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क्या ट्रंप को नाराज करके Su-57 खरीदेगा भारत? पुतिन इतना जोर क्यों लगा रहे और भारत ने पहले क्यों मना किया?

India Russia Defence Deal: भारत और रूस के रिश्तों में Su-57 फाइटर जेट एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। दिलचस्प बात यह है कि कुछ ही समय पहले भारत ने रूसी Su-57 को तत्काल खरीदने की संभावना से इनकार किया था। लेकिन अब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत दौरे के बीच मॉस्को ने इस पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर को लेकर अपना प्रस्ताव फिर जोरदार तरीके से आगे बढ़ाया है।

11 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पुतिन की दिल्ली में मुलाकात हुई। रूस की ओर से पहले ही साफ किया गया था कि Su-57 की बिक्री और इससे जुड़ी अत्याधुनिक तकनीक पर भारत के साथ बातचीत एजेंडे में है। रिपोर्टों में भारत के लिए बड़ी संख्या में Su-57E विमानों की संभावित खरीद और भारत में उत्पादन की पेशकश की चर्चा है, लेकिन अभी किसी अंतिम खरीद समझौते को आधिकारिक रूप से घोषित नहीं किया गया है।

तो सवाल यही है- जब भारत पहले पीछे हट चुका था, तो अब Su-57 पर दोबारा विचार क्यों हो रहा है? और अगर भारत ने रूस से इतना बड़ा लड़ाकू विमान सौदा किया तो अमेरिका और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रतिक्रिया क्या होगी?

सवाल-1: भारत ने पहले Su-57 को क्यों नकार दिया था?

इस कहानी की शुरुआत आज से नहीं, बल्कि करीब दो दशक पहले हुई थी। भारत और रूस ने 2000 के दशक में पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान के संयुक्त विकास की दिशा में काम शुरू किया था। इसे FGFA यानी Fifth Generation Fighter Aircraft कार्यक्रम के तौर पर आगे बढ़ाया गया। लेकिन समय के साथ भारत की चिंताएं बढ़ती गईं। भारतीय पक्ष को विमान की स्टील्थ क्षमता, लागत, तकनीक तक पहुंच और डिजाइन में अपनी जरूरतों के मुताबिक बदलाव को लेकर आपत्तियां थीं। आखिरकार भारत इस कार्यक्रम से बाहर हो गया। बाद में 2018 के आसपास यह स्पष्ट हो गया कि भारत और रूस उस समय पांचवीं पीढ़ी के विमान को लेकर एक साझा रास्ते पर आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। यानी भारत का पहला इनकार केवल राजनीतिक फैसला नहीं था। इसके पीछे तकनीकी जरूरतें, लागत और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर जैसे मुद्दे भी थे।

India Russia Defence Deal: सवाल-2: फिर पुतिन दोबारा Su-57 लेकर क्यों आए?

क्योंकि इस बार रूस का ऑफर पहले से अलग है। राष्ट्रपति पुतिन ने जून 2026 में कहा था कि रूस भारत के साथ Su-57 का संयुक्त विकास और उत्पादन करने तथा महत्वपूर्ण तकनीक साझा करने के लिए तैयार है। रूसी प्रस्ताव को “बिना सीमाओं” वाले सहयोग के रूप में पेश किया गया है। रूस का संदेश साफ है-भारत सिर्फ तैयार विमान खरीदे, ऐसा जरूरी नहीं; उसे भारत में उत्पादन और तकनीकी सहयोग का रास्ता भी दिया जा सकता है। यही वह बिंदु है जो पुराने FGFA प्रस्ताव और आज के Su-57 प्रस्ताव के बीच सबसे बड़ा फर्क पैदा करता है।

सवाल-3: भारत को आज Su-57 की जरूरत क्यों महसूस हो सकती है?

सबसे बड़ा कारण है पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की कमी। भारत के पास फिलहाल कोई ऑपरेशनल पांचवीं पीढ़ी का फाइटर नहीं है। दूसरी तरफ चीन J-20 के साथ अपनी स्टील्थ फाइटर क्षमता बढ़ा चुका है और J-35 को भी आगे बढ़ा रहा है। पाकिस्तान की ओर से भी चीनी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान हासिल करने की खबरें सामने आती रही हैं। दूसरी तरफ भारत का स्वदेशी AMCA कार्यक्रम लंबी अवधि का समाधान है। लेकिन इसे पूरी तरह ऑपरेशनल होने में अभी समय लगेगा। यही अंतराल रूस के लिए सबसे बड़ा अवसर है। मॉस्को Su-57 को भारत के लिए “स्टॉपगैप” यानी अंतरिम पांचवीं पीढ़ी की क्षमता के रूप में पेश कर रहा है।

India Russia Defence Deal: सवाल-4: क्या भारत के पास इंतजार करने का विकल्प है?

