BRICS Summit 2026: नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की द्विपक्षीय मुलाकात से पहले बीजिंग की ओर से रिश्तों को लेकर बड़ा बयान आया है। भारत में चीन के राजदूत शू फेइहोंग ने कहा है कि दोनों देश बातचीत और सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ अपने मतभेदों को “सही ढंग से सुलझाने” के लिए मिलकर काम करेंगे। गलवान हिंसा के छह साल बाद आए इस संदेश को भारत-चीन संबंधों में सुधार की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
भारत और चीन के रिश्ते लंबे समय तक सीमा विवाद और गलवान के बाद पैदा हुए अविश्वास के साए में रहे हैं। लेकिन पिछले दो वर्षों में दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच लगातार संपर्क बढ़ा है। अब नई दिल्ली में BRICS सम्मेलन के दौरान मोदी और शी जिनपिंग की प्रस्तावित बैठक से ठीक पहले चीन ने सार्वजनिक तौर पर बातचीत और मतभेदों को सुलझाने की बात कही है। चीनी राजदूत का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें सिर्फ सहयोग बढ़ाने की बात नहीं है, बल्कि भारत-चीन के बीच मौजूद मतभेदों को “उचित तरीके से सुलझाने” का संदेश भी दिया गया है।
चीन ने मोदी-शी मुलाकात से पहले क्या कहा?
चीन के राजदूत शू फेइहोंग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि चीन और भारत दोनों राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की द्विपक्षीय बैठक की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कजान और तियानजिन में दोनों नेताओं की मुलाकातों के बाद लगातार तीसरे साल मोदी और शी एक-दूसरे से मिलेंगे।राजदूत ने यह भी कहा कि चीन भारत के साथ मिलकर दोनों नेताओं के रणनीतिक निर्देशों को लागू करने, द्विपक्षीय संबंधों को दीर्घकालिक नजरिए से देखने, बातचीत और सहयोग बढ़ाने तथा मतभेदों को सही ढंग से सुलझाने के लिए काम करना चाहता है।
BRICS Summit 2026: ‘मतभेद सुलझाएंगे’… क्या गलवान के बाद बदली चीन की भाषा?
यही इस बयान का सबसे अहम हिस्सा है। 2020 की गलवान हिंसा के बाद भारत-चीन संबंधों में बड़ा तनाव पैदा हुआ था। सीमा पर सैनिकों की तैनाती बढ़ी और दोनों देशों के बीच भरोसे का संकट गहरा गया। भारत ने लगातार कहा कि सीमा पर शांति और स्थिरता व्यापक संबंधों के लिए जरूरी है। अब चीन की ओर से सार्वजनिक रूप से बातचीत, सहयोग और मतभेदों को सुलझाने की बात किया जाना इस लिहाज से महत्वपूर्ण है। हालांकि, सिर्फ बयान के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि सीमा विवाद पूरी तरह खत्म होने की दिशा में पहुंच गया है।

मोदी-शी की लगातार तीसरे साल मुलाकात क्यों अहम?
अक्टूबर 2024 में कजान में मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात हुई थी। इसके बाद 2025 में तियानजिन में SCO बैठक के दौरान दोनों नेता मिले। अब 2026 में नई दिल्ली में संभावित बैठक होनी है। लगातार तीन वर्षों तक दोनों नेताओं का आमने-सामने मिलना इस बात का संकेत जरूर है कि दोनों देश संवाद की प्रक्रिया को बनाए रखना चाहते हैं।लेकिन भारत के लिए असली सवाल यह रहेगा कि इन बैठकों का असर LAC और द्विपक्षीय संबंधों की जमीन पर कितना दिखाई देता है।
BRICS Summit 2026: BRICS के बहाने भारत और चीन क्यों करीब आ रहे हैं?
BRICS भारत और चीन दोनों के लिए महत्वपूर्ण मंच है। वैश्विक दक्षिण की भूमिका, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और वैश्विक आर्थिक संस्थाओं में विकासशील देशों की आवाज जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के हित कई जगह मिलते हैं। ऐसे समय में जब वैश्विक स्तर पर अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज है और भारत भी अमेरिका के साथ अपने संबंध मजबूत कर रहा है, चीन के लिए भारत के साथ संवाद बनाए रखना महत्वपूर्ण है। भारत भी चीन के साथ टकराव बढ़ाने के बजाय अपने हितों के अनुसार संवाद और रणनीतिक स्वायत्तता की नीति पर आगे बढ़ सकता है।
क्या चीन को भारत की जरूरत है?
