‘chhatron ki gunj’ abhiyan: राहुल गांधी का ‘छात्रों की गूंज’ अभियान अब सिर्फ छात्रों से संवाद तक सीमित नहीं दिख रहा है। कोटा से शुरू हुआ यह अभियान इंदौर तक पहुंच चुका है और कांग्रेस ने इसे बड़े स्तर पर ले जाने की तैयारी की है। राहुल गांधी इन कार्यक्रमों में शिक्षा व्यवस्था, पेपर लीक, बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं और छात्रों से जुड़े दूसरे मुद्दे उठा रहे हैं। राहुल की आधिकारिक वेबसाइट भी अभियान को ‘शिक्षा क्रांति’ और छात्रों की आवाज से जोड़ती है।
दूसरी तरफ बीजेपी भी युवाओं के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए कैंपस आउटरीच और सोशल मीडिया की रणनीति पर जोर दे रही है। ऐसे में सवाल है कि ‘छात्रों की गूंज’ के पीछे राहुल गांधी का प्लान क्या है, BJP इसे कैसे काउंटर कर रही है और हालिया DUSU चुनाव से क्या संकेत मिलते हैं?
राहुल की ‘छात्रों की गूंज’ में क्या है रणनीति?
राहुल गांधी का अभियान मूल रूप से छात्रों के मुद्दों को राजनीतिक बहस के केंद्र में लाने पर आधारित है। कोटा के बाद देहरादून, प्रयागराज, पुणे और फिर इंदौर में कार्यक्रम हुए। अभियान की आधिकारिक टाइमलाइन में 17 जून कोटा और 19 सितंबर इंदौर कार्यक्रम दर्ज हैं। इन कार्यक्रमों में राहुल छात्रों से सीधे बातचीत करते हैं। शिक्षा, रोजगार और परीक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों को उठाकर कांग्रेस युवाओं के बीच अपनी राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
1. युवा वोटर तक सीधा पहुंचने की कोशिश
युवा मतदाता किसी एक राजनीतिक दल के साथ स्थायी रूप से जुड़ा हुआ समूह नहीं है। अलग-अलग राज्यों, वर्गों और मुद्दों के आधार पर युवाओं की राजनीतिक प्राथमिकताएं बदल सकती हैं। ऐसे में कांग्रेस का फोकस छात्रों के उन मुद्दों पर है, जिनका सीधा संबंध उनके भविष्य से है, नौकरी, भर्ती परीक्षा, पेपर लीक, शिक्षा की लागत और अवसर। यही वजह है कि ‘छात्रों की गूंज’ को केवल रैली की बजाय संवाद आधारित अभियान के रूप में पेश किया जा रहा है।
2. Gen-Z को राजनीतिक संवाद से जोड़ना
कांग्रेस की रणनीति में एक और बदलाव दिखाई देता है। पारंपरिक मंच और भाषण के बजाय छात्रों के बीच सीधा संवाद, सोशल मीडिया और इंटरैक्टिव कार्यक्रमों पर जोर दिया जा रहा है। इंदौर में भी राहुल गांधी ने छात्रों के साथ शिक्षा और व्यवस्था से जुड़े सवालों पर बातचीत की। कार्यक्रम में छात्रों की भागीदारी को अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया। कांग्रेस का उद्देश्य सिर्फ छात्रों की समस्याएं सुनना नहीं, बल्कि उन्हें एक बड़े राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाना भी है।
‘chhatron ki gunj’ abhiyan: क्या कांग्रेस इसे बड़े अभियान में बदल रही है?
इंदौर कार्यक्रम के बाद मध्य प्रदेश कांग्रेस ने अभियान को प्रदेश के दूसरे जिलों तक ले जाने की योजना की घोषणा की है। यानी यह पहल अब एक कार्यक्रम से आगे बढ़कर संगठनात्मक आउटरीच का रूप ले रही है। कांग्रेस के लिए इसका महत्व इसलिए भी है क्योंकि छात्र संगठनों और युवा मतदाताओं के बीच पार्टी की मौजूदगी भविष्य की राजनीति में संगठनात्मक आधार तैयार करने से जुड़ सकती है।
BJP कैसे कर रही है काउंटर?
