PM Modi-Xi Jinping Meeting: गलवान घाटी की हिंसक झड़प के छह साल बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक बार फिर आमने-सामने होंगे। 12 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाली संभावित द्विपक्षीय बातचीत पर इसलिए खास नजर है, क्योंकि यह मुलाकात ऐसे वक्त हो रही है जब भारत-चीन संबंधों में तनाव कम करने की कोशिशें दिखाई दे रही हैं। सवाल है- क्या दोनों देश फिर से रिश्तों को सामान्य करने की दिशा में बढ़ रहे हैं? चीन को भारत की जरूरत क्यों है और क्या नई दिल्ली को बीजिंग पर दोबारा भरोसा करना चाहिए?
जून 2020 में गलवान घाटी की हिंसा ने भारत-चीन संबंधों को गहरे संकट में डाल दिया था। सीमा पर तनाव बढ़ा, दोनों देशों ने सैनिकों की भारी तैनाती की और वर्षों से बने राजनीतिक भरोसे को बड़ा झटका लगा। इसके बाद भारत ने साफ कर दिया कि सीमा पर शांति और स्थिरता के बिना रिश्तों को सामान्य नहीं माना जा सकता। अब छह साल बाद शी जिनपिंग का भारत दौरा और मोदी-शी की संभावित मुलाकात एक नए दौर की शुरुआत का संकेत दे सकती है।
गलवान के बाद पहली बार भारत में आमने-सामने होंगे मोदी-शी
गलवान के बाद मोदी और शी की पहली द्विपक्षीय बातचीत अक्टूबर 2024 में रूस के कजान में हुई थी। इसके बाद अगस्त 2025 में तियानजिन में SCO के दौरान भी दोनों नेताओं की मुलाकात हुई। लेकिन अब नई दिल्ली में संभावित बैठक का महत्व अलग बताया जा रहा है। चीन के राष्ट्रपति करीब सात साल बाद भारत आ रहे हैं और 12-13 सितंबर को होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे।
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत दौरे से पहले चीन के विदेश मंत्रालय ने पुष्टि की है कि जिनपिंग BRICS शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए भारत आएंगे और सम्मेलन को संबोधित भी करेंगे। चीनी विदेश मंत्रालय के मुताबिक शी जिनपिंग शिखर सम्मेलन में भाषण देंगे और मौजूदा अंतरराष्ट्रीय हालात पर वैश्विक नेताओं के साथ चर्चा करेंगे।
PM Modi-Xi Jinping Meeting: गलवान ने भारत का भरोसा क्यों तोड़ा?
गलवान की घटना सिर्फ सीमा पर हुई एक झड़प नहीं थी। इसने भारत में चीन के साथ रिश्तों को लेकर बनी कई धारणाओं को बदल दिया था। भारत और चीन के बीच व्यापार और कूटनीतिक संवाद जारी रहा, लेकिन सीमा पर लगातार से भरोसे का संकट बना रहा। नई दिल्ली का संदेश लगातार यही रहा कि एक तरफ सीमा पर तनाव और दूसरी तरफ सामान्य संबंध दोनों एक साथ नहीं चल सकते। इसीलिए मोदी-शी बातचीत में LAC सबसे अहम मुद्दों में से एक रह सकता है।

आखिर अब चीन को भारत की जरूरत क्यों है?
चीन के भारत के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिशों के पीछे सिर्फ कूटनीति नहीं, बल्कि उसके आर्थिक और रणनीतिक हित भी हो सकते हैं। भारत का विशाल बाजार चीन के लिए महत्वपूर्ण है। भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, औद्योगिक सामान और कई दूसरे क्षेत्रों में चीनी कंपनियों की बड़ी कारोबारी हिस्सेदारी है। इसके अलावा वैश्विक कंपनियां चीन पर अपनी निर्भरता कम करने और सप्लाई चेन को अलग-अलग देशों में फैलाने की कोशिश कर रही हैं। ऐसे में भारत तेजी से एक वैकल्पिक मैन्युफैक्चरिंग और निवेश केंद्र के रूप में उभर रहा है। चीन के लिए भारत से पूरी तरह टकराव वाला रिश्ता उसके आर्थिक हितों के लिहाज से भी फायदेमंद नहीं है।
PM Modi-Xi Jinping Meeting: BRICS में भी भारत को नजरअंदाज करना आसान नहीं
भारत और चीन BRICS के महत्वपूर्ण सदस्य हैं। दोनों देश वैश्विक दक्षिण, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर कई जगह समान या मिलते-जुलते हित रखते हैं। ऐसे में चीन के लिए भारत के साथ संवाद बनाए रखना रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर, भारत अमेरिका के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को लगातार मजबूत कर रहा है। चीन के नजरिए से देखें तो भारत का पूरी तरह उसके विरोधी खेमे में जाना उसके लिए बड़ी रणनीतिक चुनौती हो सकता है।
क्या इसका मतलब चीन अब भारत से दोस्ती चाहता है?