भारत चीन के लिए सिर्फ पड़ोसी देश नहीं, बल्कि एक बड़ा बाजार और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था भी है। इसके अलावा वैश्विक कंपनियां सप्लाई चेन में विविधता ला रही हैं और भारत मैन्युफैक्चरिंग व टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में तेजी से महत्वपूर्ण हो रहा है। चीन के लिए ऐसे समय में भारत के साथ लंबे समय तक तनाव बनाए रखना आर्थिक और रणनीतिक रूप से महंगा हो सकता है। यही वजह है कि बीजिंग की ओर से रिश्तों को स्थिर करने और बातचीत आगे बढ़ाने के संकेतों को सिर्फ कूटनीतिक शिष्टाचार के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
BRICS Summit 2026: लेकिन भारत को क्या सावधानी रखनी होगी?
भारत के लिए सबसे अहम बात यह है कि संवाद बढ़े, लेकिन सतर्कता कम न हो। गलवान के बाद भारत के लिए सीमा सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है। इसलिए मोदी-शी बातचीत में LAC की स्थिति, सैनिकों की तैनाती, गश्त और सीमा पर स्थिरता जैसे मुद्दे अहम रहेंगे। इसके साथ ही भारत को रणनीतिक क्षेत्रों में चीन पर अत्यधिक आर्थिक और तकनीकी निर्भरता से बचना होगा। बातचीत भरोसा बनाने का रास्ता हो सकती है, लेकिन भरोसा जमीन पर चीन के कदमों से ही बनेगा।
चीन का समर्थन भारत के लिए कितना अहम?
चीनी राजदूत ने BRICS शिखर सम्मेलन के आयोजन को लेकर भी भारत के समर्थन की बात कही है। यह बयान ऐसे समय आया है जब नई दिल्ली में दुनिया की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं के नेता जुट रहे हैं। चीन का भारत की BRICS अध्यक्षता और सम्मेलन की सफलता के लिए समर्थन करना दोनों देशों के बीच बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग की गुंजाइश को दिखाता है।
BRICS Summit 2026: क्या अब भारत-चीन रिश्तों में ‘नई शुरुआत’ होगी?
संकेत सकारात्मक जरूर हैं, लेकिन इसे अभी पूरी तरह सामान्य रिश्तों की वापसी कहना जल्दबाजी होगी। मोदी-शी बैठक की असली अहमियत इस बात में होगी कि दोनों नेता सिर्फ संबंध सुधारने की इच्छा जताते हैं या फिर सीमा और व्यापार जैसे मुश्किल मुद्दों पर आगे बढ़ने का कोई ठोस रास्ता भी तलाशते हैं। गलवान ने दोनों देशों के बीच भरोसे को गहरा झटका दिया था। उसे वापस बनाने में समय लगेगा।
सबसे बड़ा सवाल: चीन की बात पर कितना भरोसा?
चीन ने अब कहा है-“मतभेदों को सही ढंग से सुलझाएंगे।” भारत के लिए अगला सवाल यही है कि “सही ढंग” का मतलब क्या है और इसका असर जमीन पर कब दिखाई देगा। अगर बातचीत के साथ LAC पर स्थायी शांति, भरोसा और पारदर्शिता बढ़ती है, तो यह भारत-चीन संबंधों में वास्तविक बदलाव का संकेत होगा। फिलहाल भारत के लिए सबसे व्यावहारिक रास्ता यही है, बातचीत के दरवाजे खुले रखें, आर्थिक अवसरों का इस्तेमाल करें, लेकिन गलवान के सबक को न भूलें। क्योंकि इस बार मोदी-शी की मुलाकात की असली परीक्षा तस्वीरों और बयानों से नहीं, बल्कि LAC पर बदलती स्थिति से होगी।
ये भी पढ़े… गलवान के घाव के बीच फिर करीब आते भारत-चीन, क्या बदली है चीन की जरूरत?








