New Delhi: महाराष्ट्र के अमरावती जिला महिला अस्पताल के एनआईसीयू (NICU) वार्ड में सोमवार 24 अगस्त की सुबह करीब 3:30 बजे आग लग गई।इससे वहां भर्ती 3 नवजात बच्चों की मौत हो गई।अस्पताल के तीसरी मंजिल पर स्थित चाइल्ड केयर यूनिट में 39 नवजात भर्ती थे।अच्छी बात है कि अस्पताल कर्मियों ने तत्परता और संवेदना दिखाते हुए 36 नवजात बच्चों को कालकवलित होने से बचा लिया, लेकिन इस हादसे ने अस्पतालों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर तमाम सवाल खड़े कर दिये हैं।
कितना सजग था प्रशासन?
हालांकि प्रशासन ने अस्पताल में आग लगने पर उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं, लेकिन सवाल यह है कि सुरक्षा को लेकर प्रशासन पहले से कितना सजग था? शुरुआती जांच में वेंटिलेटर के अंदर शॉर्ट सर्किट, स्पार्किंग या अचानक हुए विस्फोट (ब्लास्ट) को आग लगने की वजह माना गया है।सवाल यह भी है कि क्या किसी अस्पताल में शॉर्ट सर्किट, स्पार्किंग या वेंटिलेटर में धमाके की यह पहली घटना है? क्या प्रशासन को इस बात का अहसास नहीं था कि इस तरह के हादसे पहले भी अस्पतालों में होते रहे हैं?
New Delhi: अतीत से कब सबक लिया जाएगा?
देश के किसी अस्पताल में आग लगने की यह कोई पहली घटना नहीं है, बल्कि यह सिलसिला वर्षों से चला आ रहा है।हैरानी की बात है कि जिन अस्पतालों में लोग जीवन की नई उम्मीद से भर्ती होते हैं, वही उनका जीवन छीन लेते हैं।साफ है कि अतीत से सबक लिया जाता, तो बार-बार अस्पतालों में आग लगने की घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं होती।
देश में इस तरह के बहुत से उदाहरण हैं, जब विभिन्न अस्पतालों में शॉर्ट सर्किट, वेंटिलेटर या एसी में धमाकों के चलते आग लगने के दर्दनाक हादसे हुए हैं।दिसंबर 2011 में कोलकाता के एएमआरआई (AMRI) अस्पताल के बेसमेंट में भयंकर आग लगी थी।उस समय अस्पताल में धुआं फैलने से 94 मरीजों की दम घुटने से जानें चली गई थी।
New Delhi: एक तरफ महामारी तो दूसरी तरफ आग
9 जनवरी 2021 की रात को महाराष्ट्र के भंडारा जिला अस्पताल में शॉर्ट सर्किट के कारण सिक न्यूबॉर्न केयर यूनिट (SNCU) में भर्ती 10 नवजात बच्चों की जानें चली गई थी, जबकि 7 बच्चों को सुरक्षित बचा लिया गया था।इसी साल 30 अप्रैल और 1 मई की मध्यरात्रि को गुजरात के भरूच स्थित पटेल वेलफेयर अस्पताल के आईसीयू में भीषण आग लगने से 16 कोविड मरीजों और 2 स्टाफ नर्सों सहित कुल 18 लोगों की मौत हो गई थी।आईसीयू वार्ड में उस समय 24 मरीज भर्ती थे।अधिकांश की मौतें धुएं के कारण हुई थी।
New Delhi: पहले भी जले अस्पतालों में बच्चे
15 नवंबर 2024 की रात को उत्तर प्रदेश के झाँसी स्थित महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज के एनआईसीयू (NICU) वार्ड में भीषण आग लग गई थी। इस दर्दनाक हादसे में 10 नवजात बच्चों की मौत हो गई थी, जबकि कई अन्य झुलस गए थे। वार्ड में 49 बच्चे भर्ती थे। आग शॉर्ट सर्किट होने से लगी। इसी वर्ष दिल्ली के विवेक विहार स्थित एक निजी बाल चिकित्सालय में शॉर्ट सर्किट होने के कारण आग लग गई थी।इस हादसे में 7 बच्चों की मौत हो गई थी। इस साल 14-15 मार्च 2026 की रात को ओडिशा में कटक स्थित श्रीराम चंद्र भंज (SCB) मेडिकल कॉलेज अस्पताल आग लग गई थी। इस हादसे में 12 लोग मारे गए। इस आग का कारण शॉर्ट सर्किट बताया गया था।
New Delhi: कब तक होते रहेंगे शॉर्ट सर्किट?
जानकारों के मुताबिक अस्पतालों में आग लगने का प्रमुख कारण विद्युत शॉर्ट सर्किट और ओवरलोडिंग है, जो पुराने तारों, एसी के अत्यधिक उपयोग और क्षमता से अधिक बिजली के इस्तेमाल से होता है। इससे बचने के लिए आईसीयू या एनआईसीयू में वेंटिलेटर, इनक्यूबेटर और एसी की जांच होती रहनी चाहिए।आईसीयू या ऑपरेशन थिएटर में मेडिकल ऑक्सीजन लीक होने या उसकी मौजूदगी से आग की छोटी सी चिंगारी भी विकराल रूप धारण कर लेती है।समय-समय पर यह भी देखना होता है कि सुरक्षा उपकरण ठीक हैं या नहीं, कहीं सुरक्षा नियमों में कोई कोताही तो नहीं बरती जा रही है? इसके साथ ही यह भी ध्यान रखना होता है कि अस्पताल के कर्मचारियों को आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए प्रशिक्षिण दिया जाता है या नहीं?
New Delhi: क्या जांच के निर्देश ही काफी हैं?
अंत में सबसे अहम सवाल यह है कि क्या अस्पतालों में आग की घटनाओं पर हर बार जांच के उच्च स्तरीय आदेश देकर कर्तव्य की इतिश्री कर की जाती रहेगी? आखिर कौन गारांटी दे सकता है कि भविष्य में अस्पतालों में लोग आग से नहीं जलेंगे?








