Indus Water Treaty: सिंधु जल संधि को लेकर पाकिस्तान की ओर से उठाए गए विवाद पर सुनवाई करते हुए ‘परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन’ (PCA) ने भारत के खिलाफ दो और आदेश जारी किए हैं। कोर्ट ने कहा कि भारत का संधि को ‘स्थगित’ रखने का फैसला संधि की शर्तों या अंतरराष्ट्रीय कानून के लागू नियमों के तहत उचित नहीं था।कोर्ट के मुताबिक, भारत और पाकिस्तान के बीच छह नदियों के पानी के बंटवारे से जुड़ी सिंधु जल संधि पूरी तरह प्रभावी रही और भारत इसके प्रावधानों का पालन करने के लिए बाध्य था।इसके साथ ही कोर्ट ने भारत को ‘रतले हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट’ पर निर्माण कार्य रोकने का निर्देश भी दिया है। यह वही मांग है जिसे पाकिस्तान ने तकनीकी विवाद के पूरी तरह समाधान होने तक उठाया था।
भारत पहले से ही नहीं मानता PCA की प्रक्रिया
भारतीय सरकार को इन दोनों आदेशों की पहले से ही उम्मीद थी। भारत पिछले करीब चार साल से चल रही इस आर्बिट्रेशन प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है। उसका कहना है कि इस कोर्ट का गठन खुद सिंधु जल संधि की शर्तों के खिलाफ जाकर किया गया है।इसी विवाद को सुलझाने के लिए पहले ही एक ‘न्यूट्रल एक्सपर्ट’ यानी तटस्थ विशेषज्ञ नियुक्त किया जा चुका था। भारत का तर्क है कि संधि एक ही विवाद के लिए एक साथ अलग-अलग समाधान प्रक्रियाओं की अनुमति नहीं देती।इसी वजह से भारत ने कहा कि इस कोर्ट के पास मामले पर सुनवाई करने का वैध अधिकार नहीं है। उसने कोर्ट के अस्तित्व और उसकी कार्यवाही को मानने से भी इनकार कर दिया। भारत ने इस प्रक्रिया में अपने दो आर्बिट्रेटर यानी मध्यस्थ भी नियुक्त नहीं किए।इसके बावजूद कोर्ट ने अपनी कार्यवाही जारी रखी। इसमें पाकिस्तान की ओर से नियुक्त दो आर्बिट्रेटर और संधि में निर्धारित संस्थाओं की ओर से नामित तीन अंपायर शामिल रहे।

Indus Water Treaty: भारत ने आदेशों को किया खारिज
सोमवार को जारी इन दोनों आदेशों पर भारत की प्रतिक्रिया भी पहले से तय रुख के मुताबिक रही। विदेश मंत्रालय ने कहा कि जिस कोर्ट को तथाकथित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन बताया जा रहा है, उसका गठन वर्ल्ड बैंक ने संधि की शर्तों का स्पष्ट उल्लंघन करते हुए किया था।भारत ने कहा कि वह इस तथाकथित कोर्ट के फैसले को पूरी तरह खारिज करता है। उसका कहना है कि उसने कभी भी इस तरह गठित कोर्ट के कानूनी अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया है।भारत का यह भी स्पष्ट रुख है कि सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का उसका फैसला आगे भी लागू रहेगा।
PCA का यह चौथा फैसला
सोमवार को आए ये दोनों आदेश कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के चौथे फैसले हैं और अब तक इसके सभी फैसले पाकिस्तान के पक्ष में रहे हैं।सितंबर 2022 में गठित इस कोर्ट ने अपने पहले के फैसलों में कई महत्वपूर्ण बातें कही थीं। इनमें एक यह भी था कि वह इस विवाद पर फैसला देने का अधिकार रखता है।दिसंबर 2022 में कोर्ट ने वर्ल्ड बैंक को लिखे एक पत्र में भारत की आपत्तियों को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने यह भी कहा था कि उसके फैसले अंतिम होंगे और दोनों देशों के लिए उनका पालन करना जरूरी होगा।भारत ने इन सभी फैसलों को उसी समय अस्वीकार कर दिया था। इस प्रक्रिया में पिछला फैसला इसी साल मई में आया था।अब सोमवार के आदेश जारी होने के साथ कोर्ट ने पाकिस्तान की ओर से उठाए गए सभी मुद्दों पर अपनी कार्यवाही पूरी कर ली है।
Indus Water Treaty: कोर्ट के आदेशों का भारत पर कितना असर?
