Indian railways: रेलवे स्टेशनों पर पान और गुटखा थूककर गंदगी फैलाने की समस्या से निपटने के लिए पश्चिम रेलवे ने एक नया प्रयोग शुरू किया है। मुंबई के माटुंगा रोड स्टेशन पर जर्मन नैनो-टेक्नोलॉजी आधारित कोटिंग लगाई गई है, जिसके जरिए दीवारों और अन्य सतहों पर पड़ने वाले जिद्दी दागों को आसानी से साफ करने का दावा किया जा रहा है। रेलवे के मुताबिक, इस पायलट प्रोजेक्ट की लागत करीब 5 लाख रुपये है और इससे पान के दाग साफ करने में लगने वाला समय 30 मिनट से घटकर सिर्फ 5 मिनट रह सकता है। यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो इसे अन्य स्टेशनों पर भी लागू किया जा सकता है।
क्या है रेलवे का नया प्रयोग?
पश्चिम रेलवे ने माटुंगा रोड स्टेशन पर करीब 3,700 वर्ग फुट क्षेत्र में विशेष जर्मन नैनो-कोटिंग लगाई है। यह कोटिंग दीवारों, खंभों, छतों, लिफ्ट और धातु की सतहों पर की गई है। रेलवे अधिकारियों का दावा है कि यह कोटिंग सतह पर एक सुरक्षात्मक परत बना देती है, जिससे पान, गुटखा, पेंट या अन्य गंदगी अंदर तक नहीं पहुंच पाती। ऐसे में सफाईकर्मियों को दाग हटाने के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती और सामान्य सफाई से ही दाग साफ हो जाते हैं।
Indian railways: रेलवे अधिकारियों का क्या कहना है?
पश्चिम रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी (CPRO) विनीत अभिषेक के अनुसार, यह फिलहाल एक पायलट प्रोजेक्ट है और रेलवे इसकी सफलता का आकलन कर रहा है। उन्होंने कहा कि इस तकनीक से सतहों पर गंदगी कम चिपकती है और सफाई में लगने वाला समय भी काफी कम हो जाता है। रेलवे ने यह भी जानकारी दी है कि पिछले तीन महीनों में सार्वजनिक स्थानों पर थूकने और गंदगी फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई भी की गई है।
Indian railways: लेकिन उठ रहे हैं कई सवाल
रेलवे के इस प्रयोग को लेकर सोशल मीडिया और आम लोगों के बीच कई सवाल भी उठ रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ विशेष कोटिंग लगा देने से लोग सार्वजनिक स्थानों पर थूकना बंद कर देंगे? इसके अलावा लोगों का कहना है कि यदि रेलवे वास्तव में समस्या खत्म करना चाहता है तो गंदगी फैलाने वालों पर सख्त जुर्माना और प्रभावी कार्रवाई ज्यादा जरूरी है। कुछ लोगों का यह भी तर्क है कि स्टेशन के एक हिस्से को चमकदार और साफ बना देने से पूरी समस्या खत्म नहीं होगी, क्योंकि आसपास की अन्य जगहों पर गंदगी पहले की तरह बनी रह सकती है।
असली चुनौती तकनीक नहीं, आदतें हैं
Indian railways: विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी तकनीकें सफाई व्यवस्था को बेहतर बनाने में मदद जरूर कर सकती हैं, लेकिन सार्वजनिक स्थानों पर थूकने की समस्या का स्थायी समाधान तभी संभव है जब लोगों की आदतों में बदलाव आए और नियमों का सख्ती से पालन कराया जाए। अब सभी की नजर इस पायलट प्रोजेक्ट के नतीजों पर है। यदि यह प्रयोग सफल साबित होता है तो रेलवे स्टेशनों की साफ-सफाई में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है, लेकिन यह भी देखना होगा कि क्या तकनीक लोगों की वर्षों पुरानी आदतों पर भी असर डाल पाती है।
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