यही असली समस्या है। भारत एक तरफ AMCA को आगे बढ़ा रहा है, लेकिन दूसरी तरफ वायुसेना को तत्काल और भविष्य दोनों की जरूरतों को संभालना है। अगर AMCA को आने में एक दशक से ज्यादा समय लगता है, तो इस दौरान चीन और पाकिस्तान अपनी स्टील्थ क्षमताओं को और आगे बढ़ा सकते हैं। इसलिए भारत के सामने मोटे तौर पर तीन रास्ते हैं- पहला: AMCA का इंतजार किया जाए। दूसरा: पश्चिमी देश से पांचवीं पीढ़ी का विमान लिया जाए। तीसरा: रूस से Su-57 लेकर अंतरिम क्षमता तैयार की जाए और साथ में स्वदेशी AMCA जारी रखा जाए। इसी तीसरे विकल्प को रूस सबसे आक्रामक तरीके से भारत के सामने रख रहा है।

India Russia Defence Deal
                                                       India Russia Defence Deal
सवाल-5: रूस भारत को Su-57 बेचने के लिए इतना जोर क्यों लगा रहा है?

इसका जवाब सिर्फ भारत की जरूरत में नहीं, बल्कि रूस की अपनी जरूरत में भी छिपा है। यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूसी हथियार उद्योग को निर्यात बाजार में चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। ऐसे में भारत जैसा बड़ा रक्षा बाजार Su-57 के लिए बेहद महत्वपूर्ण ग्राहक हो सकता है। अगर भारत Su-57 को अपनाता है तो रूस को सिर्फ एक बड़ा ऑर्डर नहीं मिलेगा, बल्कि विमान की अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता भी बढ़ेगी। भारत में संयुक्त उत्पादन शुरू होता है तो Su-57 के लिए एक बड़ा औद्योगिक आधार भी तैयार हो सकता है। यानी रूस के लिए भारत ग्राहक से कहीं ज्यादा रणनीतिक और औद्योगिक साझेदार बन सकता है।

India Russia Defence Deal: सवाल-6: क्या भारत में Su-57 बन सकता है?

यही इस प्रस्ताव का सबसे आकर्षक हिस्सा है। रूस ने भारत में Su-57 के संयुक्त उत्पादन की पेशकश की है। HAL के स्तर पर भी रूस के साथ संभावित साझेदारी पर बातचीत हुई है। अप्रैल 2026 में HAL प्रमुख ने बताया था कि रूसी पक्ष से निवेश संबंधी प्रस्ताव/कोटेशन का इंतजार किया जा रहा था। रूस ने इससे आगे बढ़कर ऐसी तकनीकों में सहयोग की पेशकश भी की है जिनका संबंध भारत के भविष्य के पांचवीं पीढ़ी के AMCA कार्यक्रम से हो सकता है। अगर यह सहयोग वास्तविक और पर्याप्त तकनीकी हस्तांतरण में बदलता है, तो भारत को केवल विमान नहीं, बल्कि एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग और फाइटर टेक्नोलॉजी में भी फायदा हो सकता है।

सवाल-7: क्या Su-57 भारत के AMCA को कमजोर करेगा?

जरूरी नहीं। बल्कि भारत के नजरिए से सबसे दिलचस्प स्थिति यह होगी कि Su-57 को अंतरिम क्षमता और AMCA को दीर्घकालीन स्वदेशी क्षमता के तौर पर देखा जाए। रूस ने AMCA के लिए इंजन और दूसरी तकनीकों में सहयोग की पेशकश किए जाने की खबरें भी सामने आई हैं। हालांकि ऐसी पेशकश और वास्तविक तकनीक हस्तांतरण के बीच बड़ा अंतर होता है। भारत को इसलिए यह देखना होगा कि Su-57 समझौता AMCA के रास्ते को तेज करता है या संसाधनों और औद्योगिक क्षमता को दूसरी दिशा में मोड़ देता है।

India Russia Defence Deal: सवाल-8: अब आता है सबसे बड़ा सवाल क्या ट्रंप नाराज होंगे?

संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। अमेरिका लंबे समय से भारत के रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंधों को लेकर दबाव बनाता रहा है। भारत पहले भी रूस से S-400 खरीद चुका है और उस समय अमेरिकी प्रतिबंधों का खतरा सामने आया था। अगर भारत रूस से पांचवीं पीढ़ी के बड़े लड़ाकू विमानों की खरीद करता है तो वॉशिंगटन इसे अपने रक्षा निर्यात और रूस पर दबाव की नीति के संदर्भ में देख सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भारत हर रूसी रक्षा सौदे से पहले अमेरिकी अनुमति लेगा। भारत की विदेश और रक्षा नीति में Strategic Autonomy यानी रणनीतिक स्वायत्तता लंबे समय से महत्वपूर्ण सिद्धांत रही है। हालिया मोदी-पुतिन बैठक भी यही दिखाती है कि भारत रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा सहयोग जारी रखते हुए पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंध भी बनाए रखना चाहता है।

सवाल-9: क्या भारत को F-35 के बजाय Su-57 चुनना पड़ेगा?

