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यूपी के लोगों को बिजली बिल में फिर राहत, कहानी सिर्फ 5.24% की नहीं, जानिए सीएम योगी के राज में कैसे सुधरी बिजली व्यवस्था?

योगी आदित्यनाथ
उत्तर प्रदेश के बिजली उपभोक्ताओं के लिए अक्टूबर का महीना एक बार फिर राहत लेकर आया है। उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड ने अक्टूबर 2026 के लिए 5.24 प्रतिशत नकारात्मक ईंधन एवं विद्युत क्रय समायोजन अधिभार (FPPAS) लागू किया है। इसका मतलब है कि अक्टूबर के बिल में उपभोक्ताओं को 5.24 प्रतिशत की राहत मिलेगी। पूरे प्रदेश के करीब 3.73 करोड़ उपभोक्ताओं को इसका फायदा मिलने और लगभग ₹424.45 करोड़ की कुल राहत का अनुमान है। लेकिन यूपी की बिजली की मौजूदा तस्वीर को सिर्फ इस महीने के बिल से समझना अधूरा होगा। पिछले वर्षों में प्रदेश में बिजली कनेक्शन, उत्पादन, गांवों तक नेटवर्क, आपूर्ति, ट्रांसमिशन और किसानों के लिए बिजली व्यवस्था में कई स्तरों पर बदलाव हुए हैं। और इस कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह भी है कि 2017 से पहले और उसके बाद बिजली व्यवस्था के आंकड़ों में कितना अंतर आया।
UP News: अक्टूबर में क्यों घट रहा है बिजली बिल?
अक्टूबर की 5.24 प्रतिशत राहत किसी सामान्य टैरिफ कटौती का नतीजा नहीं है। यह FPPAS व्यवस्था के तहत बिजली खरीद और ट्रांसमिशन की लागत में हुए बदलाव का समायोजन है। जुलाई 2026 में UPPCL ने औसतन ₹4.69 प्रति यूनिट की दर से बिजली खरीदी, जबकि स्वीकृत औसत लागत ₹4.94 प्रति यूनिट थी। खरीद लागत कम रहने के कारण अक्टूबर के बिल में नकारात्मक समायोजन आया। इससे पहले जुलाई में 4.43 प्रतिशत, अगस्त में 2.92 प्रतिशत और सितंबर में 7.93 प्रतिशत की राहत मिल चुकी है। यानी अक्टूबर लगातार चौथा महीना है जब FPPAS के जरिए उपभोक्ताओं के बिल में कमी आई है। यानी आज की खबर केवल बिल घटने की नहीं है। इसके पीछे बिजली खरीद, लागत और वितरण व्यवस्था का पूरा गणित है।
2017 से पहले और अब: बिजली के आंकड़ों में कितना बदला यूपी?
यूपी की बिजली व्यवस्था में बदलाव को समझने के लिए पुराने और नए आंकड़ों को साथ रखकर देखना जरूरी है। उत्तर प्रदेश सरकार के एक आधिकारिक संकलन के मुताबिक 2012-17 के दौरान करीब 8.44 लाख बिजली कनेक्शन जारी हुए थे, जबकि 2017 के बाद यह संख्या करीब 1.65 करोड़ बताई गई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2017 के बाद 1,21,000 से ज्यादा मजरों के विद्युतीकरण का काम भी किया गया। इसके साथ सौभाग्य योजना के जरिए बड़ी संख्या में घरों तक बिजली कनेक्शन पहुंचाने की व्यवस्था हुई। यहां तुलना का पैमाना महत्वपूर्ण है। पुराने और नए आंकड़ों की अवधि और गणना पद्धति अलग हो सकती है, इसलिए इन्हें उसी संदर्भ में पढ़ना चाहिए। लेकिन उपलब्ध सरकारी आंकड़े यह जरूर दिखाते हैं कि 2017 के बाद बिजली कनेक्शन विस्तार को बड़े पैमाने पर अभियान के रूप में आगे बढ़ाया गया। यानी बिजली के मोर्चे पर योगी सरकार के शुरुआती वर्षों की बड़ी प्राथमिकता सिर्फ उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि उन घरों तक कनेक्शन पहुंचाना भी थी जो बिजली नेटवर्क से बाहर थे।
योगी आदित्यनाथ के साथ यूपी की बिजली व्यवस्था, 5.24 प्रतिशत बिल राहत और 2017 से पहले व बाद की बिजली तस्वीर
यूपी में बिजली व्यवस्था का बदलता दौर: अक्टूबर में 5.24% बिल राहत और 2017 के बाद बिजली कनेक्शन, आपूर्ति व ढांचे में विस्तार।
