Viksit Bharat 2047: भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने की चर्चा में अर्थव्यवस्था, रोजगार, उद्योग, तकनीक और बुनियादी ढांचा जैसे मुद्दे प्रमुख हैं। लेकिन इस तस्वीर का एक बड़ा हिस्सा घर के भीतर होने वाले उस काम से भी जुड़ा है, जिसके बदले महिलाओं को कोई वेतन नहीं मिलता। सागर स्थित डॉक्टर हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शिवानी मीणा की रिसर्च इसी अवैतनिक घरेलू और देखभाल संबंधी काम को महिला आर्थिक भागीदारी के नजरिए से देखने की जरूरत बताती है।
खाना बनाना, सफाई करना, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल जैसे कामों में महिलाओं का काफी समय खर्च होता है। डॉ. मीणा के मुताबिक, जब घरेलू जिम्मेदारियों में समय ज्यादा जाता है तो कौशल विकास, रोजगार, उद्यमिता और दूसरी आर्थिक गतिविधियों के लिए महिलाओं के पास उपलब्ध समय प्रभावित हो सकता है। ऐसे में सवाल यह है कि 2047 के विकसित भारत के लक्ष्य में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए उनके समय और घरेलू जिम्मेदारियों को किस तरह समझा जाए।
रिसर्च का फोकस क्या है?
डॉ. शिवानी मीणा के अध्ययन का एक अहम पहलू महिलाओं के अवैतनिक घरेलू और देखभाल संबंधी काम को समझना है। घर में किया जाने वाला यह काम परिवार के लिए जरूरी है, लेकिन इसके बदले सीधे तौर पर कोई वेतन नहीं मिलता। यहां मुद्दा घरेलू काम करने का नहीं, बल्कि उस समय और अवसर का है जो इन जिम्मेदारियों के कारण महिलाओं के पास कम रह जाता है। अगर दिन का बड़ा हिस्सा खाना बनाने, सफाई या परिवार की देखभाल में चला जाए तो कौशल सीखने, नौकरी करने या कारोबार शुरू करने के लिए समय निकालना मुश्किल हो सकता है।
इसीलिए महिला श्रम को समझते समय केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि कितनी महिलाएं नौकरी या किसी आय वाली गतिविधि में शामिल हैं। यह भी देखना जरूरी है कि महिलाएं अपने दिन का कितना समय घरेलू और देखभाल संबंधी काम में लगा रही हैं।
Viksit Bharat 2047: महिलाओं के ‘अनपेड वर्क’ का आर्थिक महत्व क्या है?
महिलाओं का घरेलू काम परिवार और समाज के लिए जरूरी है, लेकिन बाजार में होने वाले लेन-देन की तरह इसकी सीधी कीमत तय नहीं होती। मसलन, घर में खाना बनाने या बच्चों की देखभाल के लिए महिला को वेतन नहीं मिलता। वहीं यही सेवाएं बाजार से ली जाएं तो उनके लिए भुगतान करना पड़ता है। डॉ. मीणा का कहना है कि घरेलू और देखभाल संबंधी काम में महिलाओं के लगाए गए समय को आर्थिक नजरिए से समझने की जरूरत है। उनके मुताबिक, जब इस तरह के अवैतनिक काम को आर्थिक गतिविधियों के व्यापक संदर्भ में नहीं देखा जाता तो महिलाओं के योगदान की पूरी तस्वीर सामने नहीं आ पाती। इसका मतलब यह नहीं है कि घरेलू काम अर्थव्यवस्था में कोई भूमिका नहीं निभाता। बल्कि सवाल यह है कि राष्ट्रीय आर्थिक आंकड़ों को समझते समय बाजार के बाहर किए जाने वाले ऐसे काम और उसमें लगने वाले समय को किस तरह देखा जाए।
क्या घरेलू काम महिलाओं को रोजगार से दूर रखता है?
घरेलू जिम्मेदारियां महिलाओं की रोजगार भागीदारी को प्रभावित करने वाले कई कारकों में से एक हो सकती हैं। जिन महिलाओं का काफी समय घर और परिवार की देखभाल में चला जाता है, उनके लिए नियमित नौकरी, प्रशिक्षण या उद्यमिता के अवसरों के लिए समय निकालना मुश्किल हो सकता है। डॉ. मीणा के अनुसार, महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को केवल औपचारिक रोजगार के आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। महिलाएं अनौपचारिक क्षेत्र और कृषि जैसी गतिविधियों में भी बड़ी भूमिका निभाती हैं। इसलिए महिला श्रम की पूरी तस्वीर समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि वे रोजगार के अलावा घरेलू काम, देखभाल और दूसरी गतिविधियों में कितना समय दे रही हैं।
Viksit Bharat 2047: टाइम यूज सर्वे से क्या समझ आता है?