जरूरी नहीं कि मामला इतना सीधा हो। F-35 और Su-57 दोनों पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान हैं, लेकिन दोनों के साथ भारत की रणनीतिक और तकनीकी जरूरतें अलग हैं। भारत के लिए असली सवाल यह होगा कि कौन सा विकल्प उसे- पर्याप्त संख्या में विमान दे सकता है, स्थानीय उत्पादन की अनुमति देता है, तकनीक हस्तांतरण करता है, भारतीय हथियारों को एकीकृत करने की सुविधा देता है, भविष्य में अपग्रेड की स्वतंत्रता देता है, और AMCA कार्यक्रम को नुकसान पहुंचाए बिना तत्काल क्षमता बढ़ाता है। अगर रूस इन क्षेत्रों में ज्यादा आकर्षक पैकेज देता है तो Su-57 का प्रस्ताव भारत के लिए गंभीर विकल्प बन सकता है।

सवाल-10: क्या Su-57 खरीदने से भारत अमेरिका को खो देगा?

नहीं, लेकिन संतुलन मुश्किल जरूर होगा। भारत और अमेरिका के संबंध अब रक्षा, तकनीक, हिंद-प्रशांत, क्वाड और व्यापार तक फैल चुके हैं। वहीं रूस भारत के लिए ऊर्जा, रक्षा और रणनीतिक सहयोग का पुराना साझेदार है। इसलिए भारत की कोशिश संभवतः किसी एक खेमे में जाने की नहीं, बल्कि दोनों रिश्तों से अपने राष्ट्रीय हित के मुताबिक फायदा लेने की होगी। यही भारत की multi-alignment नीति का मूल है। मोदी-पुतिन बैठक में भी दोनों देशों ने रक्षा के अलावा व्यापार, ऊर्जा और वैश्विक मुद्दों पर सहयोग जारी रखने पर जोर दिया। दोनों देश 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य भी रखते हैं।

India Russia Defence Deal: सवाल-11: क्या 75 Su-57 की डील पक्की हो चुकी है?

नहीं। यही सबसे जरूरी सावधानी है। 75 Su-57E विमानों और करीब एक लाख करोड़ रुपये के पैकेज की रिपोर्टें सामने आई हैं, लेकिन इसे अभी अंतिम सरकारी सौदा मानना सही नहीं होगा। रूस ने Su-57 की बिक्री और तकनीकी सहयोग पर बातचीत की पुष्टि की है, लेकिन संख्या, कीमत, उत्पादन व्यवस्था और अंतिम अनुबंध को अलग-अलग चरणों में देखा जाना चाहिए। इसलिए अभी सही भाषा होगी- “भारत Su-57 पर विचार कर रहा है” या “रूस ने भारत को बड़ा Su-57 प्रस्ताव दिया है”, न कि “भारत ने 75 Su-57 खरीद लिए।”

मामला ट्रंप बनाम पुतिन का नहीं, भारत के विकल्पों का है

Su-57 पर भारत का फैसला सिर्फ यह तय नहीं करेगा कि वायुसेना में रूस का एक नया विमान आएगा या नहीं। यह फैसला तीन बड़े सवालों को एक साथ प्रभावित करेगा। भारत की तत्काल पांचवीं पीढ़ी की क्षमता, AMCA का भविष्य और रूस-अमेरिका के बीच भारत का रणनीतिक संतुलन।

भारत ने पहले Su-57 को इसलिए नकारा था क्योंकि तब उसे लागत, स्टील्थ क्षमता और तकनीक हस्तांतरण को लेकर संतुष्टि नहीं थी। अब रूस उसी पुराने प्रस्ताव को ज्वाइंट प्रोडक्शन, तकनीक हस्तांतरण और भारत की औद्योगिक भागीदारी जैसे नए ऑफर के साथ पेश कर रहा है। इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि “भारत ट्रंप को नाराज करके पुतिन का विमान खरीदेगा या नहीं?”

असली सवाल है- क्या रूस इस बार भारत को इतना बड़ा तकनीकी और औद्योगिक फायदा देने को तैयार है कि Su-57, AMCA के इंतजार के बीच भारत के लिए वाकई बेहतर विकल्प बन जाए? अगर जवाब हां होता है, तो यह सिर्फ 75 लड़ाकू विमानों की खरीद नहीं होगी- यह भारत की भविष्य की एयरोस्पेस क्षमता और रणनीतिक स्वायत्तता पर बड़ा फैसला होगा।

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