UP News: गांव से शहर तक आपूर्ति के घंटे बढ़े
कनेक्शन मिलने के बाद अगला सवाल था कि बिजली कितनी देर मिल रही है? योगी सरकार के शुरुआती दौर में ग्रामीण क्षेत्रों में 18 घंटे, तहसील मुख्यालयों में 20 घंटे और जिला मुख्यालयों में 24 घंटे बिजली आपूर्ति का लक्ष्य रखा गया था। खराब ट्रांसफॉर्मर को भी शहरी क्षेत्रों में 24 घंटे और ग्रामीण क्षेत्रों में 48 घंटे के भीतर बदलने की व्यवस्था पर जोर दिया गया। बाद के सरकारी आंकड़ों में आपूर्ति के घंटों में और सुधार दर्ज किया गया। 2024-25 में ग्रामीण क्षेत्रों में औसत आपूर्ति करीब 20 घंटे, तहसील स्तर पर करीब 22 घंटे और जिला मुख्यालयों में 24 घंटे बताई गई थी। यानी बिजली की कहानी में बदलाव केवल कनेक्शन तक नहीं रहा, बल्कि उपलब्ध आपूर्ति के समय तक भी पहुंचा।
योगी सरकार ने बिजली उत्पादन पर भी बढ़ाया जोर
कनेक्शन और आपूर्ति बढ़ाने के लिए बिजली उत्पादन क्षमता का बढ़ना भी जरूरी था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दिसंबर 2025 में विधानसभा में दिए गए एक बयान में कहा था कि 2017 से पहले यूपी की बिजली उत्पादन क्षमता 7,159 मेगावॉट थी, जो उस समय बढ़कर 11,595 मेगावॉट हो गई थी। उन्होंने यह भी बताया था कि घाटमपुर, खुर्जा, अनपरा-ई, ओबरा-डी और मेजा जैसी परियोजनाओं से 6,541 मेगावॉट अतिरिक्त उत्पादन आने की प्रक्रिया में था। मुख्यमंत्री के अनुसार इन परियोजनाओं के पूरा होने के बाद प्रदेश की अपनी उत्पादन क्षमता 18,136 मेगावॉट तक पहुंच सकती है। यहां तस्वीर साफ है कि बढ़ते कनेक्शन और बढ़ती मांग के साथ सरकार ने उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर भी काम किया।
UP News: ट्रांसफॉर्मर खराब हुआ तो 48 घंटे में बदलने की व्यवस्था
ग्रामीण इलाकों में बिजली व्यवस्था की सबसे बड़ी परेशानियों में ट्रांसफॉर्मर खराब होना भी रहा है। इसीलिए सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में खराब ट्रांसफॉर्मर को 48 घंटे के भीतर बदलने की व्यवस्था पर जोर दिया। किसानों के निजी नलकूपों के ट्रांसफॉर्मर के लिए भी उन्हें उठाकर बदलने की व्यवस्था बनाई गई। इसका सीधा संबंध खेती से है। किसान के नलकूप का ट्रांसफॉर्मर खराब होने का मतलब कई बार सिंचाई रुकना होता है। इसलिए बिजली सुधार का एक हिस्सा सीधे कृषि व्यवस्था से भी जुड़ता है।
किसानों के लिए बिजली का अलग मोर्चा
योगी सरकार के कार्यकाल में निजी नलकूपों को बिजली कनेक्शन देने और कृषि क्षेत्र की बिजली लागत को कम करने पर भी काम हुआ। सरकारी बजट दस्तावेजों में 2022 से दिसंबर 2025 के बीच 2.41 लाख से ज्यादा निजी नलकूप कनेक्शन जारी किए जाने का उल्लेख है। किसानों के निजी नलकूपों के बिजली बिल के लिए भी सरकार ने बजट प्रावधान किए हैं। इसके साथ सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई की दिशा में भी काम बढ़ा है। इसका उद्देश्य धीरे-धीरे खेती की ऊर्जा जरूरतों को पारंपरिक बिजली व्यवस्था के साथ सौर ऊर्जा से भी जोड़ना है।
UP News: सिर्फ बिजलीघर नहीं, पूरा नेटवर्क मजबूत करने की कोशिश
बिजली पैदा करना एक हिस्सा है, लेकिन उसे लाखों घरों और खेतों तक पहुंचाने के लिए मजबूत ट्रांसमिशन और वितरण नेटवर्क भी चाहिए। उत्तर प्रदेश में पिछले वर्षों में नए विद्युत उपकेंद्र बनाए गए और पुराने उपकेंद्रों की क्षमता बढ़ाई गई। सरकारी आंकड़ों में 33/11 केवी उपकेंद्रों के निर्माण और क्षमता वृद्धि के साथ ट्रांसमिशन नेटवर्क को मजबूत करने की जानकारी दी गई है। यानी बिजली की पूरी चेन को देखें तो काम तीन स्तरों पर हुआ है जिसमे पहला है उत्पादन, फ़िर ट्रांसमिशन और फ़िर वितरण। यही वह ढांचा है जिसके चलते आज घरों, किसानों और उद्योगों की बिजली जरूरत को पुराने नेटवर्क की तुलना में बड़े पैमाने पर संभालने की क्षमता बनी है।
