Umar Khalid: उमर खालिद को लेकर देश में राजनीतिक और वैचारिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। पूर्व JNU छात्र नेता पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘कैदी नंबर 626710 हाज़िर है’ (Prisoner No. 626710 Is Present) की स्क्रीनिंग को लेकर ABVP ने विरोध जताया है। बेंगलुरु स्थित नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी में प्रस्तावित स्क्रीनिंग को रद्द करने की मांग करते हुए ABVP ने प्रदर्शन की चेतावनी दी है।
क्यों हो रहा है डॉक्यूमेंट्री का विरोध?
ABVP का तर्क है कि उमर खालिद पर गंभीर आरोप हैं और ऐसे व्यक्ति को महिमामंडित करने वाली किसी सामग्री की स्क्रीनिंग विश्वविद्यालय परिसर में नहीं होनी चाहिए। संगठन ने NLSIU प्रशासन को पत्र लिखकर स्क्रीनिंग रद्द करने की मांग की है। मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग देश के अलग-अलग विश्वविद्यालयों और संस्थानों में पहले भी हो चुकी है। फिल्म की आधिकारिक स्क्रीनिंग सूची के मुताबिक 2024 और 2025 में भारत समेत विदेशों में कई जगह इसकी स्क्रीनिंग और चर्चा हुई थी।
Umar Khalid: आखिर उमर खालिद जेल में क्यों हैं?
उमर खालिद को सितंबर 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की कथित बड़ी साजिश के मामले में गिरफ्तार किया गया था। उनके खिलाफ UAPA समेत कई धाराओं में मामला दर्ज है। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि उन्होंने दंगों से पहले कथित साजिश में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वहीं खालिद लगातार आरोपों से इनकार करते रहे हैं और उनका पक्ष है कि उनके भाषण और राजनीतिक गतिविधियों को गलत तरीके से मामले से जोड़ा गया है। जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज करते हुए अभियोजन की सामग्री में उनके खिलाफ प्रथमदृष्टया गंभीर आरोप होने की बात मानी थी।
छह साल बाद भी जेल से बाहर क्यों नहीं आए?
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उमर खालिद की गिरफ्तारी को छह साल पूरे हो चुके हैं। जमानत को लेकर मामला कई स्तरों पर अदालतों में पहुंच चुका है। मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने UAPA मामलों में भी यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि जमानत नियम और जेल अपवाद होना चाहिए, हालांकि हर मामले के तथ्यों के आधार पर जमानत से इनकार किया जा सकता है। जुलाई 2026 में दिल्ली की अदालत ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं। इसके बाद खालिद ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया। यानी उनका मामला अभी न्यायिक प्रक्रिया में है और उन पर लगे आरोपों का अंतिम फैसला ट्रायल के जरिए होना बाकी है।
Umar Khalid: देश-विरोधी छवि की बहस क्यों?
उमर खालिद की पहचान पिछले वर्षों में बेहद विवादित राजनीतिक चेहरे के तौर पर बनी है। उनके आलोचक उन पर भारत-विरोधी विचारों और दिल्ली दंगों की कथित साजिश से जुड़े होने के आरोप लगाते रहे हैं, जबकि समर्थक उन्हें राजनीतिक विचारों के कारण लंबे समय से जेल में बंद कार्यकर्ता बताते हैं। यही विरोधाभास अब डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग को लेकर भी सामने आ रहा है। एक पक्ष इसे उमर खालिद के पक्ष को सामने रखने वाली फिल्म मानता है, जबकि ABVP इसे उनके कथित अपराधों और विवादित भूमिका को नजरअंदाज कर उनकी छवि चमकाने की कोशिश के रूप में देख रहा है।
पिता सैयद कासिम रसूल इलियास ने क्या कहा?
उमर खालिद के पिता सैयद कासिम रसूल इलियास ने स्क्रीनिंग का विरोध किए जाने पर ABVP पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि जब तक अदालत किसी व्यक्ति को दोषी साबित नहीं करती, तब तक उसे कानूनी रूप से दोषी नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर उन्होंने डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग रोकने को गलत बताया और ABVP की कार्रवाई को ‘दादागिरी’ करार दिया। उन्होंने यह भी कहा कि उमर खालिद के खिलाफ आरोपों और चार्जशीट पर सवाल उठते रहे हैं तथा छह वर्ष बीतने के बावजूद ट्रायल की स्थिति को लेकर चिंता है। हालांकि दूसरी ओर अदालतों में जमानत पर हुई कार्यवाही में अभियोजन के आरोपों को गंभीरता से लिया गया है। इसलिए पूरे मामले को केवल ‘निर्दोष बनाम दोषी’ की राजनीतिक बहस के बजाय न्यायिक प्रक्रिया के संदर्भ में देखना जरूरी है।
Umar Khalid: स्क्रीनिंग पर असली सवाल क्या है?
पूरे विवाद में मूल सवाल यही है कि किसी विवादित आरोपी पर बनी डॉक्यूमेंट्री को विश्वविद्यालय में दिखाया जाना चाहिए या नहीं। समर्थकों का तर्क है कि छात्रों को अलग-अलग पक्षों को देखने और बहस करने का अवसर मिलना चाहिए, जबकि विरोध करने वालों का कहना है कि ऐसे मंच का इस्तेमाल किसी गंभीर आरोपों का सामना कर रहे व्यक्ति की छवि चमकाने के लिए नहीं होना चाहिए।
फिलहाल ABVP के विरोध और उमर खालिद के पिता के बयान ने इस पुराने विवाद को फिर चर्चा में ला दिया है। एक तरफ अदालत में उमर खालिद के खिलाफ मामला जारी है, तो दूसरी तरफ उनके समर्थन में डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग का अभियान चल रहा है। ऐसे में अंतिम फैसला अदालत करेगी, लेकिन स्क्रीनिंग का विवाद निश्चित तौर पर देश की राजनीति, विश्वविद्यालयों में वैचारिक बहस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सवाल को फिर केंद्र में ले आया है।








