End of Left Rule in India: केरल में एलडीएफ की हार और यूडीएफ की प्रचंड जीत के साथ खत्म हुआ वामपंथ का आखिरी गढ़, राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा मोड़ केरल विधानसभा चुनाव में पिनराई विजयन के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) को हार का सामना करना पड़ा है। कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) ने 140 में से 90 से अधिक सीटें जीतकर 10 साल बाद सत्ता में वापसी कर ली है। इस नतीजे के साथ ही देश की राजनीति में एक ऐतिहासिक स्थिति बन गई है, क्योंकि करीब 49 साल में पहली बार भारत के किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार नहीं बची है।
आजादी को ‘झूठी’ बताने से शुरू हुआ सफर
भारत में वामपंथी राजनीति की शुरुआत विवादों और वैचारिक असहमति के साथ हुई थी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने 1947 में मिली स्वतंत्रता को ‘अधूरी’ और ‘झूठी आजादी’ बताया था। पार्टी का मानना था कि यह स्वतंत्रता समझौतों का परिणाम है। हालांकि कुछ वर्षों बाद पार्टी को अपनी इस स्थिति पर पुनर्विचार करना पड़ा और उसने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को स्वीकार किया।
End of Left Rule in India: रणदिवे लाइन और उग्र दौर
1948 में पार्टी के भीतर बड़ा बदलाव तब आया जब बीटी रणदिवे के नेतृत्व में ‘रणदिवे लाइन’ लागू हुई। इस दौर में पार्टी ने उग्र रुख अपनाया और संविधान लागू होने से पहले ही उसका विरोध किया। जवाहरलाल नेहरू की सरकार के खिलाफ आंदोलन का आह्वान किया गया, लेकिन 1948-49 में यह रणनीति विफल रही और 1950 में रणदिवे को पद से हटा दिया गया।
End of Left Rule in India: 1957: दुनिया की पहली लोकतांत्रिक कम्युनिस्ट सरकार
1957 में केरल में ईएमएस नंबूदरीपाद के नेतृत्व में दुनिया की पहली लोकतांत्रिक कम्युनिस्ट सरकार बनी। इस सरकार ने भूमि सुधार और शिक्षा सुधार जैसे महत्वपूर्ण फैसले लिए, जिनका राज्य की सामाजिक संरचना पर गहरा असर पड़ा। हालांकि 1959 में राजनीतिक विरोध के बाद केंद्र सरकार ने इस सरकार को बर्खास्त कर दिया, जिसमें इंदिरा गांधी की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।
1962 युद्ध और वैचारिक विभाजन
1962 के भारत-चीन युद्ध 1962 के बाद वामपंथी आंदोलन के भीतर गहरे मतभेद उभरकर सामने आए। इसी के परिणामस्वरूप 1964 में पार्टी का विभाजन हुआ और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) का गठन हुआ।
End of Left Rule in India: बंगाल में लाल किला और उसका पतन
पश्चिम बंगाल में 1977 से वामपंथ का मजबूत दौर शुरू हुआ, जब ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने और लंबे समय तक सत्ता में रहे। उनके बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य ने औद्योगिक विकास को आगे बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन सिंगूर और नंदीग्राम जैसे विवादों ने सरकार को कमजोर कर दिया। अंततः 2011 में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने 34 साल पुराने वाम शासन को समाप्त कर दिया।
केंद्र में असर और फिर गिरावट
2004 में वामपंथी दलों ने लोकसभा में 80 सीटें जीतकर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया और मनमोहन सिंह की सरकार को समर्थन दिया। इस दौरान कई महत्वपूर्ण सामाजिक योजनाएं लागू हुईं। हालांकि 2008 में इंडो-यूएस न्यूक्लियर डील के मुद्दे पर समर्थन वापस लेने के बाद उनका राष्ट्रीय प्रभाव लगातार घटता गया।
लगातार हार और अब आखिरी गढ़ भी खत्म
2011 में पश्चिम बंगाल, 2018 में त्रिपुरा और अब 2026 में केरल में हार के साथ ही वामपंथ का आखिरी राजनीतिक आधार भी समाप्त हो गया है। यह परिणाम केवल एक चुनावी हार नहीं, बल्कि भारत में वामपंथी राजनीति के एक लंबे दौर के अंत का संकेत है।