2017 के बाद सौर ऊर्जा को भी मिली नई दिशा
उत्तर प्रदेश अब केवल कोयला और पारंपरिक बिजली उत्पादन पर निर्भर रहने की दिशा में नहीं है। प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना के तहत दिसंबर 2025 तक यूपी में 1 गीगावॉट सौर क्षमता हासिल होने की जानकारी मुख्यमंत्री ने विधानसभा में दी थी। सरकार ने इसे योजना के क्रियान्वयन में राज्य की अग्रणी स्थिति से जोड़ा था। किसानों के लिए सोलर पंप और ग्रामीण क्षेत्रों में नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल भी इसी बदलाव का हिस्सा है। इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि यूपी में बिजली की मांग आने वाले वर्षों में और बढ़नी है। आज की राहत के पीछे बदलती बिजली अर्थव्यवस्था अक्टूबर की 5.24 प्रतिशत राहत का तत्काल कारण कम बिजली खरीद लागत है। लेकिन इस खबर को बड़े परिप्रेक्ष्य में देखें तो बिजली व्यवस्था में लागत का प्रबंधन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जुलाई 2026 में बिजली खरीद की औसत लागत स्वीकृत लागत से कम रही और उसका फायदा FPPAS के जरिए अक्टूबर के बिल में उपभोक्ताओं तक पहुंचा। इसका मतलब यह नहीं है कि बिजली के स्थायी टैरिफ में 5.24 प्रतिशत की कटौती हो गई है। यह एक निर्धारित नियामकीय व्यवस्था के तहत मिलने वाली मासिक राहत है।
UP News: 2017 से अब तक: कनेक्शन से क्षमता तक बदली कहानी
अगर पूरी तस्वीर को एक साथ रखें तो यूपी की बिजली व्यवस्था में पिछले वर्षों में कई समानांतर बदलाव दिखाई देते हैं। घर-घर कनेक्शन, मजरों तक बिजली, ग्रामीण आपूर्ति में बढ़ोतरी, ट्रांसफॉर्मर बदलने की समयसीमा, निजी नलकूप कनेक्शन, नए उपकेंद्र, उत्पादन क्षमता में विस्तार और सौर ऊर्जा पर बढ़ता जोर और ये सभी एक ही बिजली व्यवस्था की अलग-अलग कड़ियां हैं। सबसे बड़ा अंतर कनेक्शन के आंकड़ों में दिखाई देता है। सरकारी संकलन में 2012-17 के करीब 8.44 लाख कनेक्शनों के मुकाबले 2017 के बाद करीब 1.65 करोड़ कनेक्शन जारी किए जाने का आंकड़ा दिया गया है। यही आंकड़ा बताता है कि योगी सरकार के दौर में बिजली पहुंचाने का अभियान किस पैमाने पर आगे बढ़ा।
अब चुनौती सिर्फ बिजली पहुंचाने की नहीं
अब यूपी की बिजली व्यवस्था के सामने अगला चरण और बड़ा है। डेटा सेंटर, एयरपोर्ट, मेट्रो, नए औद्योगिक क्षेत्र और बढ़ते शहरीकरण के साथ बिजली की मांग बढ़ रही है। ऐसे में सरकार के सामने उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ बिजली खरीद की लागत, वितरण हानि, नेटवर्क की क्षमता और उपभोक्ता के बिल के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती रहेगी। फिलहाल अक्टूबर की 5.24 प्रतिशत राहत सीधे उपभोक्ता की जेब से जुड़ी खबर है। लेकिन इसके पीछे पिछले वर्षों में बिजली कनेक्शन से लेकर उत्पादन और नेटवर्क तक हुए बदलाव की एक लंबी कहानी है। और यही कहानी बताती है कि यूपी में बिजली का सवाल अब केवल “बिजली आई या नहीं” तक सीमित नहीं है। सवाल अब यह है कि बढ़ती मांग के बीच बिजली कितनी भरोसेमंद, कितनी सुलभ और कितनी किफायती रह सकती है।

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