Election Commission: चुनाव आयोग ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान मतदाता सूची में गड़बड़ियों की पहचान करने के लिए इस्तेमाल किए गए सॉफ्टवेयर की जानकारी देने से इनकार कर दिया है। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, आयोग ने सूचना के अधिकार (RTI) के तहत पूछे गए सवालों के जवाब में कहा कि यह जानकारी व्यापारिक गोपनीयता और बौद्धिक संपदा से जुड़ी है। इसलिए इसे RTI कानून के तहत सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। आयोग ने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि मतदाता सूची की जांच के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग या प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स का इस्तेमाल किया गया था या नहीं।
Election Commission: सॉफ्टवेयर से जुड़े 5 सवालों पर आयोग का जवाब
RTI आवेदन में सॉफ्टवेयर का नाम और वर्जन पूछे जाने पर चुनाव आयोग ने जानकारी देने से इनकार कर दिया। इसके लिए RTI कानून की धारा 8(1)(d) का हवाला दिया गया। आयोग ने यह भी कहा कि SIR के लिए न तो कोई नया सॉफ्टवेयर बनाया गया और न ही खरीदा गया। वहीं, जब पूछा गया कि क्या सॉफ्टवेयर अपने आप गलत या संदिग्ध मतदाता रिकॉर्ड की पहचान करता है, तो आयोग ने सीधा जवाब नहीं दिया। उसने इसे स्पष्टीकरण मांगने वाला सवाल बताते हुए RTI कानून की धारा 2(f) का उल्लेख किया।मतदाता सूची की जांच में AI, मशीन लर्निंग और प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स के इस्तेमाल को लेकर भी आयोग ने स्थिति स्पष्ट नहीं की। सॉफ्टवेयर द्वारा किसी मतदाता का नाम गलत चिह्नित किए जाने की स्थिति में क्या व्यवस्था है और ऐसे रिकॉर्ड की जांच कौन करता है, इस बारे में भी पूरी जानकारी नहीं दी गई। आयोग ने कहा कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का फैसला संबंधित क्षेत्र का निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) तथ्यों और रिकॉर्ड के आधार पर करता है।
मतदाता सूची तैयार करने की जिम्मेदारी ERO की
चुनाव आयोग ने रिकॉर्ड की समीक्षा और मंजूरी से जुड़े सवाल पर RTI कानून की धारा 8(1)(g) का हवाला दिया। साथ ही बताया कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 13B(1) और 13B(2) के तहत संबंधित विधानसभा क्षेत्र के निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी की मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन करने की जिम्मेदारी होती है।तेलंगाना के करीमनगर के सामाजिक कार्यकर्ता एमए मुजीब अय्यूब ने इस मामले में RTI आवेदन दायर किया था। उन्होंने सॉफ्टवेयर का नाम और वर्जन, संदिग्ध रिकॉर्ड की पहचान करने की प्रक्रिया, AI और मशीन लर्निंग के इस्तेमाल, गलत रिकॉर्ड चिह्नित होने से बचाव के उपाय और चिह्नित रिकॉर्ड की समीक्षा करने वाले अधिकारी के बारे में पांच सवाल पूछे थे।
Election Commission: दो चुनाव आयुक्तों ने मनीष गर्ग के कामकाज पर उठाए सवाल
SIR और मतदाता सूची से जुड़े विवाद के बीच चुनाव आयोग के भीतर अधिकारियों के कामकाज को लेकर भी मतभेद सामने आए हैं। RTI एक्टिविस्ट लोकेश के. बत्रा को मिले जवाब के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 29 जुलाई को कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखे थे। इन पत्रों में डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर मनीष गर्ग के कामकाज पर सवाल उठाए गए थे।दोनों आयुक्तों ने अधिकारियों के बीच जिम्मेदारियां बांटने से जुड़े एक आदेश पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि यह आदेश चुनाव आयोग की मंजूरी के बिना जारी किया गया। RTI से मिले दस्तावेजों के मुताबिक, कैबिनेट सचिवालय ने कहा कि ये पत्र पूरे चुनाव आयोग की ओर से भेजी गई आधिकारिक शिकायतें नहीं थीं। इसलिए उसने खुद कार्रवाई करने के बजाय पत्रों को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यालय और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को भेज दिया।
मनीष गर्ग के आदेश पर क्यों हुआ विवाद?
