CAPF Explainer: देश की सुरक्षा में तैनात केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के जवान किन परिस्थितियों में काम करते हैं? 2019 से 2025 के बीच 1,016 जवानों की आत्महत्या और पिछले पांच साल में साथियों पर गोली चलाने की 24 घटनाओं के आंकड़े कई सवाल खड़े करते हैं। लंबे ड्यूटी घंटे, छुट्टी मिलने में परेशानी, प्रमोशन में देरी और परिवार से दूरी जैसे मुद्दे जवानों के तनाव से जुड़े बताए जाते हैं। आखिर इन समस्याओं की जड़ क्या है और समाधान के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं? पढ़िए यह एक्सप्लेनर।
कठुआ की घटना ने फिर उठाए सवाल
29 सितंबर की शाम जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में CISF के जवानों के बीच हुई फायरिंग की घटना ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में कामकाज की परिस्थितियों और जवानों के मानसिक तनाव पर फिर चर्चा शुरू कर दी। रिपोर्ट के मुताबिक, हेड कॉन्स्टेबल अवधेश कुमार सिंह की अपने साथियों से कहासुनी हुई थी। इसके बाद उन्होंने कथित तौर पर अपनी सर्विस राइफल से फायरिंग कर दी, जिसमें चार जवानों की मौत हो गई।
मृतकों में असिस्टेंट कमांडेंट एवं कंपनी कमांडर अंकित कुमार पांडेय, सब-इंस्पेक्टर लक्ष्मण सिंह और कॉन्स्टेबल मोहम्मद रफीक तथा संजीव कुमार शामिल थे। घटना के बाद आरोपी जवान को गिरफ्तार किया गया और CISF ने मामले की जांच के लिए कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी के आदेश दिए। अपने ही साथियों पर हमला करने की ऐसी घटना को फ्रेट्रिसाइड कहा जाता है। उपलब्ध रिपोर्ट में गृह मंत्रालय के हवाले से बताया गया है कि पिछले पांच वर्षों में ऐसी 24 घटनाएं सामने आईं। वहीं, 2019 से 2025 के बीच CAPF के 1,016 जवानों की आत्महत्या का आंकड़ा भी सामने आया है। इन आंकड़ों से यह सवाल उठता है कि जवानों पर काम का कितना दबाव है और उनकी समस्याओं से निपटने के लिए व्यवस्था में क्या सुधार जरूरी हैं।
CAPF Explainer: जवानों की कमी से बढ़ रहा है ड्यूटी का दबाव?
रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) और असम राइफल्स में कुल 93,139 पद खाली हैं। CISF के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक एचआर सिंह के अनुसार, रिक्त पदों के कारण तैनात जवानों पर अतिरिक्त जिम्मेदारियां आ सकती हैं। ड्यूटी का समय बढ़ने से उनके आराम और नींद पर असर पड़ता है। BSF की ड्यूटी व्यवस्था का उदाहरण देते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि कुछ जवानों को छह-छह घंटे की दो शिफ्टों में काम करना पड़ता है। सुबह की शिफ्ट के लिए जल्दी उठना, तैयार होना, हथियार लेना और निर्धारित समय से पहले बॉर्डर आउट पोस्ट तक पहुंचना जरूरी होता है। ड्यूटी पूरी होने के बाद कैंप लौटना, हथियार जमा करना, भोजन करना और दूसरी शिफ्ट की तैयारी भी दिनचर्या का हिस्सा है। कुछ कैंपों में रखरखाव से जुड़े काम भी जवानों को करने पड़ते हैं। इन जिम्मेदारियों के बीच आराम के लिए सीमित समय बचने की बात कही गई है।
इसका समाधान क्या है?
खाली पदों को समयबद्ध तरीके से भरना। जरूरत के अनुसार संवेदनशील और व्यस्त स्थानों पर पर्याप्त बल तैनात करना। ड्यूटी के साथ आराम और नींद के लिए पर्याप्त समय सुनिश्चित करना। हालांकि, अलग-अलग बलों और तैनाती वाले क्षेत्रों में ड्यूटी की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। इसलिए समस्या का आकलन संबंधित यूनिट की वास्तविक कार्य-व्यवस्था के आधार पर किया जाना चाहिए।
CAPF Explainer: छुट्टी का प्रावधान, लेकिन जरूरत के समय कितनी राहत?
