Jantar Mantar Protest: ‘ज्ञानेश, इट्स डन ब्रो’ के नारे के साथ राहुल गांधी का चुनाव आयोग के खिलाफ सड़क पर उतरना महज एक दिन का प्रदर्शन नहीं है। विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और ‘वोट चोरी’ के आरोपों को एक बड़े राजनीतिक अभियान में बदल दिया है। सवाल है कि राहुल गांधी इस मुद्दे को लगातार क्यों आगे बढ़ा रहे हैं और इसके पीछे विपक्ष की रणनीति क्या है?
‘ज्ञानेश, इट्स डन ब्रो’ से क्या संदेश देना चाहते हैं राहुल?
राहुल गांधी लंबे समय से चुनाव प्रक्रिया और वोटर लिस्ट में कथित गड़बड़ियों को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। अब उनका निशाना सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर है। विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं और निष्पक्ष चुनाव को लेकर संदेह पैदा हुआ है। वहीं चुनाव आयोग इन आरोपों को खारिज करता रहा है। ऐसे में यह लड़ाई सिर्फ चुनावी प्रक्रिया की नहीं, बल्कि उसके इर्द-गिर्द बने राजनीतिक और सार्वजनिक नैरेटिव की भी बन गई है।
Jantar Mantar Protest: आखिर ‘वोट चोरी’ इतना बड़ा मुद्दा कैसे बना?
राहुल गांधी ने महाराष्ट्र, हरियाणा और कर्नाटक समेत अलग-अलग चुनावों में वोटर लिस्ट और चुनाव प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए। उनके आरोपों में डुप्लीकेट वोटर, एक पते पर बड़ी संख्या में मतदाता और मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं जैसे मुद्दे शामिल रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि ऐसी गड़बड़ियां चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती हैं। चुनाव आयोग ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया है और अपनी प्रक्रियाओं का बचाव किया है। यही वजह है कि ‘वोट चोरी’ अब विपक्ष के लिए सिर्फ एक चुनावी आरोप नहीं, बल्कि चुनावी व्यवस्था पर बहस का राजनीतिक मुद्दा बन गया है।
राहुल गांधी के निशाने पर ज्ञानेश कुमार ही क्यों?
विपक्ष का तर्क है कि मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यकाल में देश के कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल जनवरी 2029 तक है। इसलिए विपक्ष उनकी भूमिका और चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाकर इसे आने वाले चुनावों से जोड़ रहा है। हालांकि, यह विपक्ष की राजनीतिक व्याख्या है; किसी आगामी चुनाव के नतीजे या उसकी निष्पक्षता को लेकर अभी निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

Jantar Mantar Protest: शिवसेना-NCP से TMC तक क्यों जोड़ा जा रहा है मुद्दा?
विपक्ष चुनाव आयोग के पुराने फैसलों को भी अपने आरोपों के समर्थन में सामने ला रहा है। शिवसेना में विभाजन के बाद चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे गुट को ‘धनुष-बाण’ चुनाव निशान दिया, जबकि उद्धव ठाकरे गुट को ‘मशाल’ मिली। इसी तरह NCP के विभाजन के बाद अजित पवार गुट को ‘घड़ी’ चुनाव निशान मिला। राहुल गांधी और विपक्ष इन फैसलों को चुनाव आयोग पर कथित पक्षपात के आरोपों से जोड़ते हैं। दूसरी ओर चुनाव आयोग के ऐसे फैसले चुनाव चिह्न और संबंधित कानूनों के तहत लिए गए निर्णयों के रूप में सामने रखे गए हैं।
राहुल गांधी के 4 बड़े राजनीतिक मकसद क्या हो सकते हैं?
1. ‘वोट चोरी’ अभियान का चेहरा बनना
राहुल गांधी ने अगस्त 2025 में महादेवपुरा सीट को लेकर चुनावी अनियमितताओं के आरोप लगाए थे। इसके बाद उन्होंने हरियाणा और महाराष्ट्र चुनावों को लेकर भी सवाल उठाए। अब यही मुद्दा व्यापक राजनीतिक अभियान का रूप ले चुका है। ऐसे में राहुल गांधी खुद को इस अभियान के प्रमुख चेहरे के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिस नेता ने किसी मुद्दे को सबसे पहले लगातार उठाया हो, उसके पास उस आंदोलन की राजनीतिक दिशा तय करने का अवसर रहता है। हालांकि इसका राजनीतिक असर कितना होगा, यह आने वाले समय और चुनावी परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

2. विपक्षी दलों को एक मुद्दे पर साथ लाना
INDIA गठबंधन में कई मुद्दों पर अलग-अलग दलों की प्राथमिकताएं रही हैं। लेकिन चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े सवाल ऐसा मुद्दा है, जिस पर कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल चुनाव आयोग से जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।
राहुल गांधी के लिए यह मुद्दा विपक्षी दलों को एक साझा मंच पर लाने का जरिया भी है। प्रदर्शन में अलग-अलग विपक्षी दलों के नेताओं की मौजूदगी इसी तस्वीर को सामने रखती है। हालांकि AAP और DMK जैसे दलों की अनुपस्थिति यह भी दिखाती है कि विपक्ष पूरी तरह एकजुट नहीं है।