मामला प्रशासन विभाग के अधिकारी भानु प्रकाश येतुरु की छुट्टी से जुड़ा था। येतुरु 27 जुलाई से 9 अगस्त तक छुट्टी पर थे और इस दौरान मनीष गर्ग को प्रशासन विभाग का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था। गर्ग ने जिम्मेदारी संभालने के कुछ ही घंटों बाद 28 जुलाई को अधिकारियों के कामकाज में बदलाव का आदेश जारी कर दिया।दोनों चुनाव आयुक्तों ने आरोप लगाया कि यह आदेश उनसे चर्चा या मंजूरी लिए बिना जारी किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, विवेक जोशी को मांगने के बावजूद संबंधित फाइल नहीं दी गई। दोनों आयुक्तों ने इसे निर्धारित प्रक्रिया और 2023 के कानून का उल्लंघन बताया था।
Election Commission: 10 महीनों में 14 बार आपत्ति जताने का दावा
इंडियन एक्सप्रेस की 25 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में चुनाव आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज की थी। इनमें से चार आपत्तियां एक ही दिन दर्ज की गई थीं। रिपोर्ट में बताया गया कि ये आपत्तियां मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और दोबारा शामिल करने की प्रक्रिया से जुड़ी थीं। पश्चिम बंगाल में मतदाताओं के नाम हटाए जाने से संबंधित अपीलों पर भी सवाल उठाए गए थे।रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों आयुक्तों ने मतदाता डेटाबेस तक पहुंच को धीरे-धीरे दिल्ली में केंद्रीकृत किए जाने पर चिंता जताई थी। विवेक जोशी ने मतदाता रिकॉर्ड में बदलाव का ऑडिट कराने का सुझाव दिया था, ताकि रिकॉर्ड में बदलाव केवल अधिकृत अधिकारी ही कर सकें। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि चुनाव आयुक्तों ने नए मतदाताओं से जुड़े कुछ कदमों को अनधिकृत और गैरकानूनी बताया था।
फॉर्म-6 में बदलाव और गोवा के 97 मतदाताओं का मामला
दोनों चुनाव आयुक्तों ने नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में बदलाव पर भी आपत्ति जताई थी। विवेक जोशी का कहना था कि चुनाव नियमों में बदलाव किए बिना फॉर्म-6 में इस तरह का संशोधन नहीं किया जा सकता। बाद में सुखबीर सिंह संधू ने भी इस पर आपत्ति दर्ज की थी।इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, गोवा में 97 ऐसे मतदाता अंतिम सूची में शामिल नहीं हो सके, जिन्हें निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों ने पात्र माना था। बताया गया कि सॉफ्टवेयर में आई समस्या के कारण ऐसा हुआ। रिपोर्ट में इस घटना को मतदाता डेटा सिस्टम के केंद्रीकरण से जुड़ी चिंताओं के उदाहरण के रूप में बताया गया।
Election Commission: चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को क्या कहा था?
26 सितंबर को चुनाव आयोग ने बयान जारी कर कहा था कि मनीष गर्ग के कामकाज से जुड़ा आदेश लागू नहीं किया गया था और IT विभाग की निगरानी वास्तव में नहीं हटाई गई थी। इसके बाद 3 अक्टूबर को कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने मनीष गर्ग की भूमिका और चुनाव आयोग के IT सिस्टम से जुड़े कामकाज पर सवाल उठाए थे।21 अक्टूबर को RTI से मिली जानकारी के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों के पत्र कैबिनेट सचिवालय पहुंचे थे और वहां से संबंधित अधिकारियों को भेज दिए गए थे। उस समय पत्रों की सामग्री का पूरा विवरण सामने नहीं आया था। अब सामने आई जानकारी से चुनाव आयोग के भीतर अधिकारियों के कामकाज, मतदाता डेटाबेस तक पहुंच और SIR में इस्तेमाल किए गए सॉफ्टवेयर को लेकर उठे सवालों पर फिर चर्चा शुरू हो गई है।








