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EXPLAINER: बालाघाट में बैगा बच्चों की मौत पर दीपके की राजनीति हुई उजागर, लोगों ने घेरा, सवाल- नक्सलवाद खत्म होने पर चुप्पी क्यों?

Abhijit Dipke Balaghat: बालाघाट में बच्चों की मौत पर दीपके हुए एक्सपोज

Abhijit Dipke Balaghat: बालाघाट के बिरसा क्षेत्र में बैगा बच्चों की बीमारी और मौतों के बीच CJP संस्थापक अभिजीत दीपके प्रभावित गांव पहुंचे और सरकार पर सवाल उठाए। लेकिन सवाल यह भी है कि जब दीपके सरकार को घेर रहे थे, तब उन्होंने बालाघाट में नक्सलवाद के खात्मे और सुरक्षा व्यवस्था में आए बड़े बदलाव का जिक्र क्यों नहीं किया? क्या बच्चों की मौत का मुद्दा उठाना सिर्फ राजनीतिक सक्रियता दिखाने तक सीमित है? तो वहीं कुछ स्थानीय लोगों व पत्रकारों ने उन पर मौतों पर राजनीति करने का आरोप लगाया।

क्या है पूरा मामला?

बालाघाट के बिरसा क्षेत्र के कुछ आदिवासी गांवों में जून-जुलाई से बच्चों में बुखार, चकत्ते और दूसरी स्वास्थ्य समस्याएं सामने आईं। शुरुआती रिपोर्टों में कई बच्चों की मौत की जानकारी सामने आई। बाद में जांच में मीजल्स और मलेरिया को मौतों के प्रमुख कारणों में शामिल पाया गया। साथ ही कुपोषण, एनीमिया, डिहाइड्रेशन और समय पर अस्पताल न पहुंच पाना भी कई मामलों में चिंता का विषय रहा है। इसलिए पूरे मामले को सिर्फ दूषित पानी से हुई मौत बताना अभी जांच के निष्कर्षों से मेल नहीं खाता।

Abhijit Dipke Balaghat: सरकार ने उठाए कई बड़े कदम?

सरकार पर सीधे लापरवाही का आरोप लगाने से पहले उसके उठाए गए कदमों को देखना भी जरूरी है। राज्य स्तरीय स्वास्थ्य टीम ने प्रभावित गांवों का दौरा किया और बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग शुरू की। सरकारी जानकारी के अनुसार 1 जुलाई से 14 अगस्त के बीच 32,400 से अधिक संभावित बुखार रोगियों की जांच की गई। Measles Rubella CatchUp अभियान शुरू किया गया और 9 महीने से 10 वर्ष तक के बच्चों को अतिरिक्त टीका देने की व्यवस्था की गई। कुपोषित बच्चों की दोबारा जांच और गंभीर मामलों को पोषण पुनर्वास केंद्र भेजने के निर्देश भी दिए गए।

गांवों तक पहुंची स्वास्थ्य व्यवस्था

दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में सबसे बड़ी चुनौती स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच रही है। इसी वजह से सरकार ने प्रभावित क्षेत्र में मोबाइल मेडिकल यूनिट और आउटरीच सर्विलांस बढ़ाया। केंद्र और राज्य की टीमों ने मिलकर घर-घर जांच, मलेरिया टेस्ट, सैंपल कलेक्शन और गंभीर मरीजों को अस्पताल रेफर करने का काम किया। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक करीब 50 गांवों तक निगरानी का दायरा बढ़ाया गया और छह मोबाइल मेडिकल यूनिट तैनात की गईं। हजारों लोगों की जांच और सैकड़ों बच्चों के इलाज की व्यवस्था की गई।

Abhijit Dipke Balaghat: पानी और कुपोषण पर भी काम

प्रभावित क्षेत्रों में पेयजल की गुणवत्ता को लेकर चिंता जरूर सामने आई है। सरकार ने पानी के स्रोतों की शुद्धता सुनिश्चित करने, क्लोरीन की गोलियां बांटने और स्वच्छता संबंधी गतिविधियां बढ़ाने के निर्देश दिए। इसके अलावा हजारों बच्चों में गंभीर कुपोषण की पहचान हुई और जरूरतमंद बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र भेजा गया। यानी समस्या केवल बीमारी तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छता और दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंच इन सभी पहलुओं पर प्रशासन को एक साथ काम करना पड़ रहा है।

दीपके को माँगनी पड़ी माफी, वीडियो वायरल

इसी बीच CJP के अभिजीत दीपके प्रभावित गांवों में पहुंचे और परिवारों से मुलाकात की। उन्होंने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि बच्चों के लिए पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं और स्वच्छ पानी उपलब्ध कराया जाना चाहिए। हालांकि, उनके दौरे के दौरान जब उनसे पूछा गया कि वे बच्चों की मौत के बीच राजनीति करने आए हैं और इतनी देर से क्यों पहुंचे, तो उन्होंने पत्रकारों से माफी मांगी और स्वीकार किया कि उन्हें पहले आना चाहिए था। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रभावित इलाके में स्वास्थ्य प्रशासन की गतिविधियां जुलाई से ही शुरू हो चुकी थीं।

Abhijit Dipke Balaghat: नक्सलवाद खत्म होने की उपलब्धि पर चुप्पी क्यों?

बालाघाट लंबे समय तक नक्सल गतिविधियों से प्रभावित रहा है। लेकिन सुरक्षा मोर्चे पर मध्य प्रदेश सरकार के लिए बड़ा बदलाव यह रहा कि दिसंबर 2025 में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बालाघाट में दो इनामी माओवादियों के आत्मसमर्पण के बाद मध्य प्रदेश को नक्सलवाद मुक्त घोषित किया था। पुलिस के मुताबिक उस समय जिले में कोई सक्रिय हार्डकोर नक्सली नहीं बचा था। यही वजह है कि अब जब दीपके बिरसा जैसे दूरस्थ इलाके में पहुंचकर सरकार पर सवाल उठा रहे हैं, तो यह सवाल भी उठता है कि क्या क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने और नक्सल प्रभाव कम होने के बाद स्वास्थ्य एवं विकास सेवाओं के विस्तार की तस्वीर को भी सामने रखा जाना चाहिए था? बच्चों की मौत की निष्पक्ष जांच और बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था की मांग अपनी जगह जरूरी है, लेकिन किसी त्रासदी को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित करने के बजाय सरकार द्वारा किए जा रहे सुधारों और जमीनी चुनौतियों दोनों को सामने रखना ही पूरी तस्वीर दिखाएगा।

 

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