CAPF के जवानों को परिवार में बीमारी, बच्चों की परेशानी या दूसरे जरूरी कामों के बावजूद कई बार छुट्टी के लिए इंतजार करना पड़ सकता है। दूरदराज के इलाकों में तैनाती और सुरक्षा संबंधी जिम्मेदारियों के कारण छुट्टी का प्रबंधन चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

रिपोर्ट में CRPF में तैनात रहे जवान विनीत सिंह का मामला भी शामिल है। रिपोर्ट के मुताबिक, 5 अगस्त 2026 को मणिपुर में उनकी मौत हो गई थी। उनकी पत्नी नेहा सिंह ने छुट्टी नहीं मिलने, बुखार और नींद पूरी न होने जैसी परेशानियों का जिक्र किया। उन्होंने अपने पति की मौत के वास्तविक कारणों की जानकारी मिलने की मांग की। इन परिस्थितियों और मौत के बीच किसी संबंध की पुष्टि जांच के निष्कर्षों के आधार पर ही की जा सकती है।
गृह मंत्रालय ने दिसंबर 2025 में लोकसभा में बताया था कि फील्ड में तैनात CAPF जवानों को साल में 60 दिन की अर्जित छुट्टी और 15 दिन की आकस्मिक छुट्टी का प्रावधान है। लेकिन छुट्टी का नियम होना और जरूरत के समय उसका मिल पाना दो अलग-अलग बातें हैं। रिपोर्ट में एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेज वेलफेयर एसोसिएशन के महासचिव रणवीर सिंह ने भी जवानों की समस्याओं को नजरअंदाज किए जाने और अधिकारियों के व्यवहार से जुड़ी शिकायतों का उल्लेख किया है।
इसका समाधान क्या है?
जरूरी परिस्थितियों में छुट्टी के आवेदनों पर समय से निर्णय लिया जाए। छुट्टी मंजूर नहीं होने पर स्पष्ट कारण बताया जाए। आपात स्थिति में छुट्टी देने के लिए पारदर्शी व्यवस्था बनाई जाए।
CAPF Explainer: प्रमोशन के लिए 18 से 20 साल का इंतजार क्यों?
CAPF में प्रमोशन का मुद्दा भी लंबे समय से चर्चा में है। रिपोर्ट के मुताबिक, कई जवानों को अगली रैंक तक पहुंचने के लिए 18 से 20 साल तक इंतजार करना पड़ सकता है। अधिकारियों के प्रमोशन में भी देरी की समस्या बताई गई है।
CISF के पूर्व ADG एचआर सिंह के मुताबिक, CAPF में प्रमोशन काफी हद तक उपलब्ध पदों पर निर्भर करता है। कैडर रिव्यू के जरिए यह आकलन किया जाता है कि संगठन की जरूरतों के अनुसार पदों की संख्या और संरचना में क्या बदलाव होने चाहिए। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 2021 के बाद से कैडर रिव्यू नहीं हुआ है। लंबे समय तक एक ही पद पर रहने से करियर में आगे बढ़ने की उम्मीद प्रभावित हो सकती है। रिपोर्ट में एक वरिष्ठ CRPF अधिकारी ने कहा कि जब नेतृत्व के स्तर पर ही कर्मचारियों का मनोबल प्रभावित होगा, तो उसका असर पूरी टीम पर पड़ सकता है।
गृह मंत्रालय ने अगस्त 2024 में लोकसभा में प्रमोशन से जुड़े खाली पदों को भरने के लिए विभागीय पदोन्नति समितियों की बैठकें समय पर कराने के निर्देशों की जानकारी दी थी। रिपोर्ट के अनुसार, करीब 13 हजार CAPF कैडर अधिकारी अलग-अलग रैंकों में प्रमोशन का इंतजार कर रहे हैं।
इसका समाधान क्या है?
कैडर रिव्यू और विभागीय पदोन्नति समितियों की बैठकें समय पर हों। प्रमोशन में देरी के कारणों की जानकारी पारदर्शी रखी जाए। खाली पदों और लंबित प्रमोशन की स्थिति की नियमित समीक्षा हो।
CAPF Explainer: ड्यूटी एक जगह, परिवार दूसरी जगह
CAPF के जवानों की तैनाती सीमा, पहाड़ी क्षेत्रों, जंगलों, रेगिस्तान और अन्य दुर्गम इलाकों में होती है। सुरक्षा संबंधी जरूरतों के कारण कई बार जवानों को लंबे समय तक परिवार से दूर रहना पड़ता है। जहां परिवार को साथ रखना संभव हो, वहां आवास की उपलब्धता भी अहम हो जाती है। CRPF के पूर्व असिस्टेंट कमांडेंट सर्वेश त्रिपाठी के मुताबिक, दूरदराज के इलाकों में तैनाती के दौरान परिवार के साथ समय बिताना कठिन होता है। शहरी क्षेत्रों में भी सरकारी आवास सीमित होने के कारण सभी जवानों को परिवार के साथ रहने की सुविधा नहीं मिल पाती।
गृह मंत्रालय ने 11 फरवरी 2026 को राज्यसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक, 1 सितंबर 2022 से 5 फरवरी 2026 के बीच CAPF ई-आवास पोर्टल के जरिए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों और असम राइफल्स के जवानों को कुल 1,46,566 परिवार आवास आवंटित किए गए। इनमें CRPF को 50,812, BSF को 48,854, ITBP को 18,324, SSB को 13,899, असम राइफल्स को 7,611 और CISF को 7,066 आवास आवंटित किए गए।
ये आवंटन परिवारों को आवास उपलब्ध कराने की व्यवस्था का हिस्सा हैं। हालांकि, कुल आवंटन का आंकड़ा अपने आप यह नहीं बताता कि कितने जवानों को अब भी आवास की जरूरत है या कितने परिवारों को उनकी पसंद की तैनाती वाली जगह पर घर मिल पाया है।
इसका समाधान क्या है?
