Gyanesh Kumar: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर इन दिनों राजनीतिक विवाद के साथ एक अहम कानूनी सवाल भी चर्चा में है—क्या CEC के खिलाफ FIR दर्ज हो सकती है और क्या उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है?
इस सवाल के केंद्र में है मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की धारा 16। इस धारा में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्य से जुड़े कार्यों को लेकर विशेष कानूनी सुरक्षा दी गई है। हालांकि, कानून में सीधे तौर पर यह नहीं लिखा है कि CEC को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।
पहले समझिए धारा 16 में क्या लिखा है
2023 के कानून की धारा 16 मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की सुरक्षा से संबंधित है। इसके तहत किसी मौजूदा या पूर्व CEC/EC के खिलाफ उस काम, बात या फैसले से जुड़ी दीवानी या आपराधिक कार्यवाही पर अदालत में सुरक्षा मिलती है, जो उनके आधिकारिक कर्तव्य या कार्य के निर्वहन में किया गया हो या ऐसा करने का दावा किया गया हो।
धारा 16 असल में क्या है? आसान शब्दों में कहें तो, यह धारा मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों को एक “कानूनी कवच” पहनाती है. कानून कहता है कि कोई भी अदालत किसी भी ऐसे व्यक्ति जो CEC या EC है, या पहले कभी रहा हो के खिलाफ कोई क्रिमिनल या सिविल केस नहीं सुनेगी. यह कवच उन्हें उन सभी कामों, बातों या फैसलों के लिए मिलता है जो उन्होंने अपनी “ड्यूटी” के दौरान किए हैं. सबसे खास बात यह है कि रिटायर होने के बाद भी उन पर उनकी ड्यूटी के दौरान किए गए फैसलों के लिए मुकदमा नहीं चलाया जा सकता.
Gyanesh Kumar: फिर FIR से गिरफ्तारी तक पेंच कहां है?
किसी व्यक्ति के खिलाफ शिकायत होना और अदालत में आपराधिक मुकदमा चलना अलग-अलग कानूनी चरण हैं। धारा 16 का स्पष्ट प्रावधान अदालत के स्तर पर लागू होता है। ऐसे में यदि किसी शिकायत में CEC के खिलाफ आपराधिक आरोप लगाए जाते हैं, तो यह सवाल उठेगा कि आरोपित कृत्य आधिकारिक चुनावी जिम्मेदारी निभाते हुए किया गया था या उसके दायरे से बाहर था। यही तय करेगा कि धारा 16 की सुरक्षा किस हद तक लागू होगी। गिरफ्तारी या जांच के स्तर पर यह प्रावधान कैसे काम करेगा, इस पर अंतिम स्थिति संबंधित कानूनों और न्यायिक व्याख्या पर निर्भर करेगी।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और निर्वाचन आयोग को लेकर विवाद उस समय तेज हुआ जब चुनाव आयोग के कामकाज से जुड़ी एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कुछ फैसलों और आदेशों को लेकर कई बार आपत्तियां दर्ज की थीं।
रिपोर्ट में पिछले करीब 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 मौकों पर असहमति दर्ज किए जाने का दावा किया गया। दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग ने कहा कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए और मसौदा स्तर पर अधिकारियों की ओर से आपत्तियां उठाना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। इस विवाद के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्षी नेताओं की ओर से कार्रवाई और इस्तीफे की मांग तेज हुई।

Gyanesh Kumar: राहुल गांधी ने लगाए क्या आरोप?
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए चुनावों में कथित ‘वोट चोरी’ के आरोप लगाए और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। ये राजनीतिक आरोप हैं। निर्वाचन आयोग ने चुनावी प्रक्रिया और अपने फैसलों को लेकर अपनी अलग स्थिति रखी है।
महुआ मोइत्रा ने CEC के खिलाफ पुलिस शिकायत दी
विवाद के बीच तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने 24 सितंबर 2026 को दिल्ली के संसद मार्ग पुलिस थाने में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ शिकायत दी और FIR दर्ज करने की मांग की। मोइत्रा ने आरोप लगाया कि विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया में मतदाता सूची से जुड़े फैसलों में नियमों का उल्लंघन और मतदाताओं के नाम हटाने जैसी अनियमितताएं हुईं। ये उनके आरोप हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि इस स्तर पर नहीं हुई है।यहीं से FIR और धारा 16 को लेकर कानूनी सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है, क्या पुलिस शिकायत अपने आप में धारा 16 की सुरक्षा को खत्म कर देती है?