जरूरी नहीं। यही वह जगह है जहां भारत को सबसे ज्यादा सावधानी बरतनी होगी। मोदी और शी की बैठक होना, बातचीत बढ़ना या व्यापारिक रिश्तों में सुधार की कोशिश होना अलग बात है। इसे तुरंत भारत-चीन के बीच पुराने भरोसे की वापसी नहीं माना जा सकता। गलवान के बाद भारत के लिए सबसे बड़ा सबक यही रहा है कि कूटनीतिक बातचीत के साथ जमीन पर होने वाली गतिविधियों पर भी लगातार नजर जरूरी है।
PM Modi-Xi Jinping Meeting: भारत को किन मुद्दों पर नहीं हटना चाहिए पीछे?
मोदी-शी बातचीत में भारत के सामने कुछ स्पष्ट प्राथमिकताएं होनी चाहिए। LAC पर वास्तविक शांति: सिर्फ बातचीत और बयान पर्याप्त नहीं होंगे। सीमा पर सैनिकों की तैनाती, गश्त और बुनियादी ढांचे की स्थिति महत्वपूर्ण रहेगी। आर्थिक निर्भरता कम करना: चीन के साथ व्यापार जरूरी हो सकता है, लेकिन रणनीतिक क्षेत्रों में जरूरत से ज्यादा निर्भरता जोखिम बढ़ा सकती है। तकनीकी सुरक्षा: टेलीकॉम, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, इलेक्ट्रॉनिक्स और महत्वपूर्ण तकनीकी आपूर्ति श्रृंखलाओं में राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। समझौते का सत्यापन: किसी भी सहमति को सिर्फ कागज पर नहीं, बल्कि उसके जमीन पर लागू होने से परखा जाना चाहिए।
भारत को चीन के साथ क्या रणनीति रखनी चाहिए?
भारत के लिए शायद सबसे व्यावहारिक रास्ता “संवाद भी और सतर्कता भी” है। चीन से बातचीत बंद करना भारत के हित में नहीं है। दोनों देशों के बीच व्यापार, सीमा, क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक मंचों पर सहयोग जैसे कई मुद्दे ऐसे हैं जिन्हें बातचीत के जरिए ही संभाला जा सकता है। लेकिन बातचीत का मतलब यह भी नहीं होना चाहिए कि गलवान के बाद पैदा हुए सुरक्षा सबक को भुला दिया जाए। भारत को चीन के साथ आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों को आगे बढ़ाते हुए अपनी सीमा पर बुनियादी ढांचा, सैन्य तैयारियां और रणनीतिक क्षमता मजबूत रखनी होगी।
PM Modi-Xi Jinping Meeting: क्या मोदी-शी मुलाकात रिश्तों का नया अध्याय लिखेगी?
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। अगर बैठक होती है और दोनों नेता LAC पर स्थायी शांति, व्यापारिक असंतुलन और आपसी भरोसे जैसे मुद्दों पर ठोस प्रगति की दिशा तय करते हैं, तो यह रिश्तों में सकारात्मक बदलाव की शुरुआत हो सकती है। लेकिन अगर बातचीत सिर्फ कूटनीतिक शिष्टाचार तक सीमित रहती है और जमीन पर स्थिति नहीं बदलती, तो इसे बड़े बदलाव के तौर पर देखना मुश्किल होगा।
छह साल बाद सबसे बड़ा सवाल
गलवान के बाद भारत और चीन के बीच सबसे बड़ा नुकसान भरोसे का हुआ है। अब उस भरोसे को सिर्फ एक बैठक से वापस नहीं लाया जा सकता। मोदी-शी की संभावित मुलाकात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह तय कर सकती है कि दोनों देश टकराव से नियंत्रित प्रतिस्पर्धा और संवाद की ओर बढ़ेंगे या फिर पुराने तनाव की छाया बनी रहेगी। भारत के लिए संदेश साफ होना चाहिए – चीन से बातचीत जरूरी है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा की कीमत पर नहीं। और इस बार असली परीक्षा सिर्फ यह नहीं होगी कि मोदी और शी एक-दूसरे से क्या कहते हैं, बल्कि यह होगी कि बातचीत के बाद LAC पर क्या बदलता है।








