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जामिया में क्यों भड़का विवाद? 20 साल से छात्र संघ चुनाव क्यों नहीं हुए, समझिए पूरा मामला

Jamia Controversy Explainer: दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में छात्र संघ चुनाव की मांग को लेकर चल रहा प्रदर्शन कथित विवादित नारों के बाद राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। विश्वविद्यालय की दीवारों पर लिखे गए नारों को लेकर प्रशासन ने कार्रवाई की बात कही है, जबकि प्रदर्शनकारी छात्रों का आरोप है कि विवाद के जरिए उनके आंदोलन से ध्यान भटकाया जा रहा है। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद के छात्रों से मिलने पहुंचने और पुलिस द्वारा उन्हें हिरासत में लिए जाने की खबर के बाद BJP और कांग्रेस के बीच भी बयानबाजी तेज हो गई है। लेकिन इस पूरे विवाद की जड़ क्या है? छात्र संघ चुनाव की मांग क्यों उठ रही है और करीब दो दशक से चुनाव क्यों नहीं हुए? आइए, सवाल-जवाब में समझते हैं पूरा मामला।

जामिया में अचानक विवाद क्यों बढ़ गया?

जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्र संघ चुनाव कराने की मांग को लेकर छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं। इसी दौरान विश्वविद्यालय परिसर की दीवारों पर कथित आपत्तिजनक नारे लिखे जाने का मामला सामने आया। इसके बाद विवाद ने तूल पकड़ लिया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने घटना पर नाराजगी जताते हुए जिम्मेदार लोगों की पहचान कर कार्रवाई करने की बात कही। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारी छात्रों का आरोप है कि कथित नारों के विवाद से छात्र संघ चुनाव की उनकी मांग को पीछे धकेलने की कोशिश हो रही है। नारों को किसने लिखा और इसके लिए कौन जिम्मेदार है, यह स्पष्ट नहीं हुआ है। इसलिए जांच पूरी होने से पहले किसी संगठन या व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।

Jamia Controversy Explainer: छात्र संघ चुनाव को लेकर छात्रों की क्या मांगें हैं?

छात्रों की मांग है कि विश्वविद्यालय में छात्र संघ चुनाव की तारीख जल्द घोषित की जाए और मौजूदा शैक्षणिक सत्र में चुनाव कराए जाएं। प्रदर्शनकारी छात्रों की तीन प्रमुख मांगें हैं: छात्र संघ चुनाव कराने की तारीख घोषित की जाए। प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई वापस ली जाए।सिक्योरिटी एडवाइजर और चीफ प्रॉक्टर को उनके पदों से हटाया जाए। छात्रों का कहना है कि छात्र संघ उनके प्रतिनिधित्व का माध्यम है। इसके जरिए वे अपनी समस्याएं विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने रख सकते हैं। उनका तर्क है कि चुनाव नहीं होने से विद्यार्थियों को अपनी सामूहिक आवाज उठाने के लिए निर्वाचित मंच नहीं मिल पा रहा है।

विश्वविद्यालय प्रशासन ने क्या जवाब दिया?

छात्रों की मांगों पर विश्वविद्यालय की हाईलेवल कमेटी ने छात्र संघ का संविधान तैयार करने के लिए ड्राफ्ट कमेटी गठित करने की बात कही है। प्रशासन का तर्क है कि चुनाव कराने से पहले छात्र संघ का संविधान और जरूरी नियम तय करना आवश्यक है। कमेटी ने 12 अक्टूबर के बाद की गई अनुशासनात्मक कार्रवाइयों की समीक्षा करने की बात भी कही है। साथ ही, छात्रों से प्रदर्शन समाप्त कर चुनाव की प्रक्रिया में सहयोग करने की अपील की गई है।प्रदर्शनकारी छात्र इससे संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए दो महीने का समय देने की बात कही गई है, लेकिन चुनाव की कोई निश्चित तारीख घोषित नहीं की गई। यही इस विवाद का एक प्रमुख सवाल है: क्या संविधान तैयार करने की प्रक्रिया के साथ चुनाव की समयसीमा भी घोषित की जा सकती है? इस पर प्रशासन और छात्रों के बीच मतभेद बना हुआ है।

Jamia Controversy Explainer
                                                                  Jamia Controversy Explainer
Jamia Controversy Explainer: जासिम अली खान क्यों कर रहे हैं भूख हड़ताल?

छात्र संघ चुनाव की मांग को लेकर कुछ छात्र भूख हड़ताल पर भी बैठे हैं। प्रदर्शनकारी जासिम अली खान के मुताबिक, वह 13 दिनों से भूख हड़ताल कर रहे थे। जासिम का कहना है कि प्रशासन ने दो महीने में संविधान का मसौदा तैयार करने की बात कही है, लेकिन चुनाव की तारीख नहीं बताई। छात्रों का तर्क है कि संविधान बनाने की प्रक्रिया में उन्हें भी शामिल किया जा सकता है, ताकि चुनाव की दिशा में जल्द आगे बढ़ा जा सके। प्रदर्शनकारियों ने विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ-साथ विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) और शिक्षा मंत्रालय से भी हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि उनकी मांगों पर समयबद्ध फैसला होना चाहिए।

 दीवारों पर लिखे नारों को लेकर ABVP ने क्या कहा?

