China India Relations: चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग करीब सात साल बाद भारत आ रहे हैं। 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में उनकी मौजूदगी भारत-चीन संबंधों के लिहाज से अहम मानी जा रही है। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के रिश्तों में आई कड़वाहट के बीच यह यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब दोनों देश धीरे-धीरे बातचीत और संपर्क बहाल करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
China India Relations: इस तरह से हुई दोस्ती-
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत ने चीन के साथ रिश्तों को केवल सीमा विवाद तक सीमित रखने के बजाय आर्थिक और कूटनीतिक संपर्क बढ़ाने की कोशिश की। 2014 में शी जिनपिंग भारत आए। इसके बाद 2018 में वुहान में मोदी-शी की अनौपचारिक बैठक हुई और 2019 में महाबलीपुरम में दोनों नेताओं की दूसरी अनौपचारिक शिखर वार्ता हुई। इन मुलाकातों का उद्देश्य साफ था सीमा विवाद अपनी जगह रहे, लेकिन बातचीत के जरिए तनाव को नियंत्रण में रखा जाए और दोनों देशों के बीच आर्थिक तथा कूटनीतिक रिश्तों को आगे बढ़ाया जाए। लेकिन 2020 में पूर्वी लद्दाख में गलवान की हिंसक झड़प ने इस पूरी प्रक्रिया को बड़ा झटका दिया। 20 भारतीय सैनिकों की मौत के बाद भारत में चीन को लेकर भरोसा गहराई से प्रभावित हुआ। इसके बाद सीमा पर सैन्य तैनाती बढ़ी और दोनों देशों के रिश्तों में लंबे समय तक तनाव बना रहा।
China India Relations: गलवान के बाद भारत ने रिश्तों का पैमाना बदल दिया-
गलवान के बाद भारत ने यह स्पष्ट किया कि सीमा पर शांति के बिना सामान्य संबंधों की बात आसान नहीं होगी। निवेश, तकनीक, ऐप और चीनी कंपनियों से जुड़े कई क्षेत्रों में भारत ने सुरक्षा को प्राथमिकता दी। हालांकि अब दोनों देशों के बीच धीरे-धीरे कुछ रास्ते खुले हैं। 2024 में मोदी और शी की कज़ान में मुलाकात के बाद पूर्वी लद्दाख में सैनिकों के डिसएंगेजमेंट की प्रक्रिया आगे बढ़ी। इसके बाद सीधी उड़ानों, वीजा, कैलाश मानसरोवर यात्रा और कुछ चीनी निवेशों से जुड़े प्रतिबंधों में भी ढील के कदम उठे हैं। लेकिन तनाव कम होना और भरोसा लौटना दो अलग बातें हैं।
अब चीन को भारत की जरूरत क्यों महसूस हो रही है-
आज का चीन उस दौर से अलग परिस्थिति में है, जब वह भारत को मुख्यतः एक क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखता था। अमेरिका के साथ व्यापार और रणनीतिक तनाव, बदलती वैश्विक सप्लाई चेन और पश्चिमी बाजारों में बढ़ती चुनौतियों के बीच भारत जैसा बड़ा बाजार चीन के लिए महत्वपूर्ण है।
दोनों देश अपने अपने हित-
भारत भी इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर, मशीनरी और दूसरे औद्योगिक क्षेत्रों में चीन से जुड़ी सप्लाई चेन से पूरी तरह अलग नहीं हुआ है। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को पूरी तरह रोकने के बजाय अब नियंत्रित तरीके से आगे बढ़ाने की कोशिश दिखाई दे रही है। इसके अलावा BRICS भी चीन के लिए महत्वपूर्ण मंच है। संगठन के विस्तार के बाद इसका आर्थिक और राजनीतिक वजन बढ़ा है, लेकिन भारत इस समूह को चीन के नेतृत्व वाले मंच में बदलने के पक्ष में नहीं है। ऐसे में बीजिंग के लिए नई दिल्ली के साथ कामकाजी संबंध बनाए रखना रणनीतिक रूप से जरूरी है।
भारत के लिए मौका भी, सावधानी भी-
भारत को इस बदलते समीकरण का फायदा उठाना चाहिए, लेकिन गलवान के अनुभव को भूलकर नहीं। सीमा पर सैन्य तैयारी और निगरानी में किसी तरह की ढील नहीं होनी चाहिए। भारत को चीन के साथ बातचीत जारी रखते हुए वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पारदर्शिता, सैनिकों की तैनाती और सीमा प्रबंधन को प्राथमिकता देनी होगी। आर्थिक मोर्चे पर भी चीन से व्यापार बढ़ाना और चीन पर निर्भरता बढ़ाना दो अलग बातें हैं। जिन क्षेत्रों में राष्ट्रीय सुरक्षा जुड़ी है, वहां निवेश और तकनीक की जांच मजबूत रहनी चाहिए। हाल के दौर में चीनी कंपनियों के निवेश और महत्वपूर्ण उपकरणों को लेकर दोनों तरफ अभी भी संदेह और अड़चनें बनी हुई हैं।
BRICS की मेज पर असली परीक्षा-
शी जिनपिंग की भारत यात्रा को केवल दोस्ती की वापसी के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। यह दोनों देशों के लिए यह परखने का अवसर है कि क्या प्रतिस्पर्धा के बावजूद सीमित सहयोग संभव है। भारत को चीन से बातचीत करनी है, व्यापार के अवसरों का इस्तेमाल करना है और BRICS जैसे मंचों पर सहयोग भी बढ़ाना है। लेकिन साथ ही सीमा, पाकिस्तान के साथ चीन के रिश्ते, तकनीकी निर्भरता और आर्थिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर अपनी स्थिति स्पष्ट रखनी होगी। गलवान के बाद भारत-चीन रिश्ते अब ‘विश्वास’ से ज्यादा ‘हित और सतर्कता’ के संतुलन पर टिके हैं। BRICS में शी की वापसी इस संतुलन की अगली बड़ी परीक्षा होगी।
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