Opinion: भारतीय जनता की न्यायपालिका में गहरी आस्था है। इसकी ठोस वजह भी है। समय-समय पर न्यायपालिका ने जनहित में कई महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं।माननीय न्यायालय जनहित के कई अहम विषयों पर स्वत: संज्ञान लेकर आवश्यक निर्देश भी जारी करते रहे हैं।हर तरफ से निराश होकर लोग अंत में न्यायालय की ही शरण में जाते हैं। ऐसे में कोई अल्बानिया के हिंसक प्रदर्शनों का हवाला देकर सोशल मीडिया के जरिए इशारों-इशारों में न्यायपालिका को धमकाने की कुत्सित कोशिश करे, तो वह बहुत मुग़ालते में है।यदि अल्बानिया के अराजक और हिंसक तत्वों ने अपने सुप्रीम कोर्ट को जलाया है, तो इससे भारत को क्यों सबक लेना चाहिए? भारत को सबक लेने की क्या जरूरत है? क्या ऐसा भारत में भी संभव है? अल्बानिया से सबक लेने का उपदेश देने से पहले ये तो जान लें कि भारत में लोकतंत्र की जड़ें कितनी गहरी हैं।
बांग्लादेश की तर्ज पर बदलाव का समर्थन कोई क्यों करे?
भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाने और चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की प्रक्रिया को रद्द करने की मांग को लेकर पिछले कई दिनों से सारा विपक्ष आंदोलित है।हालांकि इस बीच त्योहारों के चलते शांति है। लोकतत्र में विपक्ष का आंदोलित होना स्वाभाविक है। मुद्दों को लेकर शांतिपूर्वक धरने-प्रदर्शन की परंपरा चली आ रही है, लेकिन आंदोलन के दौरान किसी का यह कहना कि हमें बांग्लादेश से बदलाव लाने की प्रेरणा मिली है, किसी का यह कहना कि हम भारत में ‘रिजीम चेंज’ देखना चाहते हैं, बिल्कुल ही अनुचित है। सवाल यह है कि बांग्लादेश की तर्ज पर बदलाव लाने का समर्थन भारत की शांतिप्रिय जनता क्यों करे? जब भारतीय लोकतंत्र में मतदान से सत्ता परिवर्तन की परंपरा चली आ रही है, तो ‘रिजीम चेंज’ का और कौन सा तरीका होना चाहिए, क्या बांग्लादेश जैसा? आश्चर्यजनक है कि इस बीच अल्बानिया का हवाला देकर सोशल मीडिया के जरिए इशारों में न्यायपालिका को धमकाने की कुत्सित कोशिशें हो रही हैं कि कैसे अल्बानिया के अराजक आंदोलन ने वहां के सुप्रीम कोर्ट को जला दिया है।
भारत में अराजकता एवं हिंसा के लिए कोई जगह नहीं
आज फ्रांस और अल्बानिया हिंसा की लपटों में जल रहे हैं। खबर है कि इस बीच अल्बानिया में एक ऐसे ड्रोन को मार गिराया गया, जिसमें विस्फोटक लदे थे। इस ड्रोन के जरिए पीएम ऑफिस के इनर कोर्टयार्ड में हमला करना था, ताकि ज्यादा से ज्यादा नुकसान हो। क्या इस तरह का हिंसक माहौल तैयार करना छात्रों और युवाओं के बूते की बात है? जाहिर है कि उस देश को कुछ ऐसे स्वार्थी तत्व अस्थिर करना चाहते हैं, जिन्हें विदेशी ताकतों का सहयोग हो सकता है।अल्बानिया के प्रधानमंत्री ने भी ऐसा ही कहा है। अल्बानिया में बेशक स्वार्थी तत्व हावी हो गये हों, बांग्लादेश में बेशक अराजक व हिंसक लोग तख्तापलट कर गए हों, लेकिन भारत में रिजीम चेंज का सपना देखने वाले और इशारों में न्यायपालिका को धमकाने वाले भलीभांति समझ लें कि भारतीय जनता लोकतंत्र, संविधान और न्यायपालिका में गहरी आस्था रखती है।वह कभी भी अराजक और हिंसक तत्वों के बहकावे में नहीं आ सकती है।
Opinion: ‘रिजीम चेंज’ के मुग़ालते में न रहें
समझ में नहीं आता है कि कुछ लोग भारत की जनता को क्या समझ बैठे हैं? क्यों भारतीय जनता में अराजकता और हिंसा की उम्मीदें देख रहे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्हें भारत में अराजक और हिंसक वातावरण बनाने के लिए कोई मोटी फंडिंग हो रही हो या इसमें उनका कोई बड़ा स्वार्थ हो? उन्हें स्मरण रहना चाहिए कि आजादी के बाद देश में तमाम जन आंदोलन हुए हैं, लेकिन जनता ने कभी भी हिंसक प्रदर्शनों के जरिये ‘रिजीम चेंज’ जैसी कोई बात नहीं की।लोग वोट के अधिकार का उपयोग कर सरकारें बनाते रहे हैं। अब यदि कोई बांग्लादेश और श्रीलंका की तर्ज पर ‘रिजीम चेंज’ का सपना देखता है, भारत में भी अल्बानिया जैसी स्थिति पैदा होने का भय दिखाता है, तो निश्चित ही वह मुग़ालते में है।ऐसे लोगों को समझ ही नहीं है कि भारतीय जनता किन जीवन मूल्यों में विश्वास करती है। यहां उस अराजकता और हिंसा को कदापि स्वीकार नहीं किया जा सकता जिसका दंश बांग्लादेश और श्रीलंका की जनता झेल चुकी है, जिसके कारण आज फ्रांस और अल्बानिया जैसे देश बुरी तरह जल रहे हैं।








