Global South: नई दिल्ली में आयोजित BRICS समिट में हिस्सा लेने के लिए दुनिया के कई देशों के नेता भारत पहुंचे हैं। इस साल भारत BRICS की अध्यक्षता कर रहा है। ऐसे में विकासशील देशों की आवाज को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले फैसलों में मजबूत बनाने पर खास ध्यान दिया जा रहा है। नई दिल्ली घोषणापत्र में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में विकासशील देशों की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत बताई गई है। इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में सुधार का भी समर्थन किया गया है। पिछले कुछ दिनों से ‘ग्लोबल साउथ’ शब्द लगातार चर्चा में है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिर ग्लोबल साउथ क्या है और वर्तमान समय में इसकी अहमियत क्यों बढ़ गई है।
Global South: क्या है ग्लोबल साउथ?
‘ग्लोबल साउथ’ एक राजनीतिक और आर्थिक शब्द है। आमतौर पर इसका इस्तेमाल एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और कैरिबियन क्षेत्र के विकासशील और तेजी से उभर रहे देशों के लिए किया जाता है। हालांकि, इसे कोई निश्चित भौगोलिक समूह नहीं माना जाता। ग्लोबल साउथ में ऐसे देश भी शामिल हो सकते हैं, जो उत्तरी गोलार्ध में स्थित हैं। यह शब्द मुख्य रूप से देशों के बीच आर्थिक स्थिति, विकास, ऐतिहासिक अनुभव और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में उनके प्रभाव के अंतर को बताता है। इसका संबंध केवल किसी देश की भौगोलिक स्थिति से नहीं है।
यह भी जरूरी है कि ग्लोबल साउथ के सभी देशों की राजनीति, विदेश नीति या आर्थिक हित एक जैसे नहीं हैं। भारत, चीन, ब्राजील, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, सऊदी अरब और मिस्र जैसे देशों की अपनी-अपनी प्राथमिकताएं हैं। फिर भी इनमें से कई देशों को एक बात जोड़ती है। वे चाहते हैं कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय शासन से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों में उनकी भूमिका और प्रभाव ज्यादा हो।

क्यों बढ़ी ग्लोबल साउथ की अहमियत?
पिछले कुछ समय में विकासशील देशों की आर्थिक ताकत में बड़ा बदलाव आया है। UN ट्रेड एंड डेवलपमेंट यानी UNCTAD के अनुसार, 2023 में ग्लोबल साउथ की हिस्सेदारी दुनिया की GDP में 42%, वस्तुओं के निर्यात में 44% और आने वाले विदेशी प्रत्यक्ष निवेश यानी FDI में 65% थी।इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में इन देशों की बढ़ती आर्थिक ताकत के हिसाब से उनका प्रतिनिधित्व नजर नहीं आता। ग्लोबल साउथ के देशों की सुधार की मांग का मुख्य कारण यही है। उनका मानना है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था में काफी बदलाव हो चुका है, लेकिन उसे संचालित करने वाली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाएं उसी गति से नहीं बदली हैं।इसलिए विकासशील देशों की मांग केवल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ज्यादा सीटें हासिल करने तक सीमित नहीं है। वे चाहते हैं कि वैश्विक नियम बनाने की प्रक्रिया में भी उनकी भूमिका पहले से ज्यादा हो।
Global South: ग्लोबल साउथ के लिए BRICS क्यों जरूरी?
BRICS ऐसा महत्वपूर्ण मंच है, जहां उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं एक साथ आकर अपनी सामूहिक ताकत बढ़ा सकती हैं। इसकी शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ हुई थी। बाद में दक्षिण अफ्रीका भी इसमें शामिल हुआ और समूह का विस्तार हुआ। अब BRICS में 11 सदस्य देश हैं। इससे इसके भौगोलिक और आर्थिक दायरे में काफी बढ़ोतरी हुई है।रॉयटर्स के अनुसार, BRICS दुनिया की 40% से ज्यादा आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के करीब एक-चौथाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है।BRICS की खासियत यह है कि इसमें ऐसे देश शामिल हैं, जिनकी भू-राजनीतिक सोच कई मामलों में अलग हो सकती है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था को लेकर उनकी कुछ चिंताएं समान हैं। यही वजह है कि BRICS को केवल एक नए समूह के तौर पर नहीं देखा जाता। इसका एक उद्देश्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं को मिलकर अपनी बात रखने और सामूहिक मोल-भाव की ताकत बढ़ाने का अवसर देना भी है।
ग्लोबल साउथ की प्रमुख मांगें क्या हैं?
