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1963 का चुनाव, जाति की राजनीति और लोहिया से संवाद: दीनदयाल उपाध्याय के राजनीतिक जीवन की रोचक कहानी

Deendayal Upadhyaya: आज के दौर में चुनाव जीतने के लिए जातीय समीकरण, गठबंधन और आक्रामक प्रचार को रणनीति का हिस्सा माना जाता है। कई राजनेता तमाम हथकंडों के सहारे चुनाव जीत जाते हैं, लेकिन जनता लंबे समय तक उन्हीं को याद रखती है जिन्होंने सत्ता का लालच करने के बजाय देश में वैचारिक राजनीति की जमीन तैयार की। ऐसे ही एक वैचारिक राजनेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय भी थे जिन्होंने चुनाव हार जाना बेहतर समझा मगर, मूल्यों की राजनीति नहीं छोड़ी। इस संबंध में उनके राजनीतिक जीवन के पहले और आखिरी चुनाव यानी 1963 के जौनपुर उपचुनाव को बहुत याद किया जाता है।

हार स्वीकार की, लेकिन जातिवादी राजनीति नहीं

पंडित दीनदयाल इस चुनाव को लड़ने के इच्छुक नहीं थे, लेकिन संगठन के निर्देश पर उन्हें मैदान में उतरना पड़ा। इस चुनाव में कांग्रेस ने राजदेव सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया था। चुनावी माहौल में जातीय समीकरण साधने की कोशिशें शुरू हुईं। ठाकुरवाद के जवाब में ब्राह्मणों को लामबंद करने की रणनीति भी सामने आई। इसकी जानकारी मिलने पर दीनदयाल उपाध्याय ने इसका विरोध किया। उन्होंने अपने समर्थकों से साफ कहा कि वे चुनाव में जाति को मुद्दा नहीं बनाएंगे, भले ही इसकी वजह से उन्हें हार का सामना क्यों न करना पड़े। उन्होंने राष्ट्रीय मुद्दों को आधार बनाकर चुनाव लड़ा, लेकिन जीत नहीं सके।हार के बाद भी उन्होंने राजनीतिक शिष्टाचार का परिचय दिया। उन्होंने उसी शाम मतदाताओं के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए सभा की और विजयी उम्मीदवार को बधाई देने उनके घर भी पहुंचे।

Deendayal Upadhyaya: दीनदयाल उपाध्याय के राजनीतिक जीवन की कहानी
दीनदयाल उपाध्याय के राजनीतिक जीवन की कहानी
Deendayal Upadhyaya: लोहिया और जनसंघ के बीच संवाद

दीनदयाल उपाध्याय को केवल जनसंघ के वैचारिक स्तंभ या आज की भाजपा की वैचारिक विरासत तक सीमित करके देखना उनके राजनीतिक जीवन के कई महत्वपूर्ण पहलुओं को नजरअंदाज करना होगा। उनके जीवन में ऐसे कई प्रसंग मिलते हैं, जो अलग विचारधाराओं के बावजूद राजनीतिक संवाद की जरूरत को सामने रखते हैं।1963 के जौनपुर, अमरोहा और फर्रुखाबाद के लोकसभा उपचुनाव इसका उदाहरण हैं। समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने जौनपुर सीट जनसंघ के लिए छोड़ दी थी और दीनदयाल उपाध्याय के समर्थन में सभाएं भी की थीं। वहीं जनसंघ ने फर्रुखाबाद से लोहिया और अमरोहा से आचार्य कृपलानी का समर्थन किया था। दोनों चुनाव जीत गए, जबकि दीनदयाल उपाध्याय को जौनपुर में हार मिली।यह सहयोग उस दौर में हुआ, जब दोनों पक्षों की विचारधाराएं अलग थीं। इसी तरह के संवाद ने आगे चलकर गैरकांग्रेसवाद की राजनीति के लिए जमीन तैयार करने में भूमिका निभाई।

अवसरवादी गठबंधन के भी खिलाफ थे

दीनदयाल उपाध्याय राजनीतिक दलों के बीच सहयोग के विरोधी नहीं थे, लेकिन वे केवल सत्ता के लिए किए जाने वाले अवसरवादी गठबंधनों के पक्ष में भी नहीं थे। दूसरी ओर, वे राजनीतिक छुआछूत को भी सही नहीं मानते थे।1962 में जनसंघ के भोपाल अधिवेशन में उन्होंने कहा था कि अलग-अलग दलों के एक मंच पर आने से एक-दूसरे को समझने और पुराने पूर्वाग्रहों से बाहर निकलने का मौका मिलता है। हालांकि वे यह भी मानते थे कि सहयोग के दौरान किसी दल को अपनी विचारधारा और मूल पहचान नहीं छोड़नी चाहिए।