राहुल गांधी के छात्र-केंद्रित अभियान के समानांतर बीजेपी की रणनीति भी दो स्तरों पर दिखाई देती है- कैंपस आउटरीच और डिजिटल कनेक्ट। बीजेपी की ओर से युवाओं के साथ संवाद के लिए अलग-अलग कार्यक्रम और सोशल मीडिया गतिविधियां की जा रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कॉलेज और विश्वविद्यालयों में युवाओं से संवाद भी लंबे समय से पार्टी की सार्वजनिक रणनीति का हिस्सा रहा है। यानी मुकाबला सिर्फ रैलियों का नहीं है। दोनों प्रमुख दल युवाओं तक पहुंचने के लिए कैंपस, सोशल मीडिया और प्रत्यक्ष संवाद का इस्तेमाल कर रहे हैं।

‘chhatron ki gunj’ abhiyan: BJP का डिजिटल फोकस क्यों महत्वपूर्ण है?
Gen-Z का बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया पर सक्रिय है। इसलिए राजनीतिक दलों के लिए केवल पारंपरिक भाषणों के जरिए युवाओं तक पहुंचना पर्याप्त नहीं माना जा रहा। बीजेपी की डिजिटल रणनीति में Instagram जैसे प्लेटफॉर्म पर युवाओं के अनुकूल छोटे वीडियो, रील्स और इंटरैक्टिव कंटेंट पर जोर दिखाई देता है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी युवाओं के साथ सोशल मीडिया के जरिए सीधे संवाद किया है। इस तरह बीजेपी राहुल के कैंपस-केंद्रित मॉडल का जवाब सिर्फ राजनीतिक भाषणों से नहीं, बल्कि डिजिटल माध्यमों से भी दे रही है।
RSS की भूमिका भी क्यों महत्वपूर्ण है?
युवा राजनीति केवल चुनावी दलों तक सीमित नहीं है। RSS भी युवाओं और छात्रों के बीच संवाद बढ़ाने पर जोर देती रही है। इसका महत्व इसलिए है क्योंकि बीजेपी का राजनीतिक संगठन और उससे जुड़े सामाजिक-संगठनात्मक नेटवर्क युवाओं तक पहुंच बनाने में अलग भूमिका निभाते हैं। इस तरह एक तरफ कांग्रेस का छात्र-केंद्रित अभियान है, तो दूसरी तरफ बीजेपी-RSS का कैंपस और सामाजिक आउटरीच मॉडल दिखाई देता है।
‘chhatron ki gunj’ abhiyan: DUSU चुनाव ने क्या संकेत दिया?
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ यानी DUSU चुनाव 2026 के नतीजे ऐसे समय आए हैं जब दोनों प्रमुख दल युवाओं के बीच अपनी मौजूदगी बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं। नतीजों में ABVP ने चार केंद्रीय पदों में से तीन अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव जीते। उपाध्यक्ष पद निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन के खाते में गया, जो पहले NSUI से जुड़े रहे थे। NSUI कोई केंद्रीय पद नहीं जीत सकी। राष्ट्रव्यापी युवा मतदाताओं के रुझान का निष्कर्ष केवल DUSU चुनाव से निकालना उचित नहीं होगा। DUSU एक विश्वविद्यालय का छात्र चुनाव है और इसकी अपनी स्थानीय परिस्थितियां होती हैं। फिर भी यह नतीजा कांग्रेस की छात्र इकाई के लिए संगठन और उम्मीदवार चयन जैसे सवाल जरूर खड़े करता है। रिपोर्टों के मुताबिक राहुल गांधी ने NSUI के प्रदर्शन पर विस्तृत रिपोर्ट भी मांगी है।
क्या DUSU के नतीजे ‘छात्रों की गूंज’ की परीक्षा हैं?
इसे सीधे ‘हां’ या ‘नहीं’ में देखना सही नहीं होगा। एक तरफ ‘छात्रों की गूंज’ देश के अलग-अलग राज्यों में छात्रों तक पहुंच बनाने की कांग्रेस की कोशिश है। दूसरी तरफ DUSU एक विशिष्ट विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति है। इसलिए दोनों को जोड़कर यह कहना कि एक चुनाव ने पूरे देश के युवाओं की राजनीतिक पसंद बता दी, उचित नहीं होगा। हालांकि DUSU के नतीजे यह जरूर दिखाते हैं कि छात्र राजनीति में संगठन, स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार और कैंपस स्तर की सक्रियता अभी भी महत्वपूर्ण हैं।
‘chhatron ki gunj’ abhiyan: राहुल के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
कांग्रेस के लिए चुनौती केवल युवाओं के मुद्दे उठाने की नहीं है। सवाल यह भी है कि इन मुद्दों को लगातार संगठनात्मक अभियान में कैसे बदला जाए। अगर बेरोजगारी, पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दे छात्रों के बीच उठाए जाते हैं, तो उन्हें स्थानीय स्तर पर संगठन, छात्र प्रतिनिधित्व और लगातार संवाद से जोड़ना भी जरूरी होगा। DUSU में NSUI के प्रदर्शन ने इसी संगठनात्मक सवाल को फिर चर्चा में ला दिया है।
BJP के सामने चुनौती क्या है?
