Himalayan Glaciers Melting: केदारनाथ से चमोली और हिमालयी क्षेत्र की हालिया आपदाओं तक एक सवाल बार-बार सामने आता है- जिस हिमालय को भारत की प्राकृतिक ढाल कहा जाता है, वही अब इतनी बड़ी आपदाओं का केंद्र क्यों बनता जा रहा है? इसकी कहानी सिर्फ बर्फ पिघलने की नहीं, बल्कि करोड़ों साल पुराने भूगर्भीय बदलाव, तेजी से बदलती जलवायु और इंसानी दखल की भी है।
कल्पना कीजिए, जहां आज दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटियां खड़ी हैं, वहां कभी समुद्र लहराता था। आज का हिमालय करोड़ों साल पहले मौजूद टेथिस सागर के तल में जमा चट्टानों और तलछट से जुड़ी भूगर्भीय कहानी का परिणाम है। भारतीय प्लेट लगातार उत्तर की ओर बढ़ती हुई यूरेशियन प्लेट से टकराई और इसी टक्कर ने हिमालय को जन्म दिया। यही वजह है कि हिमालय को आज भी भूगर्भीय रूप से युवा और सक्रिय पर्वत श्रृंखला माना जाता है। यह पर्वत आज भी पूरी तरह स्थिर नहीं है।
सवाल-1: समुद्र से हिमालय बना कैसे?
करोड़ों साल पहले भारतीय प्लेट के उत्तर में टेथिस सागर था। इस समुद्र में जमा तलछट और चट्टानों की परतें धीरे-धीरे दबती गईं। फिर भारतीय प्लेट उत्तर की ओर बढ़ती हुई यूरेशियन प्लेट से टकराई। टक्कर इतनी शक्तिशाली थी कि समुद्र की तलहटी में जमा चट्टानें ऊपर उठने लगीं। यही प्रक्रिया लाखों वर्षों तक चलती रही और धीरे-धीरे हिमालय की विशाल पर्वत श्रृंखला अस्तित्व में आई। इसलिए हिमालय को समझने के लिए सिर्फ पहाड़ों को देखना काफी नहीं है। इसकी चट्टानों में आज भी उस प्राचीन समुद्र की भूगर्भीय कहानी दर्ज है।
Himalayan Glaciers Melting: सवाल-2: क्या हिमालय आज भी ऊंचा हो रहा है?
हां, लेकिन तस्वीर इतनी सरल नहीं है कि पूरे हिमालय को हर साल एक समान 5 मिलीमीटर ऊंचा बताया जाए। भारतीय और यूरेशियन प्लेटों की लगातार टक्कर आज भी जारी है। इसके कारण हिमालय में भूगर्भीय गतिविधियां होती रहती हैं और कई हिस्सों में जमीन ऊपर उठती है। लेकिन दूसरी तरफ बारिश, भूस्खलन, नदी का कटाव, भूकंप और बर्फ के पिघलने जैसी प्रक्रियाएं पहाड़ों को काटती भी रहती हैं। यानी हिमालय में एक साथ दो प्रक्रियाएं चल रही हैं—ऊपर उठना और टूटना-कटाव। इसी असंतुलन की वजह से हिमालय दुनिया के सबसे सक्रिय और संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में शामिल है।
सवाल-3: फिर खतरा इतना बढ़ क्यों रहा है?
हिमालय का प्राकृतिक रूप से अस्थिर होना कोई नई बात नहीं है। नई चुनौती यह है कि जलवायु परिवर्तन इस संवेदनशील सिस्टम पर अतिरिक्त दबाव डाल रहा है। तापमान बढ़ने से ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं। बर्फ और पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से पहाड़ी ढलानों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। कई जगह ग्लेशियर झीलों का आकार बढ़ने से अचानक बाढ़ यानी Glacial Lake Outburst Flood (GLOF) का खतरा भी पैदा होता है। दूसरी तरफ बेहद कम समय में होने वाली भारी बारिश पहाड़ों की कमजोर ढलानों को तेजी से काटती है। यही कारण है कि एक ही घटना कई खतरों को जन्म दे सकती है— भारी बारिश – भूस्खलन – नदी में मलबा – नदी का रास्ता बाधित – अचानक बाढ़।
Himalayan Glaciers Melting: सवाल-4: 2013 की केदारनाथ आपदा ने क्या बताया?
2013 की केदारनाथ त्रासदी हिमालय की संवेदनशीलता का सबसे बड़ा उदाहरण बनी। अत्यधिक बारिश के दौरान चोराबाड़ी झील क्षेत्र में अचानक पानी बढ़ा और उसके बाद बड़े पैमाने पर मलबा नीचे आया। मंदाकिनी घाटी में आई तबाही ने हजारों लोगों की जान ली और पूरे देश को हिमालयी क्षेत्र में आपदा प्रबंधन की कमजोरियों का एहसास कराया। इस घटना ने एक महत्वपूर्ण सबक दियाहिमालय में सिर्फ बारिश खतरा नहीं है, बल्कि बारिश और पहाड़ की भूगर्भीय स्थिति का मेल बेहद विनाशकारी हो सकता है।

सवाल-5: चमोली 2021 ने किस खतरे की तरफ इशारा किया?
2021 में उत्तराखंड के चमोली जिले में अचानक आई बाढ़ ने रैणी और तपोवन क्षेत्र को बुरी तरह प्रभावित किया। बाद की वैज्ञानिक जांचों में हिमस्खलन/चट्टान-बर्फ के बड़े हिस्से के टूटने और नीचे गिरने से उत्पन्न मलबे और पानी की तेज गति को आपदा से जोड़ा गया। इस घटना ने दिखाया कि हिमालय में खतरा सिर्फ नीचे बहती नदियों में नहीं है। ऊपर की चोटियों और ग्लेशियर क्षेत्रों में होने वाला छोटा-बड़ा बदलाव भी कुछ ही मिनटों में घाटी में बड़ी तबाही ला सकता है।
Himalayan Glaciers Melting: सवाल-6: क्या सिर्फ ग्लेशियर पिघलना ही हिमालयी आपदाओं की वजह है?
नहीं। यही इस पूरी कहानी की सबसे महत्वपूर्ण बात है। हिमालयी आपदाओं के पीछे कई कारक एक साथ काम कर सकते हैं- अत्यधिक और कम समय में होने वाली बारिश, ग्लेशियरों का पीछे हटना, ग्लेशियर झीलों का बढ़ना,हिमस्खलन, चट्टानों और बर्फ का टूटना, भूकंपीय गतिविधियां, भूस्खलन, नदी में मलबे का अचानक बढ़ना, सड़क और सुरंग निर्माण, अनियोजित शहरीकरण और नदी घाटियों में अत्यधिक निर्माण होना। इसलिए हर बाढ़ को सीधे “ग्लेशियर पिघलने” से जोड़ना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा।
सवाल-7: इंसानों ने खतरा कितना बढ़ाया?
प्राकृतिक खतरे को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता। लेकिन उसके नुकसान को कम किया जा सकता है।समस्या तब बढ़ती है जब सड़कें, होटल, बांध, सुरंगें और दूसरी परियोजनाएं बेहद संवेदनशील ढलानों तथा नदी घाटियों के करीब तेजी से बढ़ती हैं।
हिमालय में किसी जगह भूस्खलन होना प्राकृतिक घटना हो सकती है। लेकिन उसी ढलान पर सड़क, मकान या दूसरी संरचना मौजूद हो तो प्राकृतिक घटना मानवीय आपदा में बदल सकती है। यानी असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि हिमालय में खतरा है या नहीं। सवाल यह है कि हमने खतरे वाले इलाकों में कितनी बस्तियां और कितनी संरचनाएं खड़ी कर दी हैं?
सवाल-8: क्या हिमालय भारत की ढाल है या खतरे का क्षेत्र?
दोनों। हिमालय भारत की जलवायु, नदियों, जल संसाधनों और पारिस्थितिकी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र जैसी विशाल नदी प्रणालियों का जीवन हिमालयी बर्फ, ग्लेशियर और वर्षा से जुड़ा है। लेकिन यही ऊंचे पहाड़ भूकंप, भूस्खलन, हिमस्खलन, ग्लेशियर झीलों और अचानक आने वाली बाढ़ के लिहाज से संवेदनशील भी हैं। इसलिए हिमालय को सिर्फ “प्राकृतिक सुरक्षा कवच” मानना अधूरा नजरिया होगा। यह एक जीवित और लगातार बदलता हुआ भूगर्भीय सिस्टम है।
Himalayan Glaciers Melting: सबसे बड़ा सवाल: क्या हिमालय अब ज्यादा खतरनाक हो गया है?
हिमालय अचानक खतरनाक नहीं हुआ है। वह हमेशा से सक्रिय और संवेदनशील रहा है। बदलाव यह है कि जलवायु परिवर्तन, तेजी से बढ़ती मानवीय गतिविधियां और संवेदनशील क्षेत्रों में बढ़ता निर्माण अब प्राकृतिक जोखिमों के साथ जुड़ रहे हैं। नतीजा यह है कि जिस बारिश, बर्फबारी, भूस्खलन या हिमस्खलन को पहाड़ पहले भी झेलता था, वही घटना अब कई जगह ज्यादा लोगों और ज्यादा बुनियादी ढांचे को प्रभावित कर सकती है।
हिमालय को जीतना नहीं, समझना होगा
हिमालय की कहानी समुद्र से शुरू होकर पर्वतों तक पहुंचती है, लेकिन यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती। भारतीय प्लेट आज भी आगे बढ़ रही है। पहाड़ आज भी उठ रहे हैं, कट रहे हैं और बदल रहे हैं। ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं, नदियां अपना रास्ता बदल रही हैं और मौसम का चरित्र भी बदल रहा है।
इसलिए भविष्य की चुनौती हिमालय को रोकने की नहीं, बल्कि उसके स्वभाव को समझकर विकास की सीमा तय करने की है। क्योंकि हिमालय को कमजोर करना सिर्फ पहाड़ों को नुकसान पहुंचाना नहीं है। इसके असर नदियों, जंगलों, खेती, शहरों और करोड़ों लोगों तक पहुंच सकते हैं। हिमालय भारत की ढाल जरूर है, लेकिन ढाल को मजबूत रखने के लिए यह समझना जरूरी है कि उसके भीतर चल क्या रहा है।