जहां संभव हो, जवानों को परिवार के साथ रहने के लिए आवास उपलब्ध कराया जाए। लंबे समय तक दूरदराज के इलाकों में तैनात जवानों के परिवार से संपर्क और मुलाकात की सुविधा बेहतर हो। कठिन क्षेत्रों में तैनाती की अवधि और जवानों की पारिवारिक परिस्थितियों की समय-समय पर समीक्षा की जाए।
CAPF Explainer: शिकायत किससे करें, जब परेशानी ही अधिकारी से हो?
किसी जवान को यदि अपने वरिष्ठ अधिकारी के व्यवहार या कामकाज के तरीके से परेशानी है, तो उसके लिए शिकायत करना आसान नहीं होता। उसे यह चिंता हो सकती है कि शिकायत का असर उसकी पोस्टिंग, ड्यूटी या करियर पर पड़ेगा। रिपोर्ट में गृह मंत्रालय की टास्क फोर्स के हवाले से अधिकारियों और जवानों के बीच संवाद की कमी, भेदभाव और अनुचित व्यवहार को तनाव से जुड़े संभावित कारकों में शामिल किया गया है। हालांकि, किसी खास आत्महत्या या साथियों पर हमले के पीछे की वजह की पुष्टि अलग-अलग मामलों की जांच के बाद ही की जा सकती है।
इसका समाधान क्या है?
शिकायत दर्ज कराने के लिए स्वतंत्र और भरोसेमंद व्यवस्था हो। शिकायतकर्ता की पहचान और सुरक्षा से जुड़े पहलुओं का ध्यान रखा जाए। शिकायतों पर कार्रवाई की समयसीमा तय हो और उसकी स्थिति की जानकारी दी जाए। जवानों को जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य परामर्श उपलब्ध कराया जाए।
CAPF Explainer: CAPF में वरिष्ठ पदों पर IPS अधिकारियों की नियुक्ति का क्या मामला है?
रिपोर्ट के मुताबिक, सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज (जनरल एडमिनिस्ट्रेशन) एक्ट, 2026 आठ अक्टूबर 2026 से लागू हुआ। इसमें CRPF, BSF, CISF, ITBP और SSB जैसे बलों में वरिष्ठ पदों पर नियुक्तियों के लिए प्रतिनियुक्ति से जुड़े प्रावधान शामिल हैं।
रिपोर्ट में दिए गए नियमों के अनुसार, IG के 50 प्रतिशत पद प्रतिनियुक्ति से भरे जाने हैं। ADG के कम से कम 67 प्रतिशत पद प्रतिनियुक्ति से भरे जाने का प्रावधान है, जबकि स्पेशल DG और DG के पदों पर भी प्रतिनियुक्ति के जरिए नियुक्ति की व्यवस्था बताई गई है। इस व्यवस्था को लेकर CAPF के कुछ प्रतिनिधियों ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि वरिष्ठ पदों पर IPS अधिकारियों की नियुक्ति से बलों के अपने कैडर के अधिकारियों के प्रमोशन के अवसर प्रभावित हो सकते हैं।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार का तर्क है कि IPS अधिकारियों को राज्य पुलिस और प्रशासन के साथ काम करने तथा आंतरिक सुरक्षा से जुड़े मामलों का अनुभव होता है। इससे अलग-अलग राज्यों के साथ समन्वय में मदद मिल सकती है। यह मुद्दा CAPF के कैडर अधिकारियों के करियर और बलों के प्रशासनिक ढांचे से जुड़ा है। इसके प्रभाव का आकलन नियुक्तियों, प्रमोशन और संबंधित नियमों के वास्तविक क्रियान्वयन के आधार पर किया जाना चाहिए।
CAPF Explainer: जवानों की समस्याओं का समाधान क्यों जरूरी?
CAPF के जवान देश की सीमाओं की सुरक्षा, आंतरिक सुरक्षा और संवेदनशील प्रतिष्ठानों की रक्षा जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाते हैं। ऐसे में उनकी ड्यूटी, आराम, छुट्टी, प्रमोशन, आवास और शिकायत निवारण से जुड़ी व्यवस्थाओं की समीक्षा जरूरी है।
2019 से 2025 के बीच 1,016 जवानों की आत्महत्या और पिछले पांच वर्षों में फ्रेट्रिसाइड की 24 घटनाओं के आंकड़े गंभीर चिंता का विषय हैं। लेकिन इन घटनाओं के पीछे कोई एक कारण मान लेना सही नहीं होगा। हर मामले की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। रिक्त पदों को भरना, काम के घंटों और आराम के बीच संतुलन बनाना, समय पर छुट्टी देना, प्रमोशन की प्रक्रिया पारदर्शी करना और शिकायतों पर निष्पक्ष कार्रवाई करना ऐसे कदम हैं, जिनसे जवानों की कार्य-स्थितियों में सुधार की दिशा में मदद मिल सकती है। देश की सुरक्षा में तैनात जवानों की सुरक्षा, गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
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