नागोया: 36 साल की उम्र में जब सुचिका तारियाल को लगने लगा था कि अब उनके खेल करियर का सफर खत्म होने वाला है, तभी उन्होंने ऐसा कारनामा कर दिखाया जिसने इतिहास रच दिया। जापान में आयोजित एशियन गेम्स में रोहतक की इस खिलाड़ी ने मिश्रित मार्शल आर्ट्स की 60 किलोग्राम श्रेणी में कांस्य पदक जीतकर भारत को इस खेल में एशियन गेम्स का पहला पदक दिलाया। सालों की मेहनत, चोट और संघर्ष के बाद मिला यह पदक सुचिका के लिए सिर्फ जीत नहीं, बल्कि उनके पूरे खेल सफर का सबसे खास मुकाम बन गया। पदक जीतने के बाद सुचिका इतनी भावुक हो गईं कि उन्होंने कहा, “यह मेरी जिंदगी से भी बढ़कर है… मैं जापान आई और अपने देश के लिए पदक जीता। अब मैं खुशी से मर सकती हूं।” सुचिका का यह बयान उनके वर्षों के संघर्ष और इस पदक की अहमियत को बयां करता है।
Asian Games 2026: 36 की उम्र में क्यों लगा था कि अब सब खत्म हो गया?
सुचिका के लिए एशियन गेम्स सिर्फ एक और प्रतियोगिता नहीं थी। वह इसे अपने खेल करियर का आखिरी पड़ाव मानकर जापान पहुंची थीं। उन्हें लग रहा था कि 36 साल की उम्र में अब मिश्रित मार्शल आर्ट्स को जारी रखना मुश्किल होगा और खेल को अलविदा कहने का समय आ गया है। लेकिन एशियन गेम्स में उनका प्रदर्शन ऐसा रहा कि खुद सुचिका का फैसला बदल गया। उन्होंने कहा कि पहले वह खेल छोड़ने के बारे में सोच रही थीं, लेकिन अब उन्हें लगता है कि वह अभी और आगे जा सकती हैं। यानी जिस प्रतियोगिता को वह अपने करियर का अंत मान रही थीं, वही उनके लिए नई शुरुआत बन गई।
भारत के लिए रचा ऐतिहासिक इतिहास
एशियन गेम्स 2026 में मिश्रित मार्शल आर्ट्स को पहली बार शामिल किया गया है। ऐसे में सुचिका के पास इतिहास रचने का मौका था और उन्होंने इसे हाथ से जाने नहीं दिया। महिलाओं की 60 किलोग्राम श्रेणी के क्वार्टर फाइनल में सुचिका ने मंगोलिया की अल्तानचिमेग बैगलमा को 2-0 से हराकर सेमीफाइनल में जगह बनाई थी। इस जीत के साथ ही भारत का पदक पक्का हो गया था। सेमीफाइनल में उनका सामना सिंगापुर की हुई हून तेओ से हुआ। मुकाबला बेहद कड़ा रहा और दोनों खिलाड़ियों के बीच स्कोर बराबर रहा। इसके बाद कम वजन के नियम के आधार पर सिंगापुर की खिलाड़ी को विजेता घोषित किया गया और सुचिका को कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा। लेकिन कांस्य पदक भी अपने आप में ऐतिहासिक था, क्योंकि यह एशियन गेम्स में भारत का मिश्रित मार्शल आर्ट्स का पहला पदक है।
Asian Games 2026: सेमीफाइनल में क्या हुआ था?
सेमीफाइनल खत्म होने के बाद सुचिका काफी निराश नजर आईं। मुकाबला बराबरी पर खत्म हुआ था और फैसला कम वजन वाली खिलाड़ी के पक्ष में गया। सुचिका ने बाद में इस फैसले पर अपनी नाराजगी भी जाहिर की। उनका कहना था कि मुकाबले में उन्होंने बेहतर प्रदर्शन किया और कई बार प्रतिद्वंद्वी को जमीन पर गिराया। उन्होंने दावा किया कि दोनों दौर में उनका प्रदर्शन बेहतर था और फैसला सिर्फ वजन के आधार पर नहीं होना चाहिए था। फैसला सुनाए जाने के बाद सुचिका मैट पर ही रो पड़ीं। फाइनल में पहुंचने का मौका भले ही हाथ से निकल गया, लेकिन वह भारत के लिए इतिहास लिख चुकी थीं।

पहले भी कई बार पदक से चूकीं, लेकिन हार नहीं मानी
सुचिका की यह सफलता अचानक नहीं आई है। इसके पीछे वर्षों की मेहनत और कई बार मिली निराशा है। उन्होंने 2022 राष्ट्रमंडल खेलों में जूडो में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। वह कांस्य पदक के मुकाबले तक पहुंची थीं, लेकिन पदक हासिल नहीं कर सकीं। इसके बाद उन्होंने एशियन गेम्स में कुराश में भी हिस्सा लिया, लेकिन वहां भी उन्हें पदक नहीं मिला। इसके बावजूद उन्होंने खेल नहीं छोड़ा। जूडो के बाद उन्होंने कुराश और फिर जिउ-जित्सु में अपनी पहचान बनाई। साल 2024 में वह जिउ-जित्सु की विश्व चैंपियन भी बनीं। इसके बाद मिश्रित मार्शल आर्ट्स में उतरकर उन्होंने खुद को एक बार फिर साबित किया।
Asian Games 2026: आर्थिक मुश्किलें भी नहीं रोक पाईं
सुचिका की राह सिर्फ खेल की चुनौतियों से भरी नहीं रही। उन्हें आर्थिक परेशानियों का भी सामना करना पड़ा। प्रशिक्षण जारी रखने के लिए उन्होंने अपने विभाग से बिना वेतन छुट्टी तक ली। उनके पति ने भी आर्थिक रूप से उनका साथ दिया। सुचिका ने पदक जीतने के बाद अपने माता-पिता और पति को इसका श्रेय दिया और कहा कि उनके समर्थन के बिना यह सफर आसान नहीं था। यही वजह है कि जापान में मिला यह पदक उनके लिए सिर्फ एक खेल उपलब्धि नहीं, बल्कि वर्षों के संघर्ष का परिणाम है।
12 साल की उम्र में लिया था आत्मरक्षा सीखने का फैसला
सुचिका की खेल यात्रा के पीछे एक पुरानी घटना भी जुड़ी है। रिपोर्टों के मुताबिक, 12 साल की उम्र में उनके साथ छेड़छाड़ की घटना हुई थी। इसके बाद उन्होंने आत्मरक्षा सीखने का फैसला किया और जूडो की ओर कदम बढ़ाया। यही शुरुआत धीरे-धीरे उन्हें अलग-अलग मार्शल आर्ट्स तक ले गई। जूडो से शुरू हुआ सफर कुराश, जिउ-जित्सु और फिर मिश्रित मार्शल आर्ट्स तक पहुंचा। 24 साल बाद उसी सफर ने उन्हें एशियन गेम्स में भारत के लिए इतिहास रचने वाली खिलाड़ी बना दिया।










