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अखिलेश के यूपी से योगी के ‘अगले चौराहे’ तक… 10 साल में महिलाओं की सुरक्षा कितनी बदली? आंकड़ों से समझिए पूरा सच

UP POLITICS:

UP POLITICS: उत्तर प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा लंबे समय से राजनीति का बड़ा मुद्दा रही है। एक दौर में सड़क, बाजार और हाईवे पर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सरकार पर सवाल उठते थे तो आज योगी आदित्यनाथ सरकार महिला सुरक्षा को अपनी कानून-व्यवस्था की बड़ी उपलब्धियों में गिनाती है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कई मौकों पर कह चुके हैं कि अब अगर कोई बेटी से छेड़छाड़ करेगा तो “अगले चौराहे पर यमराज” उसका इंतजार करेगा। 2026 में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर भी उन्होंने कहा कि 2017 से पहले छेड़छाड़ और शोहदों के डर से बेटियां स्कूल छोड़ने को मजबूर होती थीं, जबकि अब ऐसी घटनाओं पर तत्काल कार्रवाई का माहौल है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वास्तव में पिछले करीब 10 वर्षों में उत्तर प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा की तस्वीर बदली है?

पहले समझिए अखिलेश सरकार के दौर में महिला सुरक्षा पर क्यों उठते थे सवाल?

समाजवादी पार्टी की अखिलेश यादव सरकार मार्च 2012 से मार्च 2017 तक सत्ता में रही। उस दौरान महिला सुरक्षा और कानून-व्यवस्था विपक्ष के बड़े राजनीतिक मुद्दों में शामिल रहे। 2016 का बुलंदशहर हाईवे गैंगरेप मामला इसकी सबसे चर्चित घटनाओं में रहा। जुलाई 2016 में दिल्ली-कानपुर हाईवे पर एक परिवार की कार को रोककर बदमाशों ने परिवार के सदस्यों को बंधक बनाया और एक महिला तथा उसकी किशोर बेटी के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म किया। घटना के बाद अखिलेश यादव सरकार को तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा। सरकार ने स्थानीय पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई की और जांच तेज करने के निर्देश दिए। इस घटना ने खास तौर पर यह सवाल खड़ा किया था कि अगर हाईवे जैसी सार्वजनिक जगह पर परिवार खुद को सुरक्षित नहीं महसूस कर सकता तो कानून-व्यवस्था का दावा कितना प्रभावी है?

2016 का बुलंदशहर केस क्यों बना बड़ा राजनीतिक मुद्दा?

घटना के बाद तत्कालीन सरकार ने कई पुलिस अधिकारियों को निलंबित किया। पुलिस ने आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए बड़ी टीम लगाई और मामले को तेजी से आगे बढ़ाने की बात कही। लेकिन राजनीतिक विवाद यहीं खत्म नहीं हुआ। विपक्ष ने इसे उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था की विफलता बताया। उस समय महिला सुरक्षा को लेकर सरकार पर सवाल उठे और विधानसभा चुनाव से पहले यह मामला बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना। यानी उस दौर में अपराध के बाद कार्रवाई हुई, लेकिन राजनीतिक बहस का केंद्र यह था कि अपराध को होने से पहले रोकने के लिए पुलिस व्यवस्था कितनी प्रभावी थी।

UP POLITICS: फिर 2017 में सत्ता बदली और योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने

मार्च 2017 में उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ और योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने। नई सरकार ने शुरुआत से ही कानून-व्यवस्था को अपनी प्रमुख प्राथमिकताओं में रखा। महिलाओं और छात्राओं की सुरक्षा के लिए एंटी रोमियो स्क्वॉड, महिला हेल्पलाइन 1090, महिला पुलिस डेस्क, पिंक पेट्रोलिंग और मिशन शक्ति जैसी व्यवस्थाओं पर जोर दिया गया। महिला पुलिसकर्मियों की संख्या बढ़ाने और महिला शिकायतों की सुनवाई के लिए अलग व्यवस्थाओं को भी सरकार अपनी उपलब्धियों में गिनाती रही है।

योगी का ‘अगले चौराहे’ वाला मॉडल

योगी आदित्यनाथ ने महिला सुरक्षा को लेकर कई बार बेहद सख्त भाषा का इस्तेमाल किया है। उन्होंने कहा है कि अगर कोई बहन-बेटी से छेड़छाड़ करेगा तो “अगले चौराहे पर यमराज” उसका इंतजार करेगा। दूसरे मौकों पर उन्होंने कहा कि महिलाओं को सुरक्षा का ऐसा वातावरण मिलना चाहिए जिसमें वे बिना डर के बाजार और शिक्षण संस्थानों तक जा सकें। सरकार का तर्क है कि इस तरह की सख्ती और पुलिसिंग से अपराधियों में कानून का डर पैदा हुआ है।

UP POLITICS: क्या NCRB के आंकड़े भी बदलाव दिखाते हैं?

