Elections Ballot Papers: भारत में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) से मतदान होता है, लेकिन पंचायत से लेकर राज्यसभा और विधान परिषद तक कई चुनावों में आज भी बैलेट पेपर का इस्तेमाल किया जाता है। इसकी वजह सिर्फ तकनीकी या प्रशासनिक नहीं है। कुछ चुनावों में मतदान की संवैधानिक व्यवस्था ही ऐसी है, जिसमें मतदाता को उम्मीदवारों की प्राथमिकता तय करनी होती है। आखिर भारत में किन-किन चुनावों में बैलेट पेपर से वोट डाले जाते हैं और इसकी जरूरत क्यों पड़ती है? समझिए पूरा गणित।
EVM और बैलेट पेपर को लेकर बहस तेज हो गई
देश में एक बार फिर EVM और बैलेट पेपर को लेकर बहस तेज हो गई है। हाल ही में चार राज्यों में विधान परिषद (MLC) की 28 सीटों पर हुए चुनावों में कांग्रेस को सिर्फ एक सीट मिली। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर तंज कसा। दरअसल, कांग्रेस समेत विपक्षी दल चुनावों में हार के बाद कई बार EVM पर सवाल उठाते रहे हैं और बैलेट पेपर से मतदान कराने की मांग करते रहे हैं। इस बहस के बीच एक सवाल यह भी है कि जब विधानसभा और लोकसभा चुनाव EVM से होते हैं, तो विधान परिषद और राज्यसभा जैसे चुनावों में बैलेट पेपर का इस्तेमाल क्यों किया जाता है? इसके अलावा पंचायत और नगर निकायों के चुनावों में भी कई जगह बैलेट पेपर से मतदान कराया जाता है।
Elections Ballot Papers: भारत में किन चुनावों में बैलेट पेपर का इस्तेमाल होता है?
भारत में बैलेट पेपर का इस्तेमाल मुख्य रूप से इन चुनावों में होता है- ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद के चुनावों में। कुछ राज्यों के नगर निगम और नगर निकाय चुनावों में। राज्यसभा के सदस्यों के चुनाव में। विधान परिषद यानी MLC के चुनाव में। राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में।
कुछ विश्वविद्यालयों के छात्र संघ चुनावों में। हालांकि, इन सभी चुनावों में बैलेट पेपर का इस्तेमाल एक ही वजह से नहीं होता। पंचायत और नगर निकायों के चुनावों में इसका फैसला संबंधित राज्य निर्वाचन आयोग की व्यवस्था और नियमों के आधार पर होता है। वहीं, राज्यसभा, विधान परिषद, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों में एकल हस्तांतरणीय मत प्रणाली (Single Transferable Vote) के तहत प्राथमिकता के आधार पर मतदान कराया जाता है।
पंचायत चुनावों में बैलेट पेपर का इस्तेमाल क्यों होता है?
ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद के ज्यादातर चुनावों में बैलेट पेपर का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, देश के सभी राज्यों में ऐसा नहीं है। कुछ राज्यों ने पंचायत चुनावों में EVM का इस्तेमाल भी शुरू कर दिया है। पंचायती राज मंत्रालय के सहयोग से भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (IIPA) ने 2023 में एक अध्ययन किया था। इसके मुताबिक, देश के 53 प्रतिशत राज्यों में ग्राम पंचायत चुनावों के लिए बैलेट पेपर का इस्तेमाल किया जाता है। केरल, सिक्किम और दादरा एवं नगर हवेली तथा दमन एवं दीव में ग्राम पंचायत की सभी सीटों पर EVM से मतदान कराया जाता है। कुछ राज्यों में दोनों व्यवस्थाएं लागू हैं। यानी कुछ सीटों पर EVM और बाकी पर बैलेट पेपर से वोट डाले जाते हैं। अध्ययन के मुताबिक, पंचायतों के ऊपरी स्तर यानी जिला पंचायत के चुनावों में भी EVM का इस्तेमाल करने वाले राज्यों की संख्या सीमित है। उदाहरण के लिए, 17 प्रतिशत राज्य जिला पंचायत की सभी सीटों पर EVM से मतदान कराते हैं।
बैलेट पेपर के इस्तेमाल के पीछे राज्यों ने आर्थिक संसाधनों की कमी और EVM के इस्तेमाल को लेकर जागरूकता की कमी जैसी वजहें बताई हैं। हालांकि, अध्ययन में इस तर्क पर सवाल उठाया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, यही मतदाता लोकसभा और विधानसभा चुनावों में EVM से वोट डालते हैं। ऐसे में केवल जागरूकता की कमी को इसकी बड़ी वजह मानना उचित नहीं लगता। पंचायत चुनावों में कई स्तरों पर मतदान एक साथ या आसपास की तारीखों में कराया जाता है। ऐसे में बड़ी संख्या में EVM की व्यवस्था करना भी प्रशासन के लिए चुनौती हो सकता है। दूसरी ओर, बैलेट पेपर से मतदान के बाद वोटों की गिनती में अधिक समय और कर्मचारियों की जरूरत पड़ती है।
Elections Ballot Papers: पंचायत चुनाव में EVM का इस्तेमाल कैसे होता है?