कोर्ट के पास अपने आदेशों को जबरन लागू कराने का कोई सीधा तरीका नहीं है। ऐसे में भारत के मौजूदा रुख को देखते हुए इन आदेशों से जमीन पर स्थिति में कोई बड़ा बदलाव होने की संभावना नहीं है।हालांकि, पाकिस्तान के लिए ये आदेश काफी महत्वपूर्ण हैं। वह संभवतः इन्हें अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ इस्तेमाल करेगा। साथ ही, देश के भीतर भी इन फैसलों के जरिए भारत के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश की जा सकती है।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे की कानूनी कार्रवाई के विकल्प तलाशने में भी ये आदेश पाकिस्तान के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित हो सकते हैं।
पाकिस्तान के लिए आगे के विकल्प
एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान आगे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UN Security Council में भारत के खिलाफ प्रस्ताव लाने की कोशिश कर सकता है। इसमें सिंधु जल संधि से जुड़े विवाद को सुरक्षा का मुद्दा बताने की कोशिश की जा सकती है।पाकिस्तान इस दिशा में काम भी कर रहा है। माना जा रहा है कि सुरक्षा परिषद के गैर-स्थायी सदस्य के रूप में अपने कार्यकाल के बचे करीब चार महीनों में वह इस मुद्दे को आगे बढ़ाने का प्रयास कर सकता है।इसके अलावा एक विकल्प यह भी हो सकता है कि सुरक्षा परिषद या संयुक्त राष्ट्र महासभा इस मामले को इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस यानी ICJ के पास भेजने की कोशिश करे।हालांकि, ये विकल्प काफी मुश्किल नजर आते हैं। पाकिस्तान की इच्छा के अनुसार ऐसा होना आसान नहीं होगा। संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थिति और प्रभाव को देखते हुए भारत ऐसी कोशिशों को रोकने में सक्षम हो सकता है।
Indus Water Treaty: भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव
इन कानूनी और कूटनीतिक प्रयासों के अलावा पाकिस्तान के पास एक और रास्ता है। वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसा नैरेटिव तैयार कर सकता है जिसमें भारत को अंतरराष्ट्रीय कानून और संधि की शर्तों का पालन नहीं करने वाले देश के रूप में पेश किया जाए।पाकिस्तान पहले से ही इस दिशा में प्रयास कर रहा है और आने वाले समय में इन कोशिशों के और तेज होने की संभावना है।

भारत भी कानूनी लड़ाई के लिए तैयार
भारत ने इन संभावित परिस्थितियों से निपटने की तैयारी कर ली है। कूटनीतिक स्तर पर पाकिस्तान के नैरेटिव का जवाब देने की रणनीति बनाई जा रही है। जरूरत पड़ने पर भारत कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए भी तैयार है।भारत का मानना है कि उसके पास अपने फैसले का बचाव करने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार मौजूद है। उसे भरोसा है कि वह सिंधु जल संधि को कुछ समय के लिए ‘एबेयंस’ यानी स्थगित रखने के अपने फैसले को सही ठहरा सकता है।
Indus Water Treaty: भारत के लिए आगे की प्राथमिकता
भारत का मुख्य ध्यान अब उन परियोजनाओं को तेजी से पूरा करने पर है, जिनके जरिए वह सिंधु जल संधि के तहत पाकिस्तान को आवंटित तीन पश्चिमी नदियों सिंधु, झेलम और चिनाब पर अपने अधिकारों का अधिकतम इस्तेमाल कर सके।संधि भारत को इन नदियों के पानी के सीमित उपयोग की अनुमति देती है। हालांकि, अब तक भारत इस अधिकार का पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर पाया है। इसकी एक बड़ी वजह यह रही है कि जब भी भारत इन नदियों पर किसी परियोजना का निर्माण करता है, पाकिस्तान उस पर आपत्ति दर्ज करा देता है।
भारत जम्मू-कश्मीर में इन नदियों से जुड़े करीब 50,000 करोड़ रुपये की लागत वाले आठ इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है।इनमें कम से कम एक परियोजना ऐसी है, जिसमें चिनाब नदी के पानी को ब्यास नदी की ओर मोड़ने की योजना है। यह संधि में दी गई व्यवस्था से आगे जाता है, क्योंकि सिंधु जल संधि नदियों के बीच पानी के इंटर-बेसिन ट्रांसफर की अनुमति नहीं देती।
भारत के लिए संधि लगभग खत्म
