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पेजेशकियान का वायरल वीडियो बना चर्चा का विषय, पैर छुए या पेन उठाया? धर्म और राजनीति पर उठे बड़े सवाल

BRICS Summit 2026: BRICS समिट के दौरान ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में वह जगद्गुरु सतीशाचार्य के सामने झुकते हुए नजर आ रहे हैं। वीडियो सामने आने के बाद कुछ लोग इसे हिंदू संत के पैर छूकर आशीर्वाद लेने की घटना बता रहे हैं, जबकि दूसरी तरफ यह दावा भी किया जा रहा है कि वह नीचे रखा पेन उठाने के लिए झुके थे। यानी वीडियो ने सिर्फ एक तस्वीर नहीं, बल्कि धर्म, सम्मान और राजनीतिक नजरिए को लेकर एक बड़ी बहस खड़ी कर दी है।

आखिर वीडियो में पेजेशकियान कर क्या रहे थे?

वायरल वीडियो में पेजेशकियान जगद्गुरु सतीशाचार्य के साथ बातचीत करते दिखाई देते हैं। इसके बाद वह नीचे की ओर झुकते हैं। इसी हिस्से को लेकर सोशल मीडिया पर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। एक पक्ष इसे संत के चरण स्पर्श और आशीर्वाद लेने से जोड़ रहा है, जबकि दूसरा पक्ष कह रहा है कि झुकने की वजह कुछ और थी। इसलिए फिलहाल वीडियो के आधार पर किसी एक दावे को अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा।

BRICS Summit 2026: मुलाकात में धर्म और मानवता पर क्या चर्चा हुई?

कार्यक्रम में धार्मिक और आध्यात्मिक मूल्यों को लेकर चर्चा हुई। जगद्गुरु सतीशाचार्य ने सनातन परंपरा को मानवता और सद्भाव का संदेश देने वाली परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया। वहीं पेजेशकियान ने धर्म और धार्मिक शिक्षाओं को मानवता की रक्षा और न्याय व्यवस्था से जोड़ते हुए अपने विचार रखे। कार्यक्रम में महामंडलेश्वर गोस्वामी सुशील जी महाराज और पतंजलि योग पीठ के आचार्य बालकृष्ण भी मौजूद रहे।

विदेशी नेता भारतीय संत का सम्मान करे तो सवाल क्यों?

यहीं से बहस का दूसरा पहलू शुरू होता है। भारत में धर्म केवल पूजा-पद्धति का विषय नहीं है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का भी हिस्सा है। ऐसे में किसी विदेशी राष्ट्रपति का किसी भारतीय धार्मिक गुरु से मिलना या भारतीय परंपरा का सम्मान करना अपने आप में सांस्कृतिक कूटनीति का हिस्सा हो सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या धार्मिक सम्मान को हमेशा राजनीतिक चश्मे से देखना जरूरी है?

BRICS Summit 2026
BRICS Summit 2026
BRICS Summit 2026: देश के नेताओं के धर्म पर टिप्पणी होती है तो क्या पैमाना अलग है?

भारत में जब कोई नेता मंदिर जाता है, किसी संत से मिलता है, धार्मिक आयोजन में शामिल होता है या किसी दूसरे धर्मस्थल पर पहुंचता है, तो उसके राजनीतिक मायने निकालने लगते हैं। कभी इसे तुष्टिकरण कहा जाता है, कभी हिंदुत्व की राजनीति, कभी वोट बैंक और कभी धर्मनिरपेक्षता पर सवाल खड़े किए जाते हैं। ऐसे में पेजेशकियान का वायरल वीडियो एक अलग सवाल सामने रखता है- अगर किसी विदेशी नेता का भारतीय धार्मिक परंपरा के प्रति सम्मान ‘संस्कृति’ है, तो भारतीय नेताओं की धार्मिक आस्था को हर बार राजनीतिक चश्मे से देखना कितना उचित है? और अगर भारतीय नेता किसी दूसरे धर्म के धार्मिक स्थल पर जाएं, वहां की परंपरा का सम्मान करें, तो क्या उस पर भी वही सहजता दिखाई जाती है?

क्या धर्म का सम्मान राजनीति से ऊपर नहीं होना चाहिए?

यहां असली मुद्दा किसी नेता की धार्मिक पहचान तय करना नहीं, बल्कि एक समान पैमाना रखने का है। किसी नेता का मंदिर जाना हो या मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च या किसी दूसरे धार्मिक स्थल पर जाना- अगर उसे केवल राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से देखा जाएगा तो धार्मिक सद्भाव का अर्थ ही कमजोर हो जाएगा। विदेशी मेहमान भारतीय परंपरा का सम्मान करे तो उसे सांस्कृतिक संवाद के रूप में देखा जा सकता है। उसी तरह भारतीय नेता किसी धर्म की आस्था का सम्मान करें तो उसे भी तुरंत राजनीतिक आरोपों में बदलना जरूरी नहीं होना चाहिए।

BRICS Summit 2026: पेजेशकियान का भारत दौरा सिर्फ BRICS तक सीमित नहीं

ईरानी राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान BRICS के अलावा कई महत्वपूर्ण मुलाकातें भी हुईं। उन्होंने विभिन्न धार्मिक, कारोबारी और बौद्धिक वर्गों से संवाद किया। अब वायरल वीडियो ने उनकी यात्रा के एक अलग पहलू को चर्चा में ला दिया है। हालांकि इस पूरे मामले में सबसे जरूरी बात यही है कि वीडियो को देखकर बिना पुष्टि के यह निष्कर्ष न निकाला जाए कि पेजेशकियान ने निश्चित रूप से पैर छुए या केवल पेन उठाने के लिए झुके।

सबसे बड़ा सवाल

वायरल वीडियो का सच चाहे जो हो, इससे एक बड़ी बहस जरूर निकलती है। क्या धर्म और आस्था का सम्मान व्यक्ति और देश की संस्कृति का हिस्सा हो सकता है, बिना उसे तुरंत राजनीति में घसीटे? और अगर भारतीय नेताओं के धार्मिक आचरण पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक बहस का हिस्सा है, तो क्या विदेशी नेताओं के धार्मिक व्यवहार पर भी वही पैमाना लागू होना चाहिए? शायद लोकतांत्रिक समाज में असली कसौटी यही है-व्यक्ति कोई भी हो, धर्म कोई भी हो और नेता किसी भी देश का हो, सवाल और सम्मान दोनों के लिए एक समान पैमाना होना चाहिए।

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