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सपेरा समाज से ‘वोट बैंक’ तक, योगी का घुमंतू कार्ड कितना बड़ा? बोर्ड से आवास तक, समझिए पूरा सियासी गणित

MATHURA NEWS IN YOGI: उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय और सामाजिक समीकरण हमेशा से चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा रहे हैं। अब योगी आदित्यनाथ सरकार ने विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदायों को लेकर एक बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया है। घुमंतू विकास बोर्ड के गठन के साथ सरकार का दावा है कि इन समुदायों को सरकारी योजनाओं से जोड़ने, उनके पुनर्वास, शिक्षा, आवास और आजीविका की समस्याओं पर काम करने के लिए एक संस्थागत व्यवस्था तैयार होगी।

लखनऊ में आयोजित आभार कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साफ कहा कि सरकार के लिए जनता केवल वोट बैंक नहीं, बल्कि परिवार और जनार्दन है। कार्यक्रम में सपेरा समाज ने पारंपरिक बीन बजाकर मुख्यमंत्री का स्वागत किया। ऐसे में सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि घुमंतू विकास बोर्ड क्या करेगा, बल्कि यह भी है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह फैसला सामाजिक और राजनीतिक रूप से कितना महत्वपूर्ण हो सकता है?

पहले समझिए, कौन हैं विमुक्त और घुमंतू समुदाय?

विमुक्त और घुमंतू समुदायों में ऐसे कई समूह शामिल हैं जिनकी पारंपरिक आजीविका घूम-घूमकर काम करने, पशुपालन, लोककला, प्रदर्शन, हस्तशिल्प या छोटे-मोटे व्यवसायों से जुड़ी रही है। इनमें अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में सपेरा, नट, बंजारा, जोगी समेत कई समुदायों के अलग-अलग नाम और सामाजिक वर्गीकरण मिलते हैं। इसलिए पूरे समूह को एक ही जाति या एक ही श्रेणी मानना सही नहीं होगा। इन समुदायों की एक बड़ी समस्या यह रही है कि स्थायी आवास, पहचान संबंधी दस्तावेज, शिक्षा, स्वास्थ्य और सरकारी योजनाओं तक पहुंच कई जगह चुनौती बनी रही।

MATHURA NEWS IN YOGI: सपेरा समाज का इतिहास: बीन से लेकर सामाजिक पहचान तक

सपेरा समाज की पहचान पारंपरिक रूप से सांप पकड़ने, सांपों के प्रदर्शन, बीन वादन और लोक परंपराओं से जुड़ी रही है। हालांकि आधुनिक कानूनों और वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था में सांप पकड़ने तथा वन्यजीवों के साथ पारंपरिक प्रदर्शन पर रोक ने इस समुदाय की पुरानी आजीविका को प्रभावित किया। इसके बाद सवाल पैदा हुआ कि जिन परिवारों की पीढ़ियों की रोजी-रोटी पारंपरिक पेशे से जुड़ी थी, वे बदलती अर्थव्यवस्था में किस तरह नई आजीविका हासिल करें? यही वजह है कि आज सपेरा समाज की चर्चा केवल उसकी पारंपरिक पहचान तक सीमित नहीं है। मुद्दा अब आवास, शिक्षा, रोजगार, दस्तावेज, सामाजिक सुरक्षा और सम्मानजनक पुनर्वास का भी है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में सपेरा समाज का संबंध गुरु गोरखनाथ की परंपरा से जोड़ते हुए उसके सामाजिक योगदान का उल्लेख किया और कहा कि सरकार इनके सम्मानजनक पुनर्वास और समग्र विकास के लिए काम करेगी।

1871 का कानून और ‘क्रिमिनल ट्राइब’ का दाग

घुमंतू और विमुक्त समुदायों की सामाजिक स्थिति समझने के लिए ब्रिटिश शासन का इतिहास महत्वपूर्ण है। ब्रिटिश सरकार ने 1871 में Criminal Tribes Act लागू किया था। इसके तहत कई समुदायों को औपनिवेशिक प्रशासन ने ‘क्रिमिनल ट्राइब्स’ के रूप में वर्गीकृत किया। स्वतंत्रता के बाद इस व्यवस्था को समाप्त किया गया और इन समुदायों को ‘विमुक्त’ यानी de-notified communities के रूप में जाना गया। आज भी इन समुदायों के प्रतिनिधि यह सवाल उठाते रहे हैं कि कानूनी तौर पर वह कलंक खत्म होने के बावजूद सामाजिक और आर्थिक स्तर पर उसका असर पूरी तरह समाप्त क्यों नहीं हुआ।

केंद्र सरकार ने भी विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदायों के लिए अलग संस्थागत व्यवस्था बनाई है। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अनुसार, 2019 में Development and Welfare Board for De-notified, Nomadic and Semi-Nomadic Communities (DWBDNC) का गठन किया गया और SEED योजना के तहत शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और आवास पर काम किया जा रहा है।

MATHURA NEWS IN YOGI: योगी सरकार का घुमंतू विकास बोर्ड क्या बदलेगा?

उत्तर प्रदेश में घुमंतू विकास बोर्ड को लेकर सरकार की दलील है कि अलग बोर्ड बनने से इन समुदायों की समस्याओं को एक केंद्रित मंच मिलेगा। मुख्यमंत्री के मुताबिक बोर्ड में विभिन्न विमुक्त और घुमंतू जातियों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की कोशिश होगी, ताकि उनकी आवाज सरकार तक सीधे पहुंच सके और अलग-अलग विभागों की योजनाओं का लाभ उन्हें प्रभावी ढंग से मिल सके। यानी बोर्ड का महत्व सिर्फ एक नई सरकारी संस्था बनने में नहीं, बल्कि पहचान और सरकारी योजनाओं के बीच एक पुल बनने में है।

मथुरा में सपेरा परिवारों को आवास जमीन पर दिखता असर

घुमंतू समाज को लेकर सरकार का दूसरा महत्वपूर्ण संदेश मथुरा-वृंदावन कार्यक्रम में दिखाई दिया। जन्माष्टमी से पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 1,051 करोड़ रुपये की 229 विकास परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया। इसी कार्यक्रम में मुख्यमंत्री आवास योजना ग्रामीण के तहत 180 सपेरा समुदाय के लाभार्थियों को 1.20 लाख रुपये की सहायता दिए जाने की बात सामने आई। यहीं से सरकारी नीति का एक महत्वपूर्ण पहलू दिखाई देता है. घुमंतू समुदाय को केवल सांस्कृतिक पहचान देने के बजाय स्थायी आवास और सरकारी योजनाओं से जोड़ने की कोशिश। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने छोटे बच्चों का अन्नप्राशन कराया और महिलाओं की गोदभराई भी की। इस तरह राजनीतिक भाषण, सरकारी योजना और सामाजिक प्रतीक तीनों एक ही मंच पर दिखाई दिए।

MATHURA NEWS IN YOGI: अब आते हैं सबसे बड़े सवाल पर- 2027 के चुनाव में क्या फायदा?

उत्तर प्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव 2027 में होना है। ऐसे में किसी भी बड़े सामाजिक समूह से जुड़ी सरकारी पहल के राजनीतिक मायने तलाशना स्वाभाविक है। घुमंतू और विमुक्त समुदायों को लेकर सरकार की रणनीति के संभावित राजनीतिक असर को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है।

पहला- प्रतिनिधित्व

अलग बोर्ड बनने से समुदाय को यह संदेश मिल सकता है कि उसकी समस्याओं के लिए सरकार के भीतर एक विशेष मंच मौजूद है।

दूसरा- लाभार्थी राजनीति

अगर आवास, राशन, स्वास्थ्य, बिजली, गैस, पेंशन, शिक्षा और आजीविका जैसी योजनाओं का वास्तविक लाभ इन परिवारों तक पहुंचता है तो सरकार के प्रति सकारात्मक धारणा बन सकती है।

तीसरा- सामाजिक पहचान

किसी समुदाय के महापुरुषों, परंपराओं और ऐतिहासिक भूमिका को सरकारी मंच से सम्मान मिलना राजनीतिक प्रतिनिधित्व की भावना को मजबूत कर सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पूरा समुदाय किसी एक राजनीतिक दल के पक्ष में चला जाएगा। किसी भी समुदाय को एकसमान वोट बैंक मानना चुनावी राजनीति को जरूरत से ज्यादा सरल बना देना होगा।

बीजेपी के लिए यह रणनीति क्यों महत्वपूर्ण हो सकती है?

उत्तर प्रदेश में राजनीति लंबे समय से बड़े जातीय समूहों के साथ-साथ छोटे और अति-पिछड़े तथा वंचित समुदायों तक पहुंच बनाने पर भी निर्भर रही है। बीजेपी के लिए विमुक्त और घुमंतू समुदायों के बीच पहुंच बढ़ाने की कोशिश का महत्व इसलिए हो सकता है क्योंकि इन समुदायों को लंबे समय तक मुख्यधारा की राजनीति में अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व मिलने की शिकायत रही है। घुमंतू विकास बोर्ड इसी नैरेटिव को आगे बढ़ाने का प्रयास माना जा सकता है—‘जिन्हें राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में पर्याप्त जगह नहीं मिली, उन्हें संस्थागत प्रतिनिधित्व देना।’

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MATHURA NEWS IN YOGI: लेकिन असली परीक्षा बोर्ड बनने के बाद होगी

राजनीतिक घोषणा और जमीन पर बदलाव के बीच बड़ा अंतर होता है। बोर्ड बनने के बाद सबसे बड़ा सवाल होगा कि कितने परिवारों को वास्तव में स्थायी आवास मिला? कितने बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित हुई? कितने परिवारों को रोजगार या आजीविका मिली? कितने लोगों के दस्तावेज बने? कितने परिवार स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जुड़े? केंद्र सरकार के स्तर पर भी DNT/NT/SNT समुदायों के लिए SEED जैसी योजनाएं चल रही हैं, जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और आवास शामिल हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश के बोर्ड की प्रभावशीलता इस बात से भी तय होगी कि वह केंद्र और राज्य की मौजूदा योजनाओं को जमीनी स्तर पर कितना प्रभावी ढंग से जोड़ पाता है।

‘वोट बैंक नहीं, परिवार’- नारा या नई सामाजिक राजनीति?

योगी आदित्यनाथ का ‘वोट बैंक नहीं, परिवार’ वाला संदेश राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। इसका उद्देश्य यह दिखाना है कि सरकार किसी समुदाय को केवल चुनावी गणित की नजर से नहीं देखती, बल्कि उसके सामाजिक और आर्थिक पुनर्वास को शासन की जिम्मेदारी मानती है। लेकिन लोकतंत्र में किसी भी सरकार की असली परीक्षा भाषण से नहीं, नीतियों के परिणाम और लाभार्थियों के अनुभव से होती है।

घुमंतू समाज के लिए बोर्ड, आवास और सरकारी योजनाओं तक पहुंच अगर वास्तविक सामाजिक बदलाव में बदलती है, तो यह सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं रहेगा। यह उत्तर प्रदेश की सामाजिक राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत हो सकता है।

और अगर इसका असर केवल चुनावी मंचों और घोषणाओं तक सीमित रहा, तो 2027 का चुनाव ही बताएगा कि ‘घुमंतू से टिकंतू’ बनाने का दावा जमीन पर कितना बदला और कितना सिर्फ राजनीतिक संदेश बनकर रह गया।

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