Israel Elections Explained: इजराइल के चुनाव में मुकाबला किसी एक नेता की जीत-हार तक सीमित नहीं है। रक्षा सहयोग, व्यापार, ईरान से जुड़े रणनीतिक हित और खाड़ी में रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा भी इससे जुड़ी है। बेंजामिन नेतन्याहू का गुट और गादी आइजनकोट के नेतृत्व वाला विपक्ष बहुमत से दूर रहने पर गठबंधन बनाने की चुनौती का सामना कर रहे हैं। ऐसे में भारत के लिए सवाल है कि इजराइल में नई सरकार बनी तो मौजूदा रिश्तों की दिशा और रफ्तार पर क्या असर पड़ेगा?
इजराइल में 27 अक्टूबर 2026 को हुए चुनाव के बाद शुरुआती नतीजों में किसी भी गुट को स्पष्ट बहुमत मिलता नहीं दिखा रहा । 120 सदस्यों वाली संसद नेसेट में सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सीटों का समर्थन जरूरी है। 28 अक्टूबर को सामने आए शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, नेतन्याहू के नेतृत्व वाला गुट 53 सीटों और गादी आइजनकोट के नेतृत्व वाला विपक्षी गुट 48 सीटों के आसपास था। अरब दलों को करीब 19 सीटें मिलने का अनुमान था। हालांकि, ये शुरुआती आंकड़े थे और अंतिम नतीजों के साथ इनमें बदलाव संभव था।
भारत के लिए इस चुनाव का महत्व इसलिए है क्योंकि इजराइल के साथ उसके संबंध रक्षा तकनीक तक सीमित नहीं हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, ईरान के साथ भारत के हित और खाड़ी देशों के साथ व्यापार भी इस क्षेत्र की स्थिरता पर निर्भर करते हैं।
1. मोदी सरकार के लिए इजराइल के चुनाव अहम क्यों हैं?
भारत और इजराइल के संबंधों में रक्षा, कृषि, तकनीक और सुरक्षा सहयोग की महत्वपूर्ण भूमिका है। दोनों देशों की सरकारों के बीच राजनीतिक तालमेल से बड़े फैसलों को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है। लेकिन द्विपक्षीय संबंध केवल दो नेताओं की व्यक्तिगत दोस्ती पर निर्भर नहीं होते। इनके पीछे सरकारी संस्थान, समझौते, अधिकारी और लंबे समय से चल रहा सहयोग भी होता है।
इसलिए इजराइल में सरकार बदलने का मतलब यह नहीं कि भारत के साथ संबंध अचानक खत्म हो जाएंगे। हालांकि, नई सरकार की प्राथमिकताएं अलग हुईं या गठबंधन बनाने में लंबा समय लगा, तो कुछ प्रस्तावों और बातचीत की रफ्तार प्रभावित हो सकती है। भारत के लिए चुनौती यही है कि वह इजराइल के साथ अपने रणनीतिक रिश्ते मजबूत रखे और साथ ही पश्चिम एशिया के अन्य देशों के साथ संतुलन भी बनाए रखे।
Israel Elections Explained: 2. नेतन्याहू की सत्ता गई तो रक्षा सौदों पर क्या असर होगा?
रक्षा सहयोग भारत-इजराइल संबंधों का अहम हिस्सा है। भारत इजराइल से विभिन्न प्रकार की सैन्य तकनीक और रक्षा प्रणालियां हासिल करता रहा है। ऐसे में सरकार बदलने या गठबंधन वार्ता लंबी खिंचने की स्थिति में रक्षा सहयोग की निरंतरता पर नजर रहेगी।
हालांकि, किसी सरकार के बदलने से पहले से मंजूर हर रक्षा सौदे पर अपने आप रोक लग जाए, ऐसा जरूरी नहीं है। समझौतों की स्थिति, उनकी शर्तें, उत्पादन की प्रक्रिया और संबंधित संस्थानों के फैसले अहम होंगे। भारत के लिए असली सवाल यह होगा कि नई सरकार मौजूदा रक्षा सहयोग को किस प्राथमिकता से आगे बढ़ाती है और भविष्य के सौदों पर कितनी तेजी से फैसले लेती है।
3. भारत-इजराइल व्यापार और FTA पर क्या असर पड़ सकता है?