पंचायत चुनावों में उम्मीदवारों को कई बार ऐसे चुनाव चिह्न दिए जाते हैं, जो राजनीतिक दलों के पारंपरिक चुनाव चिह्नों से अलग होते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि इन चिह्नों को EVM में कैसे दर्ज किया जाता है? पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा के मुताबिक, इसके लिए ‘सिंबल लोडिंग’ प्रक्रिया अपनाई जाती है। इस प्रक्रिया के तहत चुनाव में इस्तेमाल होने वाले उम्मीदवारों के नाम और चुनाव चिह्न EVM में दर्ज किए जाते हैं। इससे मतदाता मशीन पर उम्मीदवार का नाम और उसका चुनाव चिह्न देखकर वोट डाल सकता है।
ग्रामीण निकायों के चुनाव में स्थानीय स्तर पर उम्मीदवारों का मतदाताओं से संपर्क भी अहम माना जाता है। महाराष्ट्र के चंद्रपुर के पूर्व सरपंच कल्याण कुमार के मुताबिक, इन चुनावों में उम्मीदवार की विचारधारा से ज्यादा उसकी स्थानीय पहुंच और लोगों के रोजमर्रा के कामों में मदद करने की भूमिका मायने रखती है।

नगर निगम चुनाव EVM से होते हैं या बैलेट पेपर से?
नगर निगम और नगर निकायों के चुनाव राज्य निर्वाचन आयोगों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। इसलिए मतदान EVM से कराया जाएगा या बैलेट पेपर से, इसका फैसला संबंधित राज्य निर्वाचन आयोग करता है। यही वजह है कि अलग-अलग राज्यों में नगर निकाय चुनावों के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं देखने को मिलती हैं।
उदाहरण के लिए, दिल्ली नगर निगम के चुनाव EVM से कराए जाते हैं, जबकि पंजाब ने 2026 में नगर निकाय चुनावों के लिए बैलेट पेपर का रास्ता चुना। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने भी कहा कि पंजाब नगर निगम चुनाव नियम, 1994 में बैलेट पेपर और EVM दोनों से चुनाव कराने का प्रावधान है। ऐसे में राज्य निर्वाचन आयोग को इनमें से किसी एक तरीके को चुनने का अधिकार है। इसका मतलब है कि नगर निगम चुनावों में पूरे देश के लिए एक जैसी मतदान व्यवस्था लागू नहीं है। राज्य के नियम और निर्वाचन आयोग का फैसला इसमें अहम भूमिका निभाते हैं।
Elections Ballot Papers: छात्र संघ चुनावों में भी बैलेट पेपर का इस्तेमाल क्यों होता है?
विश्वविद्यालयों के छात्र संघ चुनावों में भी EVM और बैलेट पेपर दोनों का इस्तेमाल किया जाता है। उदाहरण के लिए, दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) के चुनाव EVM से कराए जाते हैं, जबकि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (JNUSU) के चुनाव बैलेट पेपर से होते हैं।
छात्र संघ चुनावों में उम्मीदवारों के नाम और उनके सामने दिए गए बैलेट नंबर के आधार पर मतदान होता है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय मीडिया संयोजक हर्ष अत्री के मुताबिक, EVM में उम्मीदवारों के नाम अंग्रेजी वर्णमाला के क्रम में दिखाई देते हैं। इसलिए उम्मीदवार का नाम और उसके सामने दिया गया बैलेट नंबर मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण होता है।

राज्यसभा और विधान परिषद के चुनाव बैलेट पेपर से क्यों होते हैं?
राज्यसभा और विधान परिषद के चुनावों में बैलेट पेपर का इस्तेमाल होने की प्रमुख वजह मतदान की विशेष व्यवस्था है। इन चुनावों में एकल हस्तांतरणीय मत प्रणाली यानी सिंगल ट्रांसफरेबल वोट (STV) अपनाई जाती है।
इस व्यवस्था में मतदाता केवल एक उम्मीदवार को चुनकर वोट नहीं देता, बल्कि उम्मीदवारों को अपनी पसंद के क्रम में रखता है। वह पहली पसंद के उम्मीदवार के सामने 1, दूसरी पसंद के सामने 2 और तीसरी पसंद के सामने 3 लिखता है। जरूरत पड़ने पर मतदाता की अगली पसंद को भी गिनती में शामिल किया जा सकता है। राज्यसभा के चुनाव में विधायक मतदान करते हैं। वहीं, विधान परिषद की अलग-अलग श्रेणियों की सीटों के लिए संबंधित निर्वाचक मंडल के सदस्य वोट डालते हैं। इनमें स्थानीय निकायों के प्रतिनिधि, स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता, शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता और विधानसभा के सदस्य शामिल होते हैं।
संविधान के अनुच्छेद 80(4) में राज्यसभा के निर्वाचित सदस्यों और अनुच्छेद 171 में विधान परिषद की चुनावी व्यवस्था का प्रावधान है। इन चुनावों में प्राथमिकता के आधार पर वोट दर्ज किए जाते हैं, इसलिए बैलेट पेपर का इस्तेमाल किया जाता है।
Elections Ballot Papers: एकल हस्तांतरणीय मत प्रणाली क्या है?