Deendayal Upadhyaya: दीनदयाल उपाध्याय और लोहिया का राजनीतिक संवाद
दीनदयाल उपाध्याय और लोहिया का राजनीतिक संवाद
Deendayal Upadhyaya: मतभेदों के बीच संवाद पर जोर

28 दिसंबर 1963 को भारतीय जनसंघ के अहमदाबाद अधिवेशन में दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था कि अलग-अलग राजनीतिक दलों के अस्तित्व के पीछे कुछ बुनियादी कारण होते हैं। इसलिए केवल सद्भावना के आधार पर सभी दलों को एक कर देना व्यावहारिक राजनीति नहीं है। जहां विचार मिलते हैं, वहां साथ काम किया जा सकता है और जहां मतभेद हैं, वहां अलग-अलग मंचों से अपनी बात रखी जानी चाहिए।लोहिया और दीनदयाल के बीच भारत-पाक महासंघ को लेकर हुआ संवाद इसका उदाहरण था। लोहिया ने दीनदयाल से कहा था कि अखंड भारत की अवधारणा में जनसंघ और संघ का विश्वास पाकिस्तान में असुरक्षा की भावना पैदा करता है। इसके जवाब में दीनदयाल ने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान को बलपूर्वक भारत में मिलाने की जनसंघ की कोई योजना नहीं है। उन्होंने पाकिस्तान के लोगों को इस चिंता से मुक्त करने की बात कही।

भारत-पाक महासंघ पर साझा बयान

12 अप्रैल 1964 को लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय ने भारत-पाक महासंघ के मुद्दे पर एक साझा बयान जारी किया। दोनों नेताओं ने माना कि भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में तनाव और अलग-अलग हिस्सों में बंटी बातचीत समस्याओं को बढ़ाती है। उन्होंने दोनों देशों की सरकारों के बीच खुले मन से बातचीत की जरूरत बताई।दोनों ने पूर्वी पाकिस्तान में हुए दंगों और भारत आने वाले हिंदू शरणार्थियों को लेकर चिंता जताई। साथ ही पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की मांग की। इसके साथ ही उन्होंने भारत में रहने वाले मुसलमानों को हिंसा का निशाना नहीं बनाने की अपील भी की।उनका तर्क था कि जब आम लोग आपस में लड़ते हैं तो सरकारों को अपनी विफलताओं को छिपाने और दमन का रास्ता अपनाने का मौका मिल जाता है। छह दशक से ज्यादा पुराने इस संवाद की खास बात यह थी कि दोनों नेताओं ने राष्ट्रहित और मानवीय संवेदना को एक-दूसरे के खिलाफ नहीं माना।

Deendayal Upadhyaya: जाति की राजनीति से दूर रहे दीनदयाल उपाध्याय
जाति की राजनीति से दूर रहे दीनदयाल उपाध्याय
Deendayal Upadhyaya: 1967 में नौ राज्यों में गैरकांग्रेसी सरकारें

डॉ. राम मनोहर लोहिया का मानना था कि देश और लोकतंत्र के हित में केंद्र से लेकर राज्यों तक कांग्रेस को सत्ता से बाहर करना जरूरी है। 1964 में पंडित जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद कांग्रेस का राजनीतिक प्रभाव धीरे-धीरे कमजोर होने लगा। 1967 के आम चुनाव में कांग्रेस को विपक्ष से मजबूत चुनौती मिली।यह आखिरी अवसर था, जब लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ हुए थे। केंद्र में कांग्रेस सत्ता बचाने में सफल रही, लेकिन कई राज्यों में उसे बड़ा झटका लगा। इस चुनाव में जनसंघ को लोकसभा की 35 सीटें मिलीं और 75 सीटों पर वह दूसरे स्थान पर रही।कुल नौ राज्यों में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और अलग-अलग दलों के संयुक्त विधायक दलों की सरकारें बनीं। जनसंघ भी इन सरकारों में शामिल थी। हालांकि ये सरकारें ज्यादा समय तक नहीं चल सकीं और इसके बाद मध्यावधि चुनावों का दौर शुरू हुआ।

सत्ता से ज्यादा विचारों की चिंता

कांग्रेस को सत्ता से बाहर रखने के उद्देश्य से जनसंघ इन संयुक्त सरकारों का हिस्सा बनी थी। लेकिन दीनदयाल उपाध्याय पार्टी की सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर बहुत उत्साहित नहीं थे। उन्हें डर था कि केवल कांग्रेस को हटाने के लिए किया गया यह राजनीतिक प्रयोग कहीं जनसंघ के संगठन और उसकी विचारधारा को कमजोर न कर दे।उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा था कि कांग्रेस की सरकारें खत्म हों, यह उनकी इच्छा है, लेकिन इसके लिए ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जाना चाहिए जो स्वस्थ राजनीतिक परंपराओं के खिलाफ हो।

