Home » देश-विदेश » G7 या BRICS, किसके हाथ में दुनिया की कमान? आर्थिक और सैन्य ताकत का पूरा विश्लेषण

G7 या BRICS, किसके हाथ में दुनिया की कमान? आर्थिक और सैन्य ताकत का पूरा विश्लेषण

BRICS या G7, किसका दबदबा ज्यादा मजबूत?

BRICS vs G7: दुनिया अब तेजी से बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। कई दशकों से अमेरिका का जो वैश्विक प्रभाव रहा है, उसे अब दूसरे देश चुनौती दे रहे हैं। अलग-अलग देश अपने हितों के अनुसार नए समूहों और गठबंधनों का हिस्सा बन रहे हैं। इन्हीं में से एक प्रमुख समूह BRICS है। 2009 के बाद जिस तेजी से इसका विस्तार हुआ और नए देश इससे जुड़े, उससे इसकी बढ़ती ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता है। दुनिया की 7 विकसित अर्थव्यवस्थाओं वाले G7 के सामने BRICS को एक बड़ी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिका और पश्चिमी देशों का समूह G7 इसे अपने प्रतिद्वंद्वी के तौर पर देखता है। हालांकि BRICS ने कभी आधिकारिक तौर पर यह नहीं कहा कि वह G7 या किसी अन्य संगठन के खिलाफ है। इसके बावजूद जानकारों का मानना है कि रूस, चीन, भारत और ब्राजील जैसे प्रमुख देशों की अगुवाई वाला यह समूह पश्चिमी देशों के लंबे समय से चले आ रहे दबदबे को चुनौती दे रहा है। अगर BRICS के सभी संसाधनों और क्षमताओं को एक साथ देखा जाए तो अर्थव्यवस्था से लेकर सैन्य शक्ति तक यह पश्चिमी देशों के सामने बड़ी ताकत के रूप में खड़ा हो सकता है। इसकी वजह इसकी बड़ी आबादी, मजबूत अर्थव्यवस्थाएं, सैन्य क्षमता, तकनीकी क्षमता और कूटनीतिक प्रभाव हैं।

BRICS vs G7: ‘ग्लोबल साउथ’ को मिल रही नई आवाज

‘ग्लोबल साउथ’ का दायरा काफी बड़ा है और BRICS इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक साझा आवाज देने की कोशिश कर रहा है। ग्लोबल साउथ में अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, एशिया और ओसेनिया के कई देश शामिल हैं। इनकी संख्या करीब 130 से 135 देशों तक मानी जाती है। अगर इन देशों को भी BRICS के प्रभाव के दायरे में देखा जाए तो इसका वैश्विक महत्व और ज्यादा बढ़ जाता है। हालांकि यहां हमारा ध्यान BRICS पर ही है। इस समूह की शुरुआत मुख्य रूप से वैश्विक अर्थव्यवस्था में पश्चिमी देशों के एकतरफा प्रभाव को चुनौती देने के उद्देश्य से हुई थी। BRICS की खासियत यह है कि इसके सदस्य अलग-अलग महाद्वीपों में मौजूद हैं। चीन को छोड़ दें तो भारत, ब्राजील और इंडोनेशिया जैसी अर्थव्यवस्थाएं तेजी से आगे बढ़ रही हैं। इन देशों का मानना है कि वैश्विक संस्थाओं, वित्तीय संगठनों, अंतरराष्ट्रीय फैसलों और तकनीकी विकास में उन्हें उनकी वास्तविक ताकत के हिसाब से पर्याप्त हिस्सेदारी नहीं मिली है। इसी असंतोष ने इन देशों को एक ऐसी व्यवस्था तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ाया, जिसमें उनका प्रभाव अधिक हो। BRICS के 18वें सम्मेलन के लिए इसके सदस्य देशों के नेता दिल्ली में एकत्र हुए हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या भारत की मेजबानी वाला BRICS अब दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बन चुका है या G7 का प्रभाव आज भी उतना ही मजबूत है, जितना पिछले कई दशकों से रहा है?

