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लाल सलाम के साये से तिरंगे की शान तक: अबूझमाड़ में बदली तस्वीर, नक्सल गढ़ में पहली बार आजादी का जश्न, जानिए क्या है मामला …

Abujhmad Naxalism Tricolour: जिस अबूझमाड़ में कभी नक्सलियों का दबदबा इतना गहरा था कि तिरंगा फहराना भी आसान नहीं था, आज वहीं हर घर तिरंगे की तस्वीर सामने आ रही है। लंबे समय तक माओवादी प्रभाव वाले इलाकों में राष्ट्रीय पर्वों के आयोजन और सरकारी गतिविधियों पर दबाव और भय का माहौल रहने की खबरें सामने आती रही हैं। ऐसे में आज ग्रामीणों का तिरंगा हाथ में लेकर स्वतंत्रता दिवस मनाना केवल राष्ट्रभक्ति का दृश्य नहीं, बल्कि उस बदलाव का प्रतीक है जिसमें लाल सलाम की जगह तिरंगे और बंदूक के डर की जगह संविधान पर भरोसा अपनी जगह बना रहा है।

कभी घने जंगलों, दुर्गम पहाड़ियों और नक्सली हिंसा के लिए पहचाना जाने वाला अबूझमाड़ अब एक अलग तस्वीर पेश कर रहा है। स्वतंत्रता दिवस 2026 पर बस्तर के कई ऐसे इलाकों में तिरंगा शान से लहराया, जहां लंबे समय तक राष्ट्रीय पर्व मनाना भी चुनौती माना जाता था। ग्रामीणों के हाथों में तिरंगा था, बच्चों के चेहरों पर उत्साह था और सुरक्षा बलों की मौजूदगी के बीच गांवों में देशभक्ति का माहौल दिखाई दिया। यह सिर्फ स्वतंत्रता दिवस का कार्यक्रम नहीं, बल्कि राज्य की वापसी, सुरक्षा बलों की बढ़ती पहुंच और स्थानीय लोगों के साथ बनते भरोसे की कहानी के तौर पर देखा जा रहा है।

अबूझमाड़ में पहली बार दिखा तिरंगे का ऐसा दृश्य

अबूझमाड़ के अंदरूनी इलाकों में BSF की 129वीं वाहिनी ने ‘हर घर तिरंगा’ अभियान चलाया। कोरोस्कोडो, हचेकोटी, अदनार, मरकाबेड़ा और आसपास के गांवों में जवान पहुंचे। ग्रामीणों और बच्चों को राष्ट्रीय ध्वज दिए गए। बच्चों के बीच चॉकलेट और बिस्किट भी बांटे गए और ग्रामीणों ने अपने घरों पर तिरंगा फहराया। गृह मंत्रालय की ओर से जारी जानकारी में इन इलाकों को पहले वामपंथी उग्रवाद के गढ़ और सुरक्षा बलों के लिए काफी हद तक दुर्गम बताया गया है। यानी जिस भूगोल तक कभी सरकार और प्रशासन की पहुंच सीमित मानी जाती थी, वहां अब तिरंगा और सरकारी संस्थाओं की मौजूदगी दिखाई दे रही है।

Abujhmad Naxalism Tricolour: मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने दिया बड़ा राजनीतिक संदेश

इस बदलाव की राजनीतिक तस्वीर को मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के स्वतंत्रता दिवस संदेश से भी जोड़कर देखा जा सकता है। रायपुर में ध्वजारोहण के दौरान साय ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में ऐतिहासिक सफलता मिली है। उन्होंने कहा कि नक्सल हिंसा से मुक्त हुए बस्तर के इलाकों में लोग तिरंगा यात्राओं के जरिए आजादी का उत्सव मना रहे हैं।

सरकार के मुताबिक, बस्तर संभाग के करीब 90 ऐसे गांव, जो पहले माओवादी हिंसा से प्रभावित थे और अब नक्सलवाद से मुक्त बताए जा रहे हैं, वहां स्वतंत्रता दिवस पर पहली बार राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। यही वह बिंदु है जहां अबूझमाड़ की तस्वीर महज एक स्थानीय कार्यक्रम से निकलकर राष्ट्र और राज्य की मौजूदगी के बड़े राजनीतिक संदेश में बदल जाती है।

जहां कभी नक्सलियों का फरमान चलता था, वहां अब संविधान का झंडा

बस्तर की राजनीति और सुरक्षा की कहानी को समझने के लिए एक बात महत्वपूर्ण है- नक्सलवाद का प्रभाव सिर्फ हिंसा तक सीमित नहीं रहा। कई इलाकों में सरकारी संस्थाओं, चुनावी प्रक्रिया और राष्ट्रीय पर्वों से दूरी बनाने का दबाव भी चर्चा में रहा है। अब तस्वीर इसके उलट दिखाई दे रही है।

जहां कभी बंदूक के साये में ग्रामीणों की आवाज दबती थी, वहां अब बच्चे तिरंगा लेकर आगे बढ़ रहे हैं। जहां सरकारी पहुंच चुनौती थी, वहां सुरक्षा बल गांवों तक पहुंच रहे हैं। और जहां राष्ट्रीय पर्वों को लेकर डर का माहौल बताया जाता था, वहां स्वतंत्रता दिवस का आयोजन हो रहा है। यह बदलाव राष्ट्रवादी नजरिए से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिर्फ क्षेत्र पर सुरक्षा नियंत्रण का नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था के प्रति बढ़ते जुड़ाव का प्रतीक है।

Abujhmad Naxalism Tricolour: BSF का ‘हर घर तिरंगा’ अभियान क्यों महत्वपूर्ण?