विश्वविद्यालय की दीवारों पर कथित विवादित नारे लिखे जाने के मामले में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। संगठन का कहना है कि छात्र संघ की बहाली की मांग लोकतांत्रिक तरीके से उठाई जानी चाहिए और नफरत फैलाने वाली गतिविधियों को स्वीकार नहीं किया जा सकता। विश्व हिंदू परिषद के प्रवक्ता विनोद बंसल ने भी मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन से कार्रवाई की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसी घटनाओं से शैक्षणिक संस्थान की छवि प्रभावित होती है। दूसरी तरफ, प्रदर्शनकारी छात्रों का दावा है कि कथित नारों का विवाद उनके चुनाव संबंधी आंदोलन से ध्यान हटाने का कारण बन रहा है। फिलहाल यह स्पष्ट होना बाकी है कि नारे किसने लिखे थे।

Jamia Controversy Explainer: BJP और कांग्रेस के बीच सियासी घमासान क्यों बढ़ा?

कथित विवादित नारों के सामने आने के बाद मामला विश्वविद्यालय परिसर से निकलकर राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया। BJP और उससे जुड़े संगठनों के नेताओं ने नारों की जांच और कार्रवाई की मांग की, जबकि प्रदर्शनकारी छात्रों और उनके समर्थन में आए कुछ नेताओं ने छात्र संघ चुनाव के मुद्दे को प्राथमिकता देने पर जोर दिया।

केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने भी विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए शाहीन बाग आंदोलन का जिक्र किया। वहीं, AIMIM की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष डॉ. शोएब जमई ने आरोप लगाया कि छात्र संघ आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। इन बयानों से विवाद को राजनीतिक रंग मिला है। हालांकि, अलग-अलग नेताओं के आरोप और दावे अपने-अपने पक्ष हैं; इन्हें जांच में सामने आए तथ्यों से अलग रखकर देखना जरूरी है।

इमरान मसूद जामिया क्यों पहुंचे और उन्होंने क्या कहा?

कांग्रेस सांसद इमरान मसूद प्रदर्शनकारी छात्रों से मिलने जामिया पहुंचे थे। खबर के मुताबिक, मुलाकात के बाद दिल्ली पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया। मसूद ने कथित तौर पर कहा कि प्रदर्शन के दौरान ‘आजाद कश्मीर’ के समर्थन में कोई नारा नहीं लगाया गया। उन्होंने ऐसे नारों का समर्थन नहीं करने और कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानने की बात कही। उन्होंने यह भी दावा किया कि कश्मीर से जुड़े पोस्टर लगाने वाले लोगों का छात्र संघ चुनाव आंदोलन से संबंध नहीं था और पुलिस को उनके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। मसूद के बयान के बाद विवाद पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और तेज हुईं। हालांकि, उनकी हिरासत की वजह और परिस्थितियों की पुष्टि के लिए पुलिस का आधिकारिक पक्ष भी देखना जरूरी है।

Jamia Controversy Explainer: जामिया में आखिरी बार छात्र संघ चुनाव कब हुए थे?

इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू छात्र संघ चुनाव का इतिहास है। उपलब्ध कराई गई रिपोर्ट के मुताबिक, जामिया में आखिरी बार छात्र संघ चुनाव 2005 में हुए थे। इसके बाद 31 मार्च 2006 को विश्वविद्यालय प्रशासन ने परिसर में हिंसा, गड़बड़ी और पढ़ाई प्रभावित होने का हवाला देते हुए निर्वाचित छात्र संघ इकाई को भंग कर दिया था। इसके बाद छात्र संघ की बहाली की मांग अलग-अलग समय पर उठती रही। रिपोर्ट के अनुसार, 2012 में दिल्ली हाई कोर्ट में भी चुनाव कराने की मांग को लेकर याचिका दायर की गई थी। इस तरह छात्र संघ चुनाव का सवाल केवल मौजूदा प्रदर्शन तक सीमित नहीं है। यह विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों के प्रतिनिधित्व और प्रशासन के साथ उनके संवाद से जुड़ा पुराना मुद्दा है।

अब आगे क्या हो सकता है?

आगे की स्थिति मुख्य रूप से तीन बातों पर निर्भर करेगी: विश्वविद्यालय प्रशासन छात्र संघ के संविधान का मसौदा कब तक तैयार करता है। चुनाव की तारीख या संभावित समयसीमा कब घोषित होती है। प्रदर्शनकारी छात्रों की अनुशासनात्मक कार्रवाई और पदाधिकारियों को हटाने संबंधी मांगों पर क्या फैसला होता है। यदि प्रशासन चुनाव की प्रक्रिया और समयसीमा को स्पष्ट करता है, तो गतिरोध कम करने का रास्ता निकल सकता है। दूसरी ओर, यदि छात्रों को ठोस आश्वासन नहीं मिलता है, तो आंदोलन जारी रहने की संभावना बनी रहेगी।

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