BRICS vs G7: BRICS बनाम G7: बदल रही दुनिया की ताकत
BRICS बनाम G7: बदल रही दुनिया की ताकत
PPP के हिसाब से BRICS आगे

अगर अर्थव्यवस्था को PPP यानी परचेजिंग पावर पैरिटी के आधार पर देखा जाए और IMF के आंकड़ों को आधार माना जाए, तो BRICS G7 से आगे निकल चुका है। हाल ही में भारत दौरे के दौरान रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने IMF के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा था कि PPP के आधार पर BRICS की संयुक्त GDP करीब 77 ट्रिलियन डॉलर है, जबकि G7 की अर्थव्यवस्था लगभग 57 ट्रिलियन डॉलर की है। लेकिन जब अर्थव्यवस्था को सीधे डॉलर में मापा जाता है, तो तस्वीर बदल जाती है। नॉमिनल GDP के मामले में G7 अभी भी काफी आगे है। इसका सबसे बड़ा कारण अमेरिका की विशाल अर्थव्यवस्था के साथ जर्मनी, जापान और ब्रिटेन जैसी उच्च आय वाली अर्थव्यवस्थाएं हैं। आसान शब्दों में समझें तो PPP यह बताता है कि अलग-अलग देशों में लोगों की वास्तविक खरीदने की क्षमता कितनी है, जबकि नॉमिनल GDP किसी देश की वित्तीय ताकत और वैश्विक निवेश में उसकी स्थिति को समझने में मदद करता है। इसलिए दोनों आंकड़े सही हैं, लेकिन दोनों अलग-अलग चीजों को मापते हैं।

BRICS vs G7: आबादी के मामले में BRICS काफी आगे

जनसंख्या के लिहाज से BRICS की स्थिति काफी मजबूत है। भारत और चीन अकेले ही दुनिया की करीब एक-तिहाई आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। BRICS के विस्तार के बाद यह समूह अपने शुरुआती 5 देशों यानी ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका की तुलना में काफी बड़ा हो गया है। अब इसका प्रभाव दुनिया की आबादी, आर्थिक उत्पादन और कमोडिटी संसाधनों के मामले में भी काफी व्यापक है। ऊर्जा और कच्चे माल के क्षेत्र में भी BRICS की स्थिति मजबूत हुई है। रूस, ब्राजील और सऊदी अरब जैसे देशों की मौजूदगी से समूह के पास तेल, गैस और खनिज संसाधनों का बड़ा हिस्सा है। हालांकि केवल बड़े आंकड़े यह साबित नहीं करते कि सभी सदस्य देश समान गति से विकास कर रहे हैं। भारत की विकास दर करीब 6% के आसपास है, जबकि युद्ध के कारण रूस आर्थिक ठहराव का सामना कर रहा है। ऐसे में BRICS के सामूहिक आंकड़े उसके सदस्य देशों के बीच मौजूद आर्थिक असमानता को काफी हद तक छिपा देते हैं।

BRICS vs G7: BRICS और G7 में कौन ज्यादा ताकतवर है?
BRICS और G7 में कौन ज्यादा ताकतवर है?
सैनिकों और टैंकों में BRICS आगे

सैन्य ताकत की तुलना करने पर भी कई दिलचस्प आंकड़े सामने आते हैं। कुछ ओपन-सोर्स डेटाबेस के अनुसार, BRICS देशों के पास करीब 70 लाख सक्रिय सैनिक हैं, जबकि G7 देशों के पास लगभग 24 लाख सक्रिय सैनिक हैं। टैंकों की संख्या में भी BRICS काफी आगे है। BRICS देशों के पास 23 हजार से अधिक टैंक हैं, जबकि G7 देशों के पास करीब 6 हजार टैंक हैं। नौसैनिक ताकत की बात करें तो समुद्र में मौजूद जहाजों की संख्या भी BRICS की ज्यादा है। लेकिन सैन्य बजट के मामले में स्थिति पूरी तरह बदल जाती है। G7 देशों का संयुक्त रक्षा खर्च करीब 1.3 ट्रिलियन डॉलर है, जबकि BRICS का सैन्य खर्च लगभग 585 बिलियन डॉलर है। इसका मतलब है कि सैनिकों और सैन्य उपकरणों की संख्या में BRICS आगे हो सकता है, लेकिन तकनीक, प्रशिक्षण और रक्षा बजट में G7 अभी भी मजबूत स्थिति में है। साथ ही यह तुलना एक ऐसी स्थिति को मानकर चलती है जिसमें दोनों समूह एक संयुक्त सेना की तरह काम करेंगे, जबकि वास्तविकता में ऐसा होना मुश्किल है। BRICS के सदस्य देशों के बीच राजनीतिक और रणनीतिक मतभेद मौजूद हैं। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