भारत और इजराइल के बीच व्यापार के साथ-साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सुरक्षा, कृषि और अन्य तकनीकी क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं हैं। मुक्त व्यापार समझौते यानी FTA से जुड़े प्रयास भी दोनों देशों के आर्थिक संबंधों के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं। सरकार बदलने पर व्यापार वार्ताओं की प्राथमिकताएं और रफ्तार प्रभावित हो सकती हैं। लेकिन केवल चुनावी नतीजों के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि समझौता रद्द हो जाएगा या बातचीत निश्चित रूप से महीनों के लिए रुक जाएगी। इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि नई सरकार भारत के साथ आर्थिक सहयोग को कितनी प्राथमिकता देती है और दोनों पक्ष वार्ता को आगे बढ़ाने के लिए कितने तैयार रहते हैं।
Israel Elections Explained: 4. ईरान का मुद्दा भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
इजराइल की नई सरकार की ईरान नीति भारत के लिए खास महत्व रख सकती है। इजराइल और ईरान के बीच तनाव बढ़ने से पश्चिम एशिया में सुरक्षा संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं। इसका असर ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं पर पड़ सकता है।
भारत के लिए ईरान इसलिए भी अहम है क्योंकि चाबहार बंदरगाह जैसी परियोजनाएं उसे पाकिस्तान से गुजरे बिना अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच बनाने का विकल्प देती हैं। हालांकि, इन परियोजनाओं का भविष्य केवल इजराइल की नीति से तय नहीं होता। अमेरिकी प्रतिबंध, भारत-ईरान के संबंध और क्षेत्रीय परिस्थितियां भी इसमें भूमिका निभाती हैं। अगर इजराइल-ईरान तनाव बढ़ता है, तो भारत के लिए अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों का संतुलन बनाए रखना और चुनौतीपूर्ण हो सकता है। वहीं, तनाव कम होने की स्थिति में क्षेत्रीय संपर्क और व्यापार के लिए अधिक गुंजाइश बन सकती है।
5. खाड़ी देशों और वहां रहने वाले भारतीयों पर क्या असर होगा?
भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र आर्थिक और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। यहां बड़ी संख्या में भारतीय रहते और काम करते हैं। भारत का खाड़ी देशों के साथ ऊर्जा, व्यापार और रोजगार से जुड़ा व्यापक संबंध है।
इजराइल और ईरान के बीच टकराव बढ़ने पर समुद्री मार्गों, जहाजरानी की लागत और क्षेत्रीय कारोबार पर दबाव पड़ सकता है। यदि तनाव होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों तक पहुंचता है, तो ऊर्जा आपूर्ति और व्यापार पर भी असर पड़ने का जोखिम होगा। इसका मतलब यह नहीं कि इजराइल में सरकार बदलते ही खाड़ी में रहने वाले भारतीयों पर सीधा असर पड़ेगा। जोखिम इस बात पर निर्भर करेगा कि नई सरकार की नीतियां क्षेत्रीय तनाव को किस दिशा में ले जाती हैं और दूसरे देश किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं। भारत के लिए इसलिए जरूरी है कि वह इजराइल के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग जारी रखते हुए खाड़ी देशों और ईरान के साथ अपने हितों का भी ध्यान रखे।

Israel Elections Explained: 6. क्या नेतन्याहू की हार से भारत को फायदा होगा या नुकसान?
इसका सीधा जवाब देना मुश्किल है। नेतन्याहू के साथ भारत के संबंधों में राजनीतिक तालमेल एक महत्वपूर्ण पहलू रहा है। लेकिन भारत-इजराइल संबंध केवल एक नेता पर निर्भर नहीं हैं। नई सरकार भी अगर रक्षा, तकनीक और व्यापार सहयोग को प्राथमिकता देती है, तो मौजूदा संबंध आगे बढ़ सकते हैं।
दूसरी ओर, सरकार बनाने में लंबा समय लगने या गठबंधन के भीतर मतभेद होने से कुछ नीतिगत फैसलों में देरी हो सकती है। इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन-सी सरकार बनती है, उसकी प्राथमिकताएं क्या होती हैं और वह ईरान सहित क्षेत्रीय मुद्दों पर क्या रुख अपनाती है। इसलिए नेतन्याहू की हार को भारत के लिए सीधे फायदा या नुकसान मानना जल्दबाजी होगी। भारत को चुनाव के अंतिम नतीजों के साथ-साथ नई सरकार के नीतिगत संकेतों पर भी नजर रखनी होगी।
7. ‘हंग नेसेट’ भारत के लिए क्या मायने रखता है?
जब किसी एक गुट को सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत नहीं मिलता, तो गठबंधन बनाने के लिए दूसरे दलों का समर्थन जुटाना पड़ता है। इजराइल में शुरुआती नतीजों के बाद यही स्थिति दिखाई दी। अरब दलों को मिलने वाली सीटें भी सरकार गठन की बातचीत में महत्वपूर्ण हो सकती हैं, हालांकि उनके साथ गठबंधन करना दूसरे दलों के लिए राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। अगर सरकार गठन में देरी होती है, तो भारत को बड़े नीतिगत फैसलों पर स्पष्टता आने तक इंतजार करना पड़ सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पहले से चल रहा हर समझौता रुक जाएगा। असर अलग-अलग क्षेत्रों और समझौतों की स्थिति के अनुसार अलग हो सकता है।
Israel Elections Explained: भारत की नजर चुनाव से आगे, नई सरकार की नीतियों पर
इजराइल के चुनाव भारत के लिए इसलिए अहम हैं क्योंकि उनका संबंध रक्षा सहयोग, व्यापार, ईरान और खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता से जुड़ता है। नेतन्याहू की सत्ता बनी रहती है या विपक्ष सरकार बनाने में सफल होता है- दोनों ही स्थितियों में भारत को नई राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार अपनी कूटनीति चलानी होगी। भारत के लिए असली कसौटी सिर्फ यह नहीं कि इजराइल का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा, बल्कि यह भी है कि नई सरकार रक्षा सहयोग, आर्थिक साझेदारी और पश्चिम एशिया के तनाव पर क्या रुख अपनाती है।
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