एकल हस्तांतरणीय मत प्रणाली में मतदाता की एक वोट की ताकत केवल उसकी पहली पसंद तक सीमित नहीं रहती। अगर उसकी पहली पसंद का उम्मीदवार जीत जाता है और उसके पास जीत के लिए जरूरी संख्या से अधिक वोट हैं, या वह चुनाव से बाहर हो जाता है, तो नियमों के मुताबिक वोट अगली पसंद के उम्मीदवार को हस्तांतरित हो सकता है। इसका उद्देश्य यह है कि मतदाताओं की प्राथमिकताओं को भी चुनाव परिणाम में जगह मिले। इस व्यवस्था में उम्मीदवारों को जीतने के लिए एक तय संख्या में वोट हासिल करने होते हैं। इसे कोटा कहा जाता है।
राज्यसभा चुनाव में वोटों की गिनती कैसे होती है?
राज्यसभा चुनाव में विधायक बैलेट पेपर पर उम्मीदवारों के सामने अपनी पहली, दूसरी और उसके बाद की पसंद दर्ज करते हैं। मतदान खुली मतपत्र व्यवस्था के तहत होता है। यानी यह राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव की तरह गुप्त मतदान नहीं होता। राजनीतिक दलों के विधायकों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपना मत अधिकृत एजेंट को दिखाना होता है।
गिनती में सबसे पहले पहली पसंद के वोटों को जोड़ा जाता है। जिस उम्मीदवार को जीत के लिए जरूरी कोटा मिल जाता है, उसे विजयी घोषित किया जाता है। यदि किसी उम्मीदवार को कोटे से अधिक वोट मिलते हैं, तो नियमों के मुताबिक उसके अतिरिक्त वोट अगली प्राथमिकताओं के आधार पर दूसरे उम्मीदवारों को हस्तांतरित किए जा सकते हैं।
अगर सभी सीटें भरने के लिए पर्याप्त उम्मीदवार कोटा हासिल नहीं कर पाते, तो सबसे कम पहली पसंद के वोट पाने वाले उम्मीदवार को बाहर किया जाता है। उसके मतपत्रों पर दर्ज अगली वैध पसंद के आधार पर वोट दूसरे उम्मीदवारों को हस्तांतरित किए जाते हैं। यह प्रक्रिया तब तक चलती है, जब तक सभी सीटों के लिए उम्मीदवारों का चयन नहीं हो जाता।
Elections Ballot Papers: राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव भी बैलेट पेपर से होता है?
हां। राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में भी बैलेट पेपर का इस्तेमाल किया जाता है। इन दोनों चुनावों में एकल हस्तांतरणीय मत प्रणाली के तहत मतदान होता है। हालांकि, राज्यसभा चुनाव से एक बड़ा अंतर यह है कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में मतदान गुप्त होता है।
राष्ट्रपति का चुनाव निर्वाचक मंडल करता है। इसमें संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य और राज्यों तथा दिल्ली और पुडुचेरी की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं। वहीं, उपराष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों के सदस्य करते हैं। भारत निर्वाचन आयोग के मुताबिक, राष्ट्रपति चुनाव में मतदाता बैलेट पेपर पर उम्मीदवारों के नाम के सामने अपनी प्राथमिकताएं 1, 2, 3 और आगे के क्रम में दर्ज करते हैं। पहली पसंद दर्ज करना अनिवार्य होता है, जबकि बाकी प्राथमिकताएं देना मतदाता की इच्छा पर निर्भर करता है।
क्या बैलेट पेपर से मतदान कराना EVM से बेहतर है?
इसका कोई एक जवाब नहीं है। दोनों व्यवस्थाओं के अपने फायदे और चुनौतियां हैं। बैलेट पेपर में मतदाता कागज पर अपनी पसंद दर्ज करता है। वहीं, EVM से मतदान और मतगणना की प्रक्रिया अपेक्षाकृत तेज होती है। बैलेट पेपर की गिनती में अधिक समय और कर्मचारियों की जरूरत पड़ सकती है। कागज के इस्तेमाल से पर्यावरण पर भी असर पड़ता है।
दूसरी ओर, कुछ चुनावों में प्राथमिकता के आधार पर वोट दर्ज करना जरूरी होता है। ऐसे में बैलेट पेपर उस प्रक्रिया को अपनाने का माध्यम है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि जहां बैलेट पेपर इस्तेमाल होता है, वहां EVM का इस्तेमाल संभव ही नहीं है। पंचायत और नगर निकाय चुनावों में दोनों व्यवस्थाएं अपनाई जा सकती हैं, जबकि कुछ संवैधानिक चुनावों में मतदान की निर्धारित प्रक्रिया के कारण बैलेट पेपर का इस्तेमाल होता है।
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