BRICS vs G7: वैश्विक व्यापार में G7 की पकड़ मजबूत

वैश्विक व्यापार ऐसा क्षेत्र है जहां G7 का प्रभाव अभी भी काफी मजबूत है। नॉमिनल डॉलर के आधार पर वैश्विक निर्यात में G7 की हिस्सेदारी अभी भी BRICS से ज्यादा है। इसके अलावा IMF, विश्व बैंक और SWIFT जैसे महत्वपूर्ण वैश्विक वित्तीय ढांचे पर पश्चिमी देशों का प्रभाव अब भी बना हुआ है। इसलिए डॉलर पर आधारित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में G7 का प्रभाव जल्द खत्म होने की संभावना नहीं है। BRICS की ओर से न्यू डेवलपमेंट बैंक और डी-डॉलराइजेशन को बढ़ावा देने की कोशिश जरूर की जा रही है, लेकिन यह अभी शुरुआती चरण में है और इसे पूरी तरह लागू होने में लंबा समय लग सकता है। अब भारत की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। इस साल भारत BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और इसके लिए ‘बिल्डिंग फॉर रेजिलिएंस, इनोवेशन, को-ऑपरेशन एंड सस्टेनबिलिटी’ थीम रखी गई है। भारत की प्राथमिकताओं में आर्थिक सहयोग, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, जलवायु कार्रवाई और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दे शामिल हैं।

BRICS vs G7: ग्लोबल साउथ से बदल रही दुनिया की दिशा
ग्लोबल साउथ से बदल रही दुनिया की दिशा
भारत के सामने संतुलन की चुनौती

भारत के लिए यह स्थिति एक नाजुक संतुलन जैसी है। एक ओर भारत BRICS के माध्यम से ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करना चाहता है और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का समर्थन करता है। दूसरी ओर अमेरिका, जापान और यूरोप जैसे G7 देशों के साथ भी भारत अपने व्यापारिक और रणनीतिक संबंधों को मजबूत बनाए रखना चाहता है। खासकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए इन रिश्तों की अहमियत बढ़ जाती है। इसका मतलब है कि भारत की रणनीति किसी एक गुट को चुनने की बजाय दोनों के साथ अपने संबंधों और उपयोगिता को बनाए रखने की है। यह भारत की पारंपरिक ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ विदेश नीति का ही एक विस्तार माना जा सकता है।

BRICS vs G7: G7 का प्रभाव अभी कायम

तो आखिर दुनिया में वास्तविक ताकत किसके पास है? इसका सीधा जवाब देना आसान नहीं है, क्योंकि यह इस बात पर निर्भर करता है कि ताकत को किस आधार पर मापा जा रहा है। जनसंख्या, संख्या और PPP के आधार पर BRICS मजबूत स्थिति में है। वहीं वित्तीय संस्थाओं, तकनीक, सैन्य बजट और वैश्विक व्यापार के क्षेत्र में G7 अभी भी काफी आगे है। इसके अलावा BRICS के भीतर मौजूद आर्थिक असमानता, राजनीतिक मतभेद और आपसी तनाव को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए अभी इसे पूरी तरह एकजुट और एक समान रणनीति वाला ब्लॉक कहना जल्दबाजी होगी। दुनिया निश्चित रूप से एकध्रुवीय व्यवस्था से बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि G7 का प्रभाव खत्म हो गया है। BRICS तेजी से मजबूत हो रहा है, लेकिन G7 का सूरज अभी डूबा नहीं है।