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Vande Mataram Singing Rules: आखिर क्यों सिर्फ दो अंतरे गाए जाते हैं वंदे मातरम ? जानिए पूरी कहानी और इसके पीछे की वजह

Vande Mataram Singing Rules: आखिर क्यों सिर्फ दो अंतरे गाए जाते हैं वंदे मातरम ? जानिए पूरी कहानी और इसके पीछे की वजह

Vande Mataram Singing Rules: स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले से जब देशभक्ति के सुरों के बीच वंदे मातरम की गूंज सुनाई देती है, तो हर भारतीय के मन में गर्व की भावना जाग उठती है। यह गीत भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे प्रभावशाली आवाजों में से एक रहा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मूल रूप से रचे गए वंदे मातरम के सभी अंतरे सार्वजनिक कार्यक्रमों में क्यों नहीं गाए जाते? लंबे समय से आम तौर पर इसके शुरुआती दो अंतरे ही गाए जाते रहे हैं। इसके पीछे इतिहास, राजनीति और देश की विविधता से जुड़ी एक महत्वपूर्ण कहानी है।

बंकिम चंद्र चटोपाध्याय ने रचा था वंदे मातरम

वंदे मातरम की ____रचना महान साहित्यकार बंकिम चंद्र चटोपाध्याय ने की थी। मूल रचना में छह अंतरे हैं। शुरुआती दो अंतरे मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता, हरियाली, नदियों, हवाओं और भारत माता की स्तुति पर केंद्रित हैं। यही कारण है कि इन शुरुआती पंक्तियों को व्यापक रूप से सभी समुदायों के लिए स्वीकार्य माना गया।हालांकि, आगे के अंतरों में देवी दुर्गा और अन्य धार्मिक प्रतीकों के संदर्भ आते हैं। यही धार्मिक संदर्भ बाद में इस गीत को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस का कारण बने।

Vande Mataram Singing Rules:1937 में सामने आया बड़ा विवाद

आजादी से पहले 1937 के दौर में वंदे मातरम को लेकर मुस्लिम लीग और कुछ अन्य पक्षों ने आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि गीत के बाद के हिस्सों में मौजूद धार्मिक प्रतीक और देवी-उपासना के संदर्भ सभी समुदायों के लिए समान रूप से स्वीकार्य नहीं हैं।उस समय स्वतंत्रता आंदोलन अपने निर्णायक दौर में था और कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि अलग-अलग धर्मों और समुदायों को एक साझा राष्ट्रीय आंदोलन के तहत साथ रखा जाए। इसी संवेदनशील परिस्थिति में वंदे मातरम के सार्वजनिक गायन को लेकर विचार-विमर्श हुआ।

Vande Mataram Singing Rules: क्यों चुने गए सिर्फ शुरुआती दो अंतरे?

इस विवाद के बीच कांग्रेस ने इस बात पर विचार किया कि सार्वजनिक और राष्ट्रीय कार्यक्रमों में गीत के ऐसे हिस्से का इस्तेमाल किया जाए, जो धार्मिक विवाद से दूर हो और सभी भारतीयों को समान रूप से स्वीकार्य हो।रवींद्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी समेत उस दौर के प्रमुख नेताओं से विचार-विमर्श के बाद शुरुआती दो अंतरों को सार्वजनिक आयोजनों के लिए उपयुक्त माना गया। इन अंतरों में भारत की धरती, प्रकृति और मातृभूमि के प्रति सम्मान की भावना है, लेकिन धार्मिक प्रतीकों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।इसलिए यह कहना अधिक सही होगा कि वंदे मातरम के बाकी अंतरे मूल रचना से हटाए नहीं गए थे, बल्कि राष्ट्रीय और सार्वजनिक आयोजनों में व्यापक स्वीकार्यता बनाए रखने के लिए शुरुआती दो अंतरों के इस्तेमाल की परंपरा विकसित हुई।