दिल्ली में हुई BRICS समिट के दौरान ग्लोबल साउथ से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दे सामने आए। इनमें कुछ ऐसे विषय हैं, जिनका असर दुनिया के अलग-अलग देशों पर पड़ सकता है।
अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में ज्यादा प्रतिनिधित्व: BRICS ने संयुक्त राष्ट्र, जिसमें सुरक्षा परिषद भी शामिल है, के साथ-साथ IMF और वर्ल्ड बैंक में बड़े सुधारों की मांग की। चीन और रूस ने संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था में भारत और ब्राजील की बड़ी भूमिका का समर्थन किया।
वैश्विक व्यापार में मजबूत आवाज: नई दिल्ली घोषणापत्र में एकतरफा टैरिफ, संरक्षणवादी नीतियों और आर्थिक दबाव की आलोचना की गई। इसके पीछे विचार यह है कि बड़ी आर्थिक शक्तियों के फैसलों का असमान बोझ विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर नहीं पड़ना चाहिए।
वित्तीय विकल्पों का विस्तार: BRICS फिलहाल किसी एक साझा मुद्रा को अपनाने की दिशा में आगे नहीं बढ़ रहा है। इसके बजाय स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन, अलग-अलग भुगतान प्रणालियों को आपस में जोड़ने, सीमा पार भुगतान और न्यू डेवलपमेंट बैंक को मजबूत करने पर ध्यान दिया जा रहा है। समिट में भारत ने डिजिटल भुगतान प्रणालियों को जोड़ने और केंद्रीय बैंकों की डिजिटल मुद्राओं के बीच आपसी संपर्क की संभावनाएं तलाशने का सुझाव भी दिया।
टेक्नोलॉजी तक पहुंच: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, क्वांटम टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर और दूसरी नई तकनीकें भी BRICS के एजेंडे में शामिल हो चुकी हैं। भारत ने अपनी अध्यक्षता के दौरान तकनीकी सहयोग को ग्लोबल साउथ की जरूरतों से जोड़ने पर जोर दिया।
Global South: नियम मानने वालों से नियम बनाने वालों तक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई मौकों पर ग्लोबल साउथ की भूमिका को ‘नियम मानने वालों’ से ‘नियम बनाने वालों’ की तरफ बढ़ने के रूप में बताया है। भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह इस प्रयास को आगे बढ़ाने में सहयोग करने के लिए तैयार है।नई दिल्ली घोषणापत्र में भी इसी सोच की झलक दिखाई देती है। इसमें संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था को ज्यादा निष्पक्ष बनाने, विकास के लिए वित्तीय संसाधनों का विस्तार करने और यह सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया है कि नई तकनीकों का फायदा विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं को भी मिले।

ग्लोबल साउथ में भारत की भूमिका
BRICS समिट में भारत का नजरिया इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि नई दिल्ली ने ग्लोबल साउथ के एजेंडे को मौजूदा वैश्विक व्यवस्था को पूरी तरह बदलकर एक नई व्यवस्था खड़ी करने के रूप में पेश नहीं किया। भारत ने मौजूदा संस्थाओं में सुधार के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर नई व्यवस्थाएं तैयार करने की बात कही है।भारत की BRICS प्राथमिकताओं में यह सोच साफ दिखाई देती है। इसमें संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में सुधार, तत्काल साझा मुद्रा शुरू किए बिना स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देना, भुगतान प्रणालियों को आपस में जोड़ना, तकनीकी सहयोग बढ़ाना और मजबूत सप्लाई चेन तैयार करना शामिल है।
Global South: BRICS अध्यक्षता में भारत की पहल
भारत ने अपनी BRICS अध्यक्षता के दौरान इन विचारों को व्यावहारिक योजनाओं में बदलने की दिशा में भी काम किया है। इसमें BRICS MSME पोर्टल और स्टार्टअप इनोवेशन फंड जैसी पहल शामिल हैं। इसके अलावा डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर सहयोग बढ़ाने की कोशिश की गई है।भारत ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम टेक्नोलॉजी और उन्नत सैटेलाइट टेक्नोलॉजी समेत 37 भारतीय डीप-टेक इनोवेशन को भी प्रदर्शित किया है। इन पहलों के जरिए भारत ने ग्लोबल साउथ के देशों के बीच तकनीक, व्यापार, वित्त और विकास के क्षेत्रों में सहयोग को आगे बढ़ाने पर जोर दिया है।