अबूझमाड़ में BSF का अभियान सिर्फ झंडा बांटने तक सीमित नहीं है। सुरक्षा बलों ने ग्रामीणों के बीच जाकर संवाद और संपर्क का संदेश भी दिया। गृह मंत्रालय ने इसे विश्वास, राष्ट्रीय एकीकरण और दूरस्थ इलाकों तक पहुंच मजबूत करने की पहल बताया है। आधिकारिक बयान में कहा गया कि ग्रामीणों की भागीदारी अलगाव और भय से आत्मविश्वास, संपर्क और राष्ट्र से जुड़ाव की ओर बदलाव का संकेत है। यानी सुरक्षा, संपर्क. विकास और राष्ट्रभावना को एक साथ आगे बढ़ाने की कोशिश इस पूरी रणनीति का हिस्सा दिखाई देती है।

92 गांवों में पहली बार तिरंगा फहराया

स्वतंत्रता दिवस से पहले अधिकारियों ने बताया था कि बस्तर क्षेत्र के 92 गांवों में पहली बार राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। ये वे गांव हैं जिन्हें लंबे समय तक माओवादी प्रभाव वाले इलाकों के रूप में देखा जाता रहा। यह आंकड़ा बताता है कि बदलाव किसी एक गांव या एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। हालांकि अलग-अलग सरकारी और मीडिया रिपोर्टों में गांवों की संख्या अलग-अलग संदर्भों में दी गई है, इसलिए इसे व्यापक सुरक्षा और प्रशासनिक पहुंच के संकेत के तौर पर देखना ज्यादा उचित होगा।

Abujhmad Naxalism Tricolour: नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में ‘मन की दूरी’ खत्म करना अगली चुनौती

नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई केवल बंदूक से नहीं जीती जा सकती। सुरक्षा अभियान के बाद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या गांवों में स्थायी शांति, सड़क, स्कूल, अस्पताल, मोबाइल नेटवर्क, रोजगार और सरकारी योजनाओं की पहुंच कायम होती है। यहीं पर अबूझमाड़ की अगली कहानी लिखी जाएगी। तिरंगा फहराना एक मजबूत प्रतीक है, लेकिन उस प्रतीक को स्थायी बदलाव में बदलने के लिए सरकार को विकास और स्थानीय भागीदारी को लगातार मजबूत करना होगा।

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‘लाल गलियारे’ से विकास के गलियारे तक?

अबूझमाड़ को लंबे समय तक देश के सबसे कठिन नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में गिना जाता रहा। आज उसी इलाके में तिरंगा दिखाई देना एक बड़ा मनोवैज्ञानिक बदलाव है।राष्ट्रवादी नजरिए से देखें तो यह ‘लाल गलियारे’ के सिकुड़ने और भारत के संवैधानिक गलियारे के विस्तार की तस्वीर है। यह संदेश भी स्पष्ट है कि भारत का राज्य अपनी सीमाओं और शहरों तक सीमित नहीं है। देश का संविधान और राष्ट्रीय ध्वज उन जंगलों और पहाड़ियों तक भी पहुंच सकता है, जहां कभी सरकारी पहुंच को सबसे बड़ी चुनौती माना जाता था।

Abujhmad Naxalism Tricolour: असली जीत तब होगी, जब तिरंगे के साथ विकास भी पहुंचे

अबूझमाड़ की तस्वीर निश्चित तौर पर उत्साह पैदा करने वाली है। लेकिन इसे स्थायी सफलता में बदलने की जिम्मेदारी अब और बड़ी है। ग्रामीणों के हाथ में तिरंगा हो, बच्चों के हाथ में किताब हो, गांव तक सड़क हो, अस्पताल और स्कूल हों, युवाओं के लिए रोजगार हो और लोगों को अपनी सुरक्षा और भविष्य पर भरोसा हो. तभी नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई की वास्तविक और दीर्घकालिक जीत मानी जाएगी।

अबूझमाड़ में इस स्वतंत्रता दिवस की तस्वीर इसलिए खास है क्योंकि यहां सिर्फ झंडा नहीं बदला, माहौल बदलने का संकेत दिखाई दिया है। एक तरफ BSF के जवान गांव-गांव पहुंचकर ‘हर घर तिरंगा’ अभियान चला रहे हैं, दूसरी तरफ मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय नक्सलवाद के खिलाफ मिली सफलता को बस्तर के नए दौर से जोड़ रहे हैं। सरकारी आंकड़ों और अभियानों के बीच ग्रामीणों के हाथों में तिरंगा इस बदलाव की सबसे मजबूत तस्वीर बनकर सामने आया है।

कभी जहां बंदूक का डर था, वहां आज तिरंगे का सम्मान है। कभी जहां अलगाव की बात होती थी, वहां अब भारत से जुड़ाव की तस्वीर है। और अबूझमाड़ की पहाड़ियों के बीच लहराता तिरंगा पूछ रहा है- क्या बस्तर ने सचमुच नक्सलवाद के बाद एक नए युग में प्रवेश कर लिया है? आने वाले वर्षों में इस सवाल का जवाब शांति, विकास और जमीन पर बदलती जिंदगी देगी।

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