NCRB के आंकड़ों को देखें तो तस्वीर सीधी रेखा जैसी नहीं है। 2026 में प्रकाशित विश्लेषण के अनुसार, 2012 से 2016 के बीच उत्तर प्रदेश में दुष्कर्म के कुल 16,321 मामले दर्ज हुए। वहीं 2018 से 2024 के बीच कुल 23,058 मामले दर्ज हुए। लेकिन दोनों अवधियों की लंबाई अलग है। इसलिए कुल मामलों की तुलना करना उचित नहीं होगा। पूरे कैलेंडर वर्षों के औसत की तुलना करें तो 2012-16 में यह आंकड़ा करीब 3,264 मामले प्रति वर्ष था, जबकि 2018-24 में करीब 3,294 मामले प्रति वर्ष रहा। यानी इस श्रेणी में औसत लगभग समान रहा और अंतर करीब 0.9 प्रतिशत का है।

योगी सरकार किस आधार पर बदलाव का दावा करती है?

योगी सरकार का कहना है कि अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई, पुलिस की सक्रियता, महिला हेल्पलाइन, एंटी रोमियो अभियान और मिशन शक्ति जैसी व्यवस्थाओं ने महिलाओं में सुरक्षा का भरोसा बढ़ाया है।2024 के NCRB आंकड़ों पर आधारित एक रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश को महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में 17वें और दुष्कर्म के मामलों में 24वें स्थान पर बताया गया है। उसी रिपोर्ट में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में दोषसिद्धि दर 76.6 प्रतिशत बताई गई है। FIR की संख्या अपराध की पूरी वास्तविकता नहीं बताती और दोषसिद्धि दर का अर्थ यह नहीं कि राज्य में अपराध खत्म हो गए। पुलिस में शिकायत दर्ज होने की प्रवृत्ति, जांच की गुणवत्ता और अदालतों में मामलों के निपटारे जैसे कई कारक आंकड़ों को प्रभावित करते हैं।

UP POLITICS: क्या आज यूपी की हर महिला सुरक्षित है?

सरकार की ओर से सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने के दावे हैं और कुछ आंकड़ों में यूपी की स्थिति कई बड़े राज्यों की तुलना में अलग दिखाई देती है। लेकिन दूसरी तरफ प्रदेश में समय-समय पर महिलाओं के खिलाफ अपराध की घटनाएं भी सामने आती रही हैं। यानी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होना और अपराध का पूरी तरह खत्म हो जाना दो अलग बातें हैं। किसी महिला के लिए असली सुरक्षा तब होगी जब वह पुलिस की मौजूदगी के भरोसे के साथ-साथ यह भी महसूस करे कि अगर उसके साथ अपराध होता है तो शिकायत तुरंत दर्ज होगी, जांच निष्पक्ष होगी और आरोपी के खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई होगी।

अखिलेश बनाम योगी: असली फर्क कहां दिखता है?

दोनों सरकारों की तुलना सिर्फ अपराध की संख्या से करने के बजाय उनके शासन के तरीके और प्राथमिकताओं में भी देखी जा सकती है। अखिलेश सरकार के दौर में महिला सुरक्षा पर विपक्ष का प्रमुख आरोप कानून-व्यवस्था की कमजोरी और अपराधियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई का था। 2016 का बुलंदशहर हाईवे मामला इसी राजनीतिक बहस का बड़ा उदाहरण बना। सरकार ने उस मामले में पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई भी की थी। योगी सरकार ने इसके विपरीत महिला सुरक्षा को सख्त पुलिसिंग और अपराधियों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की भाषा में पेश किया। एंटी रोमियो स्क्वॉड, महिला हेल्पलाइन और मिशन शक्ति जैसी व्यवस्थाओं को इसी नीति का हिस्सा बताया गया। यानी एक तरफ सवाल था- अपराध के बाद सरकार क्या कर रही है? दूसरी तरफ सरकार का दावा है- अपराधी अपराध करने से पहले ही पुलिस के डर में रहें। लेकिन क्या सिर्फ सख्ती से महिला सुरक्षा सुनिश्चित हो सकती है?

