोई कमी नहीं है और पर्याप्त मात्रा में तेल का रिजर्व मौजूद है। ऐसे में अमेरिका की ओर से प्रतिबंधों में ढील दी जाए या नहीं, इससे भारत की खरीद नीति प्रभावित नहीं होगी।
ब्लूमबर्ग रिपोर्ट के बाद आया बयान
सुजाता शर्मा का यह बयान उस समय आया है जब हाल ही में ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि भारत ने अमेरिका से रूस के तेल आयात पर मिली छूट की अवधि बढ़ाने की मांग की है। रिपोर्ट के मुताबिक, होर्मुज जलडमरूमध्य में करीब 75 दिनों से जारी तनाव और बाधाओं की वजह से वैश्विक तेल सप्लाई पर दबाव बना हुआ है, जिसे देखते हुए भारत ने यह अनुरोध किया था। हालांकि, भारत सरकार ने अब साफ संकेत दे दिए हैं कि रूस से तेल खरीद किसी अस्थायी छूट पर निर्भर नहीं है, बल्कि यह देश की जरूरत और बाजार की स्थिति के हिसाब से जारी रहेगी।
Fuel import: अमेरिका ने क्यों दी थी राहत?
अमेरिका ने मार्च में रूस से तेल खरीद पर कुछ राहत दी थी। माना गया कि ईरान युद्ध और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में दबाव बढ़ रहा था। इसी वजह से वॉशिंगटन ने अतिरिक्त कच्चे तेल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए यह छूट मंजूर की थी। बाद में इस राहत को आगे भी बढ़ाया गया, लेकिन मौजूदा छूट 16 मई को खत्म हो गई। इसके बावजूद भारत ने संकेत दिए हैं कि वह रूस से तेल आयात जारी रखेगा।
रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा रूसी तेल आयात
Fuel import: भारत लगातार रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीद रहा है। ऊर्जा विश्लेषण कंपनी Kpler के आंकड़ों के मुताबिक, मई महीने में भारत का रूसी तेल आयात रिकॉर्ड 23 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया है। हालांकि पूरे महीने का औसत आयात करीब 19 लाख बैरल प्रतिदिन रहने का अनुमान है। विशेषज्ञों का मानना है कि रियायती दरों पर मिलने वाला रूसी कच्चा तेल भारत के लिए आर्थिक रूप से काफी फायदेमंद साबित हो रहा है, इसलिए भारत इसे छोड़ने के मूड में नहीं दिख रहा।
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