UP Election Women Voters: उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी समीकरण लंबे समय से जाति और धर्म के इर्द-गिर्द घूमते रहे हैं। लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों का फोकस एक ऐसे वोटर वर्ग पर बढ़ गया है, जिसकी संख्या करीब 6.09 करोड़ है। यह वर्ग है प्रदेश की महिला मतदाता। सवाल है कि आखिर महिला वोट 2027 में इतना बड़ा सियासी फैक्टर क्यों बन गया है?
करीब 6 करोड़ महिला वोटर, इसलिए बढ़ी राजनीतिक हलचल
उत्तर प्रदेश में महिला मतदाताओं की हिस्सेदारी कुल मतदाताओं की करीब 45.46 फीसदी है। यानी विधानसभा चुनाव में हर दो से ज्यादा मतदाताओं में करीब एक महिला होगी। यही संख्या राजनीतिक दलों के लिए इस वर्ग को नजरअंदाज करना मुश्किल बनाती है।
खास बात यह है कि महिला मतदाताओं की चुनावी भागीदारी भी लगातार बढ़ी है। 2012 के विधानसभा चुनाव में महिलाओं का मतदान प्रतिशत 60.3 फीसदी रहा था, जबकि पुरुषों का 58.7 फीसदी था। 2017 और 2022 में भी महिलाओं की मतदान भागीदारी पुरुषों से अधिक रही। 2024 के लोकसभा चुनाव में महिला मतदान प्रतिशत 57.22 फीसदी रहा, जबकि पुरुषों का 56.46 फीसदी था।
UP Election Women Voters: जाति से आगे निकल रहा महिला वोट?
यूपी में यादव, गैर-यादव ओबीसी, दलित, जाट, ब्राह्मण और मुस्लिम जैसे सामाजिक समीकरण चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा रहे हैं। लेकिन महिला मतदाता किसी एक जाति या समुदाय तक सीमित नहीं हैं। यही वजह है कि राजनीतिक दल महिला वोट को अलग सामाजिक समूह की तरह देखने लगे हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि महिलाएं एकमुश्त किसी एक पार्टी को वोट देंगी। जाति, धर्म, क्षेत्र और परिवार के साथ-साथ स्थानीय मुद्दे भी उनके फैसले को प्रभावित कर सकते हैं।
BJP के लिए महिला लाभार्थी मॉडल अहम
भाजपा के लिए महिला मतदाताओं तक पहुंच बनाने में कल्याणकारी योजनाएं और सीधे लाभ का मॉडल महत्वपूर्ण रहा है। मध्य प्रदेश की लाड़ली बहना और महाराष्ट्र की लाड़की बहिन जैसी योजनाओं के चुनावी प्रभाव ने दूसरे राज्यों की पार्टियों को भी महिला-केंद्रित योजनाओं पर जोर देने के लिए प्रेरित किया है। यूपी में भी योगी सरकार महिला स्वयं सहायता समूहों, आंगनबाड़ी, रोजगार और सुरक्षित परिवहन जैसी पहलों के जरिए महिलाओं तक पहुंच मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
UP Election Women Voters: अखिलेश ने भी चला बड़ा दांव
2027 से पहले सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने महिलाओं को लेकर आर्थिक सहायता का बड़ा वादा किया है। उन्होंने कहा है कि सत्ता में आने पर महिलाओं को सालाना 40 हजार रुपये दिए जाएंगे और राशि में हर साल बढ़ोतरी की जाएगी। इस ऐलान को भाजपा की महिला-केंद्रित योजनाओं की काट के तौर पर देखा जा रहा है। यानी चुनाव अभी दूर है, लेकिन महिला वोट के लिए BJP और सपा के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा शुरू हो चुकी है।
कांग्रेस भी पीछे नहीं
कांग्रेस भी महिला मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर सकती है। 2022 के चुनाव में पार्टी ने ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ अभियान के जरिए महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा बनाया था। 2027 में पार्टी इस मुद्दे को नए सिरे से चुनावी रणनीति का हिस्सा बना सकती है।
UP Election Women Voters: क्या महिला वोट एकजुट होकर किसी एक दल को जाएगा?
यही 2027 के चुनाव का सबसे बड़ा सवाल होगा। जाटव, मुस्लिम, गैर-यादव ओबीसी या सवर्ण महिला की प्राथमिकताएं एक जैसी होना जरूरी नहीं है। ऐसे में महिला वोट को एक सिंगल वोट बैंक मानना राजनीतिक रूप से सही नहीं होगा। महंगाई, रोजगार, महिला सुरक्षा, कानून-व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, सरकारी योजनाओं का लाभ और स्थानीय उम्मीदवार जैसे मुद्दे महिला मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं।
असली मुकाबला ‘महिला वोट’ को लेकर
2027 के यूपी चुनाव में जातीय समीकरण अपनी जगह महत्वपूर्ण रहेंगे, लेकिन महिला मतदाताओं की बढ़ती संख्या और मतदान में उनकी सक्रिय भागीदारी ने उन्हें अलग राजनीतिक फैक्टर बना दिया है। भाजपा के पास लाभार्थी योजनाओं और सरकारी डिलीवरी का मॉडल है, जबकि सपा आर्थिक सहायता के वादों के जरिए महिला मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस के सामने अपनी महिला-केंद्रित राजनीति को जमीन पर मजबूत करने की चुनौती होगी।
इसलिए 2027 की लड़ाई सिर्फ MY, OBC, दलित या जाट समीकरणों की नहीं होगी। असली सवाल यह भी होगा कि कौन सा दल महिला मतदाता को अपने पक्ष में करने के साथ उसकी प्राथमिकताओं और भरोसे को वोट में बदल पाता है। यही कारण है कि यूपी की ‘आधी आबादी’ 2027 के चुनाव का सबसे बड़ा सियासी फैक्टर बनती दिखाई दे रही है।








