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किसी मिमिक्री की नहीं, बल्कि वैचारिक परिपक्वता की कायल होती है जनता

New Delhi: किसी मिमिक्री की नहीं, बल्कि वैचारिक परिपक्वता की कायल होती है जनता
New Delhi: लोकतंत्र में विपक्षी दलों का बहुत बड़ा महत्व होता है।जनता उनसे अपेक्षा रखती है कि वे राष्ट्र हित के मुद्दों को वैचारिक बहस का विषय बनाएं। इन मुद्दों पर किये गये तीखे कटाक्ष जनता का ध्यान आकर्षित करते हैं, लेकिन इसके साथ ही जनता की यह भी अपेक्षा रहती है कि विषय पर बहस के दौरान नेताओं की भाषा में संयम और व्यवहार में गंभीरता दिखाई दे।यही कारण है कि इंदौर में आयोजित ‘छात्रों की गूँज’ कार्यक्रम के दौरान स्टैंड-अप कॉमेडियन पुलकित मणि द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री और उनके साथ मंच पर विपक्ष के नेता राहुल गांधी की मौजूदगी बहुत से लोगों के गले नहीं उतर पा रही है।इसने एक नये विवाद को जन्म दे दिया है।

वैचारिक मतभेदों का विरोध मर्यादित भाषा में ही हो

भारतीय जनता पार्टी इस मिमिक्री को प्रधानमंत्री पद और नारी शक्ति का अपमान बता रही है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू जैसे नेताओं ने इसकी तीखी आलोचना की है।इसे राजनीतिक मर्यादा के खिलाफ बताया है।हालांकि कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह केवल एक राजनीतिक व्यंग्य और मिमिक्री थी, जिसका मकसद किसी का अपमान करना नहीं था।वरिष्ठ कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने तो इसे राष्ट्र हित में जायज ठहराया है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर वीडियो शेयर करते हुए लिखा कि ‘यह ऐसा जोश है जो देशों को आगे बढ़ाता है।’ राजनीतिक मोर्चे पर इस मुद्दे को लेकर भाजपा और कांग्रेस के अपने-अपने तर्क हैं।इसमें कौन भारी पड़ेगा और कौन कमजोर, इस पर हमारी कोई दिलचस्पी नहीं है, लेकिन सच यही है कि सार्वजनिक जीवन में वैचारिक मतभेदों का विरोध संयमित या मर्यादित भाषा में ही उचित माना जाता है।विषयों पर कटाक्ष की भाषा तार्किक और आक्रामक हो सकती है, लेकिन मूल विषयों से हटकर हल्की भाषा में दूसरे का उपहास उड़ाना भला कैसे कोई जायज ठहरा सकता है?

New Delhi: सवाल जो जवाब मांगते हैं

सवाल उठ सकते हैं कि आखिर राहुल गांधी चाहते क्या हैं? देश पूछ सकता है कि क्या अब उनके लिए किसी मिमिक्री का महत्व राजनीतिक बहस, स्वस्थ संवाद और नीतिगत आलोचना से अधिक हो गया है? अच्छी बात है कि विपक्ष के नेता का धर्म निभाते हुए वे ‘छात्रों की गूँज’ कार्यक्रम को संबोधित करने पहुंचे, लेकिन यह भी उनका दायित्व था कि आखिर मूल मुद्दों से हटकर मंच पर मिमिक्री की भला क्या आवश्यकता है? क्या छात्रों से बेहतर संवाद के लिए इससे बेहतर और कोई माध्यम या तरीका नहीं था?  क्या आज विपक्ष के नेता की वाणी इतनी ओजस्वी नहीं रही कि छात्र-छात्राओं में प्रभाव छोड़ सके। आखिर राहुल गांधी पहले भी छात्रों को संबोधित करते रहे हैं। अब अचानक उन्हें मिमिक्री की जरूरत क्यों पडी? क्या देश की युवा पीढ़ी जिसे जेन-जी कहा जाता है, उस पर सारगर्भित भाषण के बजाय मिमिक्री का ज्यादा प्रभाव हो रहा है? 

New Delhi: अभिव्यक्ति के और भी रास्ते हैं

सवाल यह भी है कि क्या गंभीर विषयों की अभिव्यक्ति के लिए किसी मिमिक्री के अलावा और रास्ते नहीं हैं ? अतीत में ऐसे बहुत से दिलचस्प उदाहरण हैं जब हमारे सुलझे हुए राजनेताओं ने बड़ी शालीनता और मर्यादा में रहकर गंभीर मुद्दों की तरफ संसद और देश की जनता का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने विरोध के जो तरीके अपनाए उनसे उनके दौर की युवा पीढ़ी भी बहुत प्रभावित हुई।वर्ष 1973 में जब केंद्र में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार थी, तो तब पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि हुई थी। जनसंघ के तत्कालीन नेता अटल बिहारी वाजपेयी जिन्होंने बाद में प्रधानमंत्री का दायित्व भी निभाया, उन्होंने इन बढ़ी हुई कीमतों के विरोध के लिए उस समय जो अनूठा तरीका अपनाया, वह न सिर्फ देश बल्कि दुनियाभर के मीडिया की सुर्खियों में रहा था। वाजपेयी जी तब बैलगाड़ी से संसद पहुंचे थे। उन्होंने बिना किसी बड़े ताम-झाम के देश और दुनिया का ध्यान आकर्षित किया था।समझ से परे है कि आज की राजनीति में ये शालीन तरीके क्यों नहीं अपनाए जाते हैं?

New Delhi: विकल्प के लिए क्या जरूरी है?

राहुल गांधी मानें या न मानें, उनकी पार्टी के नेता भले ही कोई भी दलील दें, लेकिन उन्हें यह बात अच्छी तरह समझ में आ जानी चाहिए कि ‘छात्रों की गूँज’ कार्यक्रम में जो मिमिक्री हुई उसका कांग्रेस को फायदा कम और नुकसान ज्यादा होगा। उन्हें ध्यान रखना होगा कि मंच पर कोई मिमिक्री कुछ समय के लिए हास-परिहास का महौल तो बना सकती है, लेकिन विकल्प के तौर पर जनता वैचारिक परिपक्वता और सांगठनिक मजबूती को ही महत्व देती है।मुद्दों को कसौटी पर कसने वाली जनता के लिए किसी मिमिक्री के कोई मायने नहीं होते हैं।वह वैचारिक परिपक्वता की कायल होती है।