भारत अपना रुख तय कर चुका है। उसके नजरिए से सिंधु जल संधि अब लगभग समाप्त हो चुकी है।हालांकि, भारत जानबूझकर ‘एबेयंस’ यानी कुछ समय के लिए स्थगित रखने जैसे शब्द का इस्तेमाल कर रहा है। इसकी वजह यह है कि संधि में उसे एकतरफा तरीके से खत्म या सस्पेंड करने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।लेकिन भारत की सोच के अनुसार, व्यवहारिक तौर पर यह संधि अब अस्तित्व में नहीं है।यही कारण है कि भारत पिछले साल ‘न्यूट्रल एक्सपर्ट प्रोसेस’ से भी बाहर हो गया था। खास बात यह है कि इस प्रक्रिया को शुरू करने का अनुरोध खुद भारत ने किया था।
हाइड्रोलॉजिकल डेटा अभी भी साझा कर रहा भारत
भारत और पाकिस्तान के बीच हाइड्रोलॉजिकल यानी नदी और पानी से जुड़ा डेटा साझा करना अभी भी जारी है। हालांकि, भारत यह जानकारी इस्लामाबाद स्थित अपने उच्चायोग के माध्यम से साझा करता है।यह जानकारी अब संधि के तहत बनाए गए ‘परमानेंट इंडस कमीशन’ के जरिए साझा नहीं की जा रही है।भारत के लिए न्यूट्रल एक्सपर्ट प्रक्रिया में बने रहना या परमानेंट इंडस कमीशन के माध्यम से जानकारी साझा करना इस बात का संकेत माना जा सकता है कि वह अभी भी सिंधु जल संधि के प्रावधानों का इस्तेमाल कर रहा है। यह उसके उस रुख से अलग होगा जिसमें वह संधि के अस्तित्व को ही स्वीकार नहीं करता।
Indus Water Treaty: संधि के दोबारा लागू होने की संभावना कम
मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए सिंधु जल संधि के अपने पुराने स्वरूप में दोबारा लागू होने की संभावना लगभग न के बराबर दिखाई देती है।भारत का कहना है कि जब तक पाकिस्तान सीमा-पार आतंकवाद को समर्थन देता रहेगा, तब तक संधि ‘स्थगित’ रहेगी।भारत ने दोनों देशों के बीच संधि पर नए सिरे से बातचीत का सुझाव भी दिया है। हालांकि, पाकिस्तान के इसके लिए तैयार होने की संभावना कम है।पाकिस्तान को पता है कि नई बातचीत के बाद उसे मौजूदा संधि जितनी अनुकूल व्यवस्था शायद नहीं मिल पाएगी।वहीं, भारत लगभग निश्चित रूप से किसी तीसरे पक्ष, जैसे वर्ल्ड बैंक, की भूमिका के बिना पूरी तरह द्विपक्षीय समझौते पर जोर देगा। पाकिस्तान इस व्यवस्था को स्वीकार करेगा या नहीं, यह भी बड़ा सवाल है।

बिना संधि के भी जारी रह सकता है पानी का बंटवारा
आने वाले समय में सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच बना गतिरोध जल्द खत्म होता नजर नहीं आ रहा है।ऐसे में दोनों देशों के बीच बहने वाली सीमा-पार नदियां किसी औपचारिक जल-बंटवारा समझौते के बिना भी बहती रह सकती हैं।यह दुनिया में कोई असामान्य स्थिति नहीं है। दुनियाभर में ऐसे सैकड़ों उदाहरण मौजूद हैं, जहां सीमा-पार बहने वाली नदियों को लेकर कोई औपचारिक जल-बंटवारा समझौता नहीं है।भारत खुद चीन, भूटान, नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार के साथ कई नदियां साझा करता है। इनमें से ज्यादातर नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर कोई औपचारिक व्यवस्था मौजूद नहीं है।
भारत पानी रोक नहीं रहा
सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का अर्थ यह नहीं है कि भारत ने पाकिस्तान को नदी का पानी देना बंद कर दिया है। अगर भारत ऐसा करना चाहे भी, तो वह पूरी तरह से पानी रोक नहीं सकता।पाकिस्तान को पहले की तरह ही नदी का पानी मिलता रहेगा। भारत द्वारा पश्चिमी नदियों पर अपनी सभी परियोजनाएं पूरी कर लेने के बाद भी पाकिस्तान को पानी मिलता रहेगा।आबादी बढ़ने और जलवायु परिवर्तन के कारण प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता भले ही कम हुई है, लेकिन सिंधु नदी प्रणाली में अभी भी इतना पानी मौजूद है कि भारत और पाकिस्तान के सिंधु बेसिन में रहने वाले लोगों की जरूरतें पूरी की जा सकती हैं।
Indus Water Treaty: पाकिस्तान की असली समस्या क्या है?
पाकिस्तान में पानी की कमी का कारण सिर्फ यह नहीं है कि भारत पानी का बहाव रोक रहा है या उसमें किसी तरह की रुकावट डाल रहा है।एक बड़ी समस्या पाकिस्तान में पानी के प्रबंधन की भी है। वहां उपलब्ध पानी का सही तरीके से इस्तेमाल और प्रबंधन नहीं हो पाता।भारत की ओर से सिंधु जल संधि को स्थगित रखने के फैसले से पैदा हुई अनिश्चितता संभव है कि पाकिस्तान को अपने जल प्रबंधन के तरीकों में सुधार करने के लिए मजबूर करे।इसके साथ ही उसे पानी के भंडारण की बेहतर सुविधाएं तैयार करने और उपलब्ध जल संसाधनों का अधिक समझदारी से इस्तेमाल करने की दिशा में भी काम करना पड़ सकता है।