महिलाओं के समय के इस्तेमाल को समझने के लिए टाइम यूज सर्वे महत्वपूर्ण आधार है। डॉ. मीणा के मुताबिक, 2024 में प्रकाशित टाइम यूज सर्वे को बेसलाइन के तौर पर इस्तेमाल कर अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में महिलाओं के समय के इस्तेमाल का आगे अध्ययन किया जा सकता है। इस तरह के अध्ययन से यह समझने में मदद मिल सकती है कि महिलाएं घरेलू काम में कितना समय दे रही हैं, आर्थिक गतिविधियों में उनकी भागीदारी किस तरह है और किन क्षेत्रों में घरेलू जिम्मेदारियां उनके लिए रोजगार या कौशल विकास के अवसरों को सीमित कर सकती हैं। इसका एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पूरे भारत को एक समान तस्वीर मानने के बजाय राज्य और क्षेत्र के स्तर पर अंतर को समझा जाए।
क्या पूरे भारत में महिलाओं की स्थिति एक जैसी है?
नहीं। महिलाओं के घरेलू काम, रोजगार और दूसरी आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी की स्थिति अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में अलग हो सकती है। डॉ. मीणा के मुताबिक, कुछ क्षेत्रों में महिलाएं घरेलू जिम्मेदारियों के साथ कृषि और दूसरी आर्थिक गतिविधियों में भी सक्रिय हैं, जबकि कुछ इलाकों में घरेलू काम में लगने वाला समय ज्यादा हो सकता है। इसलिए महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाने के लिए पूरे देश में एक जैसा समाधान अपनाने के बजाय क्षेत्रीय स्थिति को समझना जरूरी है। किस राज्य या इलाके में महिलाओं का समय किन कामों में ज्यादा जा रहा है और उनकी आर्थिक भागीदारी में सबसे बड़ी बाधा क्या है, यह अलग-अलग स्तर पर अध्ययन का विषय होना चाहिए।

बुंदेलखंड में पानी का सवाल महिलाओं के समय से कैसे जुड़ा है?
बुंदेलखंड और पानी की कमी वाले कई इलाकों में महिलाओं को घरेलू जरूरतों के लिए दूर से पानी लाना पड़ता है। ऐसे में पानी की समस्या सिर्फ पेयजल की उपलब्धता तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह महिलाओं के समय और उनकी दूसरी गतिविधियों से भी जुड़ जाती है। अगर किसी महिला के दिन का बड़ा हिस्सा पानी लाने में खर्च हो रहा है तो उसके पास पढ़ाई, कौशल विकास, रोजगार, कृषि या उद्यमिता जैसी गतिविधियों के लिए कितना समय बचेगा? डॉ. मीणा इसी तरह के उदाहरण के जरिए बुनियादी सुविधाओं और महिला आर्थिक भागीदारी के बीच संबंध को समझने की जरूरत बताती हैं। ऐसे क्षेत्रों में पर्याप्त और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने से महिलाओं का पानी लाने में खर्च होने वाला समय कम किया जा सकता है। इससे बचा समय वे दूसरी गतिविधियों में इस्तेमाल कर सकती हैं।
Viksit Bharat 2047: महिलाओं का समय बचाना क्यों जरूरी है?
महिलाओं को रोजगार से जोड़ने की बात केवल नौकरी उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं हो सकती। रोजगार या प्रशिक्षण का अवसर तभी उपयोगी होगा, जब महिला के पास उसे हासिल करने के लिए पर्याप्त समय भी हो। इसीलिए पेयजल, घरेलू सुविधाएं, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल से जुड़ी व्यवस्थाएं और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर महिला आर्थिक भागीदारी के महत्वपूर्ण पहलू हो सकते हैं। डॉ. मीणा के मुताबिक, महिलाओं के समय को बचाना और उन्हें आगे बढ़ने के अवसर देना साथ-साथ जरूरी है।
2047 के विकसित भारत से इसका क्या संबंध है?
भारत के 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य की चर्चा में आर्थिक विकास और रोजगार अहम मुद्दे हैं। ऐसे में महिलाओं की श्रम बाजार और दूसरी आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी भी इस तस्वीर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अगर महिलाओं का बड़ा समय ऐसे घरेलू कामों में खर्च हो रहा है जिनके बदले उन्हें वेतन नहीं मिलता, तो उनके पास शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार और उद्यमिता के लिए उपलब्ध समय सीमित हो सकता है। इसीलिए विकसित भारत की चर्चा में महिलाओं की भागीदारी को केवल रोजगार के आंकड़ों से देखने के बजाय उनके पूरे टाइम यूज पैटर्न को समझना भी जरूरी है।
Viksit Bharat 2047: रिसर्च का निष्कर्ष क्या है?
इस रिसर्च का मूल सवाल महिलाओं को घरेलू काम से हटाना नहीं है। सवाल यह है कि घरेलू जिम्मेदारियों और महिलाओं के आर्थिक अवसरों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। घर का काम और परिवार की देखभाल जरूरी है। लेकिन अगर इन जिम्मेदारियों में महिलाओं का इतना समय खर्च हो जाए कि उनके पास शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार और उद्यमिता के लिए पर्याप्त समय न बचे, तो यह उनकी आर्थिक भागीदारी को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण पहलू बन सकता है। इसलिए 2047 के विकसित भारत की तस्वीर को समझते समय महिलाओं के अवैतनिक काम, समय के इस्तेमाल और श्रम बाजार में भागीदारी- इन तीनों को साथ देखकर समझने की जरूरत है। महिलाओं का समय बचाने वाली बुनियादी सुविधाएं और उन्हें आर्थिक अवसर देने की व्यवस्था इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकती है।









