Home » राजनीति » यूपी में बसपा की कमजोर होती पकड़ से किसे फायदा? दलित वोट पर राहुल-अखिलेश की नजर

यूपी में बसपा की कमजोर होती पकड़ से किसे फायदा? दलित वोट पर राहुल-अखिलेश की नजर

BSP Dalit Vote:

BSP Dalit Vote: उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा भले ही लगातार कमजोर हुई है, लेकिन उसका वोट बैंक अब भी चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की ताकत रखता है। ऐसे में कांग्रेस और सपा दलित वोटरों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश में जुटी हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में कभी मजबूत स्थिति रखने वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) आज विधानसभा में भी अपनी मौजूदगी खो चुकी है। 2007 में 206 सीटों के साथ सरकार बनाने वाली बसपा 2022 के विधानसभा चुनाव में महज एक सीट तक सिमट गई थी। अब उसके एकमात्र विधायक उमाशंकर सिंह के निधन के बाद विधानसभा में बसपा का कोई विधायक नहीं है। इसके बावजूद चुनावी राजनीति में बसपा के वोट बैंक की अहमियत कम नहीं हुई है। यही वजह है कि यूपी में अगले चुनाव को लेकर भाजपा, सपा और कांग्रेस सभी दलित वोटों को अपने पक्ष में करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

BSP Dalit Vote: 10 फीसदी वोट अब भी बना सकते हैं बड़ा अंतर-

2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा को करीब 12 फीसदी वोट मिले थे। वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का वोट शेयर करीब 9.3 फीसदी रहा। हालांकि पार्टी एक भी लोकसभा सीट जीतने में सफल नहीं हुई, लेकिन पूरे प्रदेश में करीब 10 फीसदी वोट हासिल करना उसकी जमीनी पकड़ को पूरी तरह खत्म नहीं बताता। यही वोट किसी सीट पर जीत और हार के बीच बड़ा अंतर पैदा कर सकता है। इसलिए बसपा के कमजोर होने के बावजूद उसके वोट बैंक पर सभी प्रमुख राजनीतिक दलों की नजर बनी हुई है।

BSP Dalit Vote: दलित मुद्दों पर राहुल गांधी क्यों हो रहे हैं मुखर-

यूपी की राजनीति को समझने वाले जानकारों के मुताबिक, कांग्रेस नेता राहुल गांधी का मनुस्मृति, दलित उत्पीड़न और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के अपमान जैसे मुद्दों को लगातार उठाना इसी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक लंबे समय तक ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम माना जाता था। लेकिन मंडल और कमंडल की राजनीति के बाद यह समीकरण काफी बदल गया। मुस्लिम वोट सपा की ओर गया, दलित वोट का बड़ा हिस्सा बसपा के साथ जुड़ा और भाजपा ने सवर्णों के साथ ओबीसी के एक बड़े वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत की। अब कांग्रेस इसी पुराने सामाजिक आधार के एक हिस्से को दोबारा अपने साथ जोड़ने की कोशिश करती दिखाई दे रही है।

सपा भी दलित वोटरों को जोड़ने में जुटी-

कांग्रेस के साथ-साथ समाजवादी पार्टी भी दलित समाज को अपने साथ जोड़ने के लिए सक्रिय नजर आ रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन को अलग-अलग सामाजिक वर्गों का समर्थन मिला था। राजनीतिक रणनीतिकारों का मानना है कि अगर गठबंधन दलित समाज के बड़े हिस्से को भी अपने साथ जोड़ने में सफल रहा, तो यूपी के चुनावी समीकरण में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

जाटव वोट बैंक पर सबसे ज्यादा नजर-

उत्तर प्रदेश में बसपा के सबसे मजबूत आधार के रूप में जाटव समाज को देखा जाता है। राज्य की आबादी में जाटव समुदाय की हिस्सेदारी करीब 10 फीसदी मानी जाती है। मायावती की पार्टी के लगातार कमजोर होने के बीच इस वोट बैंक के सामने राजनीतिक विकल्पों का सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है। सपा और कांग्रेस को उम्मीद है कि जाटव समाज के एक हिस्से को अपने साथ जोड़कर वे चुनावी गणित को बदल सकते हैं। वहीं भाजपा लंबे समय से गैर-जाटव दलित समुदायों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करती रही है। ऐसे में दलित वोटों के भीतर ही अलग-अलग सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश तेज हो सकती है।

बसपा कमजोर, लेकिन ‘एक्स फैक्टर’ अब भी कायम-

बसपा की सीटें भले ही लगातार घटती गई हों, लेकिन उसका वोट शेयर अभी भी इतना है कि वह कई सीटों पर नतीजों को प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि मायावती की पार्टी चुनाव जीतने की स्थिति में न होने के बावजूद यूपी की राजनीति में एक अहम ‘एक्स फैक्टर’ बनी हुई है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आने वाले चुनाव में बसपा का पारंपरिक वोट बैंक किस ओर जाएगा और क्या राहुल गांधी-अखिलेश यादव इस वोट के एक बड़े हिस्से को अपने साथ जोड़ पाएंगे

यह भी पढ़े- छात्रों पर दर्ज FIR रद्द, सुप्रीम कोर्ट ने Article 142 का किया इस्तेमाल