आजादी के बाद मिली राष्ट्रीय गीत की पहचान

भारत की आजादी के बाद राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की गई। संविधान सभा ने जन गण मन को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया, जबकि वंदे मातरम को भी देश के स्वतंत्रता आंदोलन में उसके ऐतिहासिक योगदान के कारण विशेष राष्ट्रीय सम्मान दिया गया।वंदे मातरम के शुरुआती दो अंतरों को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किए जाने की परंपरा बनी। इस तरह जन गण मन और वंदे मातरम दोनों को राष्ट्रीय महत्व और सम्मान प्राप्त हुआ, हालांकि दोनों की संवैधानिक स्थिति एक जैसी नहीं है।

Vande Mataram Singing Rules: वंदे मातरम सिर्फ गीत नहीं, आजादी की हुंकार था

वंदे मातरम का इतिहास भारत के स्वतंत्रता संग्राम से गहराई से जुड़ा हुआ है। खास तौर पर 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध के दौरान यह गीत आंदोलनकारियों के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ। स्वदेशी आंदोलन में वंदे मातरम राष्ट्रीय चेतना और अंग्रेजी शासन के विरोध का शक्तिशाली प्रतीक बन गया।जुलूसों, सभाओं और आंदोलनों में इसके नारे गूंजते थे। युवाओं और स्वतंत्रता सेनानियों के लिए यह गीत देश के प्रति समर्पण और मातृभूमि के सम्मान की भावना का प्रतीक बन चुका था।

Vande Mataram Singing Rules: क्या वंदे मातरम न गाने पर जेल हो सकती है?

वंदे मातरम को लेकर अक्सर यह सवाल भी उठता है कि अगर कोई व्यक्ति इसे नहीं गाता तो क्या उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है। इस मामले में जानबूझकर गीत में बाधा डालना या उसका अपमान करना और सिर्फ उसे न गाना—दो अलग-अलग बातें हैं। किसी व्यक्ति द्वारा वंदे मातरम नहीं गाने मात्र को अपने आप में जेल की सजा का आधार मानना सही नहीं होगा। राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान से जुड़े कानूनी प्रावधानों की व्याख्या हमेशा संबंधित कानून और न्यायिक आदेशों के आधार पर ही की जानी चाहिए।करीब डेढ़ सदी की यात्रा में वंदे मातरम ने भारतीय इतिहास के कई महत्वपूर्ण दौर देखे हैं। साहित्यिक रचना से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारी नारे तक और फिर राष्ट्रीय गीत के सम्मान तक, इसकी यात्रा बेहद खास रही है।यही वजह है कि आज भी जब किसी बड़े राष्ट्रीय अवसर पर वंदे मातरम की धुन सुनाई देती है, तो यह सिर्फ एक गीत नहीं रह जाता। इसके साथ स्वतंत्रता संग्राम, बलिदान, मातृभूमि के प्रति प्रेम और राष्ट्रीय एकता की भावनाएं जुड़ जाती हैं।

आखिर चार अंतरे हटे थे या नहीं?

इस पूरे सवाल का सबसे अहम जवाब यही है कि वंदे मातरम के बाकी चार अंतरे मूल रचना से हटाए नहीं गए थे। मूल रचना आज भी अपने पूरे स्वरूप में मौजूद है। राष्ट्रीय और सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए शुरुआती दो अंतरों को अपनाने का फैसला मुख्य रूप से उस समय के सामाजिक-राजनीतिक माहौल और सभी समुदायों की स्वीकार्यता को ध्यान में रखकर किया गया था।इसलिए वंदे मातरम के दो अंतरे गाए जाने की परंपरा को गीत के बाकी हिस्से को मिटाने के तौर पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आयोजनों के लिए एक सर्वसम्मत और समावेशी रूप चुनने के ऐतिहासिक निर्णय के रूप में समझना ज्यादा उचित है। यही निर्णय इस गीत को देश की विविधता के बीच राष्ट्री

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