3. युवाओं और आम मतदाताओं तक पहुंच बनाना
SIR, Form-6 और वोटर लिस्ट जैसी तकनीकी बहस आम मतदाता के लिए जटिल हो सकती है। राहुल गांधी ने इन्हें ‘वोट चोरी’ और ‘सेव माय वोट’ जैसे आसान नारों से जोड़ने की कोशिश की है। इससे मुद्दे को तकनीकी चुनावी प्रक्रिया से निकालकर सीधे मतदाता के अधिकार से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है। लेकिन यहां भी एक बड़ा सवाल है- क्या राजनीतिक नारे और सड़क पर जुटने वाली भीड़ चुनावी समर्थन में बदलती है? इसका जवाब किसी एक प्रदर्शन से नहीं, बल्कि आगे के चुनावी परिणामों से ही मिलेगा।
4. चुनाव आयोग और बीजेपी को लेकर नैरेटिव की लड़ाई
विपक्ष बीजेपी की चुनावी सफलता और चुनाव आयोग की भूमिका को एक साथ जोड़कर सवाल उठा रहा है। इसका उद्देश्य केवल आयोग पर दबाव बनाना नहीं, बल्कि चुनावी राजनीति को लेकर एक वैकल्पिक नैरेटिव तैयार करना भी है।
बीजेपी इसका विरोध कर रही है। बीजेपी नेता संबित पात्रा ने विपक्ष के प्रदर्शन को राजनीतिक अभियान बताते हुए आरोप लगाया कि कांग्रेस SIR का विरोध कर मतदाता सूची में मृत लोगों के नाम बनाए रखना चाहती है। इस तरह ‘वोट चोरी’ के आरोप के जवाब में बीजेपी ने भी मतदाता सूची की शुद्धता और SIR को अपना प्रमुख तर्क बनाया है।
क्या विपक्ष पूरी तरह एकजुट है?
नहीं, प्रदर्शन में सभी विपक्षी दल एक साथ नहीं दिखे। AAP और DMK की गैरमौजूदगी बताती है कि INDIA गठबंधन के भीतर भी राजनीतिक प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं।इसलिए ‘वोट चोरी’ का मुद्दा विपक्ष को एक मंच पर लाने में मदद जरूर कर रहा है, लेकिन इसे पूरी तरह एकजुट विपक्ष का प्रमाण मानना सही नहीं होगा।
Jantar Mantar Protest: क्या राहुल गांधी के आरोप साबित हो चुके हैं?
यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। राहुल गांधी और विपक्ष चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप लगा रहे हैं, लेकिन आरोप और न्यायिक रूप से स्थापित तथ्य अलग चीजें हैं। चुनाव आयोग इन आरोपों को खारिज करता रहा है।
वहीं सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित मामलों में रिकॉर्ड और जवाब मांगे हैं। Form-6 में कथित बदलाव को लेकर भी कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि जिस विशेष ऑनलाइन फॉर्म में बदलाव की बात है, उसकी मंजूरी कोर्ट ने नहीं दी थी और संबंधित रिकॉर्ड मांगे गए हैं। इसलिए फिलहाल मामले का न्यायिक परीक्षण पूरा नहीं हुआ है। आगे कोर्ट के रुख से यह स्पष्ट होगा कि लगाए गए आरोपों में कानूनी रूप से क्या आधार पाया जाता है।
क्या ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे से मामला खत्म हो जाएगा?
विपक्ष की मांग इस्तीफे तक पहुंच चुकी है, लेकिन इस्तीफा होना या न होना अलग राजनीतिक और संवैधानिक प्रश्न है। अगर इस्तीफा नहीं होता है तो विपक्ष के पास आंदोलन जारी रखने का मुद्दा रहेगा। अगर इस्तीफा होता है तो विपक्ष इसे अपने आरोपों की राजनीतिक जीत के तौर पर पेश कर सकता है। हालांकि इस्तीफा अपने आप में चुनावी गड़बड़ी के आरोपों को साबित नहीं करता। उसके लिए अलग से तथ्य, जांच और न्यायिक निष्कर्ष जरूरी होंगे।
Jantar Mantar Protest: अब आगे क्या करेगा विपक्ष?
कांग्रेस ने ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ अभियान को आगे बढ़ाने का कार्यक्रम घोषित किया है। ब्लॉक स्तर पर साइकिल और मोटरसाइकिल अभियान, चौपाल, दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली और नवंबर में ‘चलो दिल्ली’ मार्च जैसे कार्यक्रम प्रस्तावित हैं।यानी मामला एक दिन के प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहने वाला है। कांग्रेस इसे संसद के शीतकालीन सत्र तक राजनीतिक मुद्दा बनाए रखने की कोशिश कर रही है।
सुप्रीम कोर्ट के रुख पर क्यों टिकी नजर?
पूरे विवाद में अब अदालत की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। विपक्ष चुनाव आयोग के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच और जवाब मांग रहा है, जबकि चुनाव आयोग अपने फैसलों और प्रक्रियाओं का बचाव कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित रिकॉर्ड और जवाब मांगे हैं। इसलिए आगे की कानूनी कार्यवाही यह तय करने में महत्वपूर्ण होगी कि विपक्ष के आरोपों में कितना तथ्यात्मक और कानूनी आधार है।
कुल मिलाकर, ‘वोट चोरी’ राहुल गांधी के लिए सिर्फ चुनावी गड़बड़ी का आरोप नहीं रह गया है। यह चुनाव आयोग की विश्वसनीयता, विपक्ष की एकजुटता, मतदाता सूची और आने वाले चुनावों के नैरेटिव से जुड़ा बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है।