BJP के सामने भी युवा मतदाताओं के साथ लगातार संवाद बनाए रखने की चुनौती है। सिर्फ सोशल मीडिया पर सक्रियता या बड़े कार्यक्रम पर्याप्त नहीं होते। छात्रों के लिए रोजगार, शिक्षा, परीक्षा व्यवस्था, फीस, हॉस्टल और कैंपस सुरक्षा जैसे मुद्दे सीधे जीवन से जुड़े हैं। DUSU चुनाव में भी छात्र सुरक्षा और आवास जैसे मुद्दे चर्चा में रहे। इसलिए आने वाले समय में दोनों दलों की युवा रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मुद्दों पर ठोस प्रतिक्रिया और कैंपस स्तर की मौजूदगी हो सकता है।
‘chhatron ki gunj’ abhiyan: ‘छात्रों की गूंज’ का असली चुनावी गणित क्या है?
पूरे अभियान को देखें तो कांग्रेस की रणनीति के चार प्रमुख हिस्से दिखाई देते हैं- पहला, छात्रों के मुद्दों को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में लाना। दूसरा, Gen-Z के साथ पारंपरिक रैली की बजाय सीधे संवाद और डिजिटल माध्यम से जुड़ना। तीसरा, उन राज्यों में संगठनात्मक मौजूदगी बढ़ाना जहां बीजेपी सत्ता में है और कांग्रेस विपक्ष में है। चौथा, छात्रों और युवाओं के बीच लंबे समय तक राजनीतिक नेटवर्क तैयार करना। वहीं BJP का जवाब भी लगभग समान मैदान में है- कैंपस आउटरीच, युवा नेताओं की सक्रियता और सोशल मीडिया पर Gen-Z केंद्रित संवाद।
तो क्या ‘छात्रों की गूंज’ काम करेगी?
इसका निश्चित जवाब अभी देना संभव नहीं है। किसी अभियान का चुनावी असर केवल भीड़ या सोशल मीडिया चर्चा से तय नहीं होता। इसके लिए देखना होगा कि अभियान कितने छात्रों तक पहुंचता है, कितने लोग लगातार इससे जुड़े रहते हैं, क्या स्थानीय संगठन सक्रिय होता है और जिन मुद्दों को उठाया जा रहा है, वे चुनावी राजनीति में कितने महत्वपूर्ण बने रहते हैं। DUSU के हालिया नतीजे भी यही बताते हैं कि युवा राजनीति का समीकरण एकरूप नहीं है- ABVP ने तीन केंद्रीय पद जीते, जबकि उपाध्यक्ष पद एक पूर्व NSUI सदस्य निर्दलीय उम्मीदवार ने जीता।
राहुल गांधी की ‘छात्रों की गूंज’ कांग्रेस की युवाओं और छात्रों के बीच सीधी पहुंच बनाने की कोशिश है। इसका फोकस शिक्षा, रोजगार, पेपर लीक और छात्रों के भविष्य से जुड़े मुद्दों पर है। दूसरी तरफ BJP भी युवाओं तक पहुंचने के लिए कैंपस कार्यक्रमों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपनी गतिविधियां बढ़ा रही है।
इसलिए आने वाले समय में मुकाबला सिर्फ कौन कितनी रैली करता है, इसका नहीं होगा। असली सवाल यह रहेगा कि कौन-सा राजनीतिक संगठन छात्रों के मुद्दों को लगातार सुनने, उनका प्रतिनिधित्व करने और उन्हें संगठनात्मक स्तर पर जोड़ने में कितना सफल रहता है। यानी ‘छात्रों की गूंज’ एक कार्यक्रम से ज्यादा, युवाओं तक राजनीतिक पहुंच बनाने की लंबी रणनीति के रूप में सामने आ रही है और इसका वास्तविक चुनावी असर आने वाले चुनावों के नतीजों में ही मापा जा सकेगा।
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