UP POLITICS: यह भी बड़ा सवाल है

महिला सुरक्षा सिर्फ सड़क पर पुलिस की मौजूदगी या अपराधी के खिलाफ सख्त कार्रवाई से तय नहीं होती। इसमें स्कूल-कॉलेज जाने वाली छात्राओं की सुरक्षा, सार्वजनिक परिवहन, कार्यस्थल, साइबर अपराध, घरेलू हिंसा, शिकायत तंत्र और न्याय मिलने की गति भी शामिल है। यही वजह है कि किसी सरकार की महिला सुरक्षा नीति का आकलन करते समय अपराध दर, पुलिस रिस्पॉन्स टाइम, FIR, चार्जशीट, दोषसिद्धि, महिला पुलिस की उपलब्धता और शिकायत निवारण जैसे कई पैमानों को साथ देखना जरूरी है।

योगी के दावे में ‘सुरक्षा का एहसास’ कितना महत्वपूर्ण है?

योगी सरकार का एक बड़ा दावा यह है कि अब प्रदेश में बेटियां रात में भी बाहर निकल रही हैं और महिलाएं नाइट शिफ्ट में काम कर रही हैं। मुख्यमंत्री ने 2025 में कहा था कि अब बेटियों को शाम होते ही घर में रहने की जरूरत नहीं और छेड़छाड़ करने वालों के लिए “अगले चौराहे पर यमराज” इंतजार कर रहे हैं। यह एक राजनीतिक दावा है, लेकिन इसके पीछे एक महत्वपूर्ण सामाजिक पहलू है। सुरक्षा सिर्फ अपराध न होने का नाम नहीं है; सुरक्षा का एहसास भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अगर किसी छात्रा को यह भरोसा हो कि वह शाम को कोचिंग से अकेले लौट सकती है और जरूरत पड़ने पर पुलिस मदद करेगी, तो यह सुरक्षा व्यवस्था की सफलता का एक सामाजिक संकेत हो सकता है।

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UP POLITICS: 10 साल बाद समाजवादी पार्टी सत्ता में क्यों नहीं लौटी?

2017 के बाद समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में सरकार नहीं बना सकी। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया और योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने। 2022 में भी भाजपा ने सरकार बनाई और योगी दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। महिला सुरक्षा निश्चित रूप से उन मुद्दों में से एक थी जिन पर 2017 के चुनाव के दौरान राजनीतिक बहस हुई, लेकिन यह कहना कि सिर्फ महिला सुरक्षा की वजह से सपा सत्ता से बाहर हुई, चुनावी परिणामों की जटिलता को बहुत सरल बना देना होगा। जातीय समीकरण, कानून-व्यवस्था, विकास, रोजगार, कल्याणकारी योजनाएं, नेतृत्व और राजनीतिक गठबंधन—इन सभी का चुनावी राजनीति में महत्व रहा है। योगी की सरकार से महिलाएं को लगा वो अब सुरक्षित है और 2022 में चुनाव हार गई है।  आज योगी सरकार महिला सुरक्षा को अपनी प्रमुख उपलब्धियों में गिनाती है। पुलिस व्यवस्था, महिला हेल्पलाइन, एंटी रोमियो स्क्वॉड और मिशन शक्ति जैसे उपायों का विस्तार हुआ है। सरकार अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई को अपनी नीति बताती है। लेकिन दूसरी तरफ NCRB के आंकड़े यह भी बताते हैं कि महिलाओं के खिलाफ अपराध पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।

असली कसौटी क्या होगी?

करीब एक दशक में उत्तर प्रदेश की महिला सुरक्षा की राजनीति जरूर बदली है। अखिलेश यादव के दौर में कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा को लेकर बड़ी घटनाओं पर सरकार घिरी। बुलंदशहर हाईवे गैंगरेप जैसी घटनाओं ने उस समय सरकार के सामने गंभीर सवाल खड़े किए और पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई भी हुई। योगी आदित्यनाथ के दौर में महिला सुरक्षा को सख्त पुलिसिंग, एंटी रोमियो अभियान, मिशन शक्ति और अपराधियों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की भाषा में पेश किया गया। मुख्यमंत्री खुद कई बार कह चुके हैं कि बेटी से छेड़छाड़ करने वाले को “अगले चौराहे पर यमराज” मिलेगा।

असली परीक्षा यह है कि क्या यूपी की बेटी बिना डर स्कूल, कॉलेज, बाजार, नौकरी और रात की शिफ्ट तक जा सकती है? क्या उसकी शिकायत थाने में बिना दबाव दर्ज होती है? क्या पुलिस समय पर पहुंचती है? क्या जांच निष्पक्ष होती है? क्या आरोपी को कानून के मुताबिक सजा मिलती है? और क्या पीड़िता को न्याय मिलने में सालों नहीं लगते?  यूपी में पिछले करीब 10 वर्षों में व्यवस्था और राजनीतिक भाषा दोनों बदली हैं।

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