गैरकांग्रेसवाद की राजनीति को लेकर उनकी चिंताएं भी थीं। नानाजी देशमुख ने बाद में एक साक्षात्कार में बताया था कि 1968 में दीनदयाल चाहते थे कि जनसंघ के सभी मंत्री अपने पद से इस्तीफा दे दें। उनकी बात स्वीकार नहीं की गई और इससे वे काफी दुखी हुए। यह प्रसंग दिखाता है कि उनके लिए राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता हासिल करना नहीं था। उनके लिए यह भी महत्वपूर्ण था कि सत्ता में आने के बाद कोई दल अपनी पहचान, संगठन और मूल उद्देश्य को कितना बचा पाता है।

दीनदयाल उपाध्याय की राजनीति के अनसुने पहलू
दीनदयाल उपाध्याय की राजनीति के अनसुने पहलू
Deendayal Upadhyaya: पद की इच्छा नहीं थी

21 मई 1951 को डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में जनसंघ की स्थापना हुई थी। संघ की ओर से पार्टी के लिए समर्पित किए गए प्रचारकों में उत्तर प्रदेश से दीनदयाल उपाध्याय और नानाजी देशमुख भी शामिल थे।1952 के कानपुर अधिवेशन में दीनदयाल उपाध्याय को जनसंघ का महामंत्री बनाया गया। डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी उनकी प्रतिभा और मेहनत से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने कहा था कि अगर उन्हें दो-तीन दीनदयाल मिल जाएं तो वे देश की राजनीति का नक्शा बदल सकते हैं।

दीनदयाल करीब 15 वर्षों तक पार्टी के महामंत्री रहे। 1967 के कालीकट अधिवेशन में उन्हें पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया। हालांकि वे खुद इस पद को स्वीकार करने के इच्छुक नहीं थे। गुरु गोलवलकर ने भी लिखा था कि दीनदयाल इस पद की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते थे। लेकिन परिस्थितियों के कारण उन्हें यह दायित्व स्वीकार करना पड़ा और उन्होंने एक स्वयंसेवक की तरह अपनी जिम्मेदारी निभाई।उनके राजनीतिक जीवन का एक प्रमुख पहलू यही था कि किसी पद को हासिल करना उनकी अंतिम मंजिल नहीं थी।

एकात्म मानववाद में व्यक्ति और समाज का संतुलन

1964 में जनसंघ के ग्वालियर चिंतन शिविर में दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद की अवधारणा सामने रखी। इसमें उन्होंने व्यक्ति और समाज के बीच शांति, संतुलन और सामंजस्य पर जोर दिया।उन्होंने वर्ग संघर्ष को बढ़ावा देने वाले साम्यवाद को स्वीकार नहीं किया। साथ ही पूंजीवाद में व्यक्ति और समाज के बीच बताए जाने वाले विरोध को भी उन्होंने सही नहीं माना। उनके अनुसार व्यक्ति समाज से अलग कोई पूरी तरह स्वतंत्र इकाई नहीं है। वे व्यक्ति और समाज के बीच परस्पर निर्भरता और सामंजस्य की बात करते थे।

इसे समझाने के लिए वे फूल और उसकी पंखुड़ियों का उदाहरण देते थे। उनके अनुसार कोई फूल अपनी पंखुड़ियों से मिलकर फूल बनता है, लेकिन उन पंखुड़ियों का महत्व भी पूरे फूल के साथ जुड़े रहने में है।राष्ट्र के संदर्भ में उन्होंने ‘विराट’ की अवधारणा रखी। जिस तरह शरीर के अलग-अलग अंगों को प्राण शक्ति देता है और उन्हें एक साथ जोड़कर रखता है, उसी तरह विराट राष्ट्रजीवन को शक्ति प्रदान करता है। एकात्म मानववाद के केंद्र में व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के बीच संतुलन स्थापित करने का विचार था।इसी सोच से उनका अंत्योदय का विचार भी जुड़ा था। इसमें राष्ट्र की प्रगति का मतलब केवल ऊपर के स्तर पर विकास या चमक नहीं, बल्कि समाज के सबसे अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचना माना गया।

Deendayal Upadhyaya: राष्ट्रसेवा केवल भाषणों तक सीमित नहीं

दीनदयाल उपाध्याय के लिए राष्ट्रसेवा केवल भाषणों और विचारों तक सीमित नहीं थी। 1942 में अपने चाचा को लिखे एक पत्र में उन्होंने सवाल किया था कि क्या परिवार का कम से कम एक सदस्य राष्ट्र की सेवा के लिए समर्पित नहीं किया जा सकता?11 फरवरी 1968 को लखनऊ से पटना की रेल यात्रा के दौरान उनके जीवन का अंत हो गया। उनका शव मुगलसराय की रेल लाइन पर मिला था। उनकी मृत्यु से जुड़ी गुत्थी कभी पूरी तरह सुलझ नहीं सकी।