Gyanesh Kumar: क्या धारा 16 CEC को गिरफ्तारी से बचाती है?
धारा 16 में गिरफ्तारी पर स्पष्ट रोक नहीं लिखी है। यह प्रावधान मुख्य रूप से यह बताता है कि आधिकारिक कर्तव्य या कार्य के निर्वहन से जुड़े कृत्यों को लेकर CEC या EC के खिलाफ अदालत में दीवानी या आपराधिक कार्यवाही किस सीमा तक की जा सकती है। इसलिए ‘धारा 16 के कारण CEC को गिरफ्तार ही नहीं किया जा सकता’ कहना कानून के शब्दों को जरूरत से ज्यादा व्यापक तरीके से पेश करना होगा। वहीं दूसरी तरफ यह भी कहना सही नहीं होगा कि धारा 16 का कोई असर ही नहीं है। आधिकारिक कर्तव्य से जुड़े मामलों में यह एक महत्वपूर्ण कानूनी सुरक्षा प्रदान करती है।
आधिकारिक कर्तव्य की सीमा सबसे बड़ा सवाल
मान लीजिए किसी चुनाव आयुक्त पर मतदाता सूची से संबंधित फैसला लेने का आरोप लगता है। मतदाता सूची से जुड़ा काम निर्वाचन आयोग के आधिकारिक दायित्व का हिस्सा है। लेकिन अगर आरोप यह हो कि किसी अधिकारी ने अपने पद का इस्तेमाल करते हुए जानबूझकर कोई अलग आपराधिक कृत्य किया, तो सवाल उठेगा कि वह काम वास्तव में आधिकारिक कर्तव्य के दायरे में आता है या नहीं। यही वह कानूनी सीमा है, जिस पर किसी मामले में अदालत को विचार करना पड़ सकता है। केवल यह कह देना कि कोई काम सरकारी पद पर रहते हुए किया गया, अपने आप यह साबित नहीं करता कि हर कथित कृत्य आधिकारिक कर्तव्य के तहत संरक्षित होगा।
Gyanesh Kumar: 2023 में कानून क्यों बदला?
2023 का कानून केवल धारा 16 की वजह से चर्चा में नहीं है। इसी कानून ने CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया में भी बदलाव किया। मार्च 2023 में अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली समिति की व्यवस्था की थी, जब तक संसद इस विषय पर कानून न बना दे।
इसके बाद संसद ने दिसंबर 2023 में नया कानून पारित किया। इसमें चयन समिति की संरचना बदली गई और भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया। अब चयन समिति में प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं। यह व्यवस्था भी राजनीतिक बहस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।
तो क्या CEC के खिलाफ कार्रवाई असंभव है?
शिकायत, FIR, जांच, गिरफ्तारी और अदालत में मुकदमा- ये अलग-अलग कानूनी चरण हैं। धारा 16 इन सभी को एक ही तरीके से नहीं रोकती। इसका स्पष्ट प्रावधान आधिकारिक कर्तव्य से जुड़े मामलों में अदालत की दीवानी और आपराधिक कार्यवाही पर सुरक्षा से संबंधित है।
इसलिए किसी CEC के खिलाफ कार्रवाई का वास्तविक सवाल यह होगा कि आरोप किस तरह के हैं, संबंधित कृत्य आधिकारिक कार्य के दायरे में आता है या नहीं, पुलिस और जांच एजेंसियों के पास क्या कानूनी आधार है और अदालत उस मामले में धारा 16 की व्याख्या कैसे करती है। यही वजह है कि CEC के खिलाफ FIR से लेकर गिरफ्तारी और मुकदमे तक का सवाल केवल राजनीतिक आरोपों से तय नहीं होगा, बल्कि संबंधित कानूनों और न्यायिक प्रक्रिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी।
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