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शिवराज के तेवर, मोहन यादव की चुप्पी और कांग्रेस का ‘मोहन-मामा’ तंज… MP में क्या चल रहा है?

MOHAN YADAV NEWS: मध्य प्रदेश में आदिवासियों के घरों पर बुलडोजर चलने से शुरू हुआ विवाद अब सियासी चर्चा का विषय बन गया है। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए प्रभावित परिवारों के साथ धरना दिया। उसी दिन उन्होंने लाड़ली बहना योजना को लेकर भी बड़ा बयान दिया। कांग्रेस ने इसे मुख्यमंत्री मोहन यादव और शिवराज के बीच खींचतान से जोड़ दिया। हालांकि, दोनों नेताओं के बीच किसी सीधे टकराव की पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में सवाल है कि शिवराज के विरोध के क्या मायने हैं और प्रदेश भाजपा की राजनीति में इसके क्या संकेत दिख रहे हैं?

रविवार को सीहोर जिले के कोसमी गांव में बरेला आदिवासी समुदाय के 12 घरों को गिरा दिया गया। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस कार्रवाई को ‘जुल्म की पराकाष्ठा’ बताते हुए प्रभावित परिवारों के साथ धरना दिया। उन्होंने अधिकारियों के रवैये पर नाराजगी जताई और सवाल उठाया कि जब उन्होंने परिवारों को नहीं हटाने के लिए कहा था, तब भी कार्रवाई कैसे हुई?

शिवराज बोले – लाडली बहना योजना नहीं होगी 

इसी दिन रायसेन जिले के भोजपुर में शिवराज ने लाड़ली बहना योजना को लेकर कहा कि अब कोई भी सरकार इसे बंद नहीं कर पाएगी। उनके इस बयान के बाद कांग्रेस ने मुख्यमंत्री मोहन यादव और शिवराज के बीच कथित खींचतान का मुद्दा उठा दिया। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने आरोप लगाया कि ‘मोहन-मामा’ की आपसी खींचतान का खामियाजा आदिवासी परिवारों को भुगतना पड़ रहा है। अब सवाल यह है कि क्या शिवराज अपनी ही पार्टी की सरकार के फैसलों पर सवाल उठा रहे हैं, या फिर इन बयानों के पीछे कोई बड़ा राजनीतिक संदेश है? आइए, मध्य प्रदेश की इस सियासत को सवाल-जवाब के जरिए समझते हैं।

MOHAN YADAV NEWS: आदिवासी परिवारों के घरों पर कार्रवाई कैसे हुई?

जवाब: इस विवाद की एक अहम कड़ी यह है कि शिवराज के मुताबिक, उन्होंने अधिकारियों को पहले ही परिवारों को नहीं हटाने के लिए कहा था। दूसरी ओर, वन विकास निगम का दावा है कि बेदखली की प्रक्रिया लंबे समय से चल रही थी। निगम के अनुसार, कोसमी में वर्ष 2021 में पौधरोपण कराया गया था। कुछ आदिवासी परिवारों पर पौधों को नुकसान पहुंचाने, जमीन पर खेती करने और झोपड़ियां बनाने के आरोप लगाए गए। निगम का कहना है कि संबंधित परिवारों के खिलाफ वन अपराध दर्ज किए गए थे और बेदखली के नोटिस भी जारी किए गए थे।

शिवराज का कहना है कि उन्होंने कार्रवाई से पहले ही अधिकारियों को परिवारों को नहीं हटाने के निर्देश दिए थे। रविवार को मौके पर पहुंचने के बाद उन्होंने मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल से फोन पर बात की। मौके पर वन विभाग या प्रशासन के किसी वरिष्ठ अधिकारी के मौजूद नहीं होने पर भी उन्होंने नाराजगी जताई।

इस मामले में एक अहम सवाल यह है कि शिवराज की ओर से दिए गए निर्देशों का प्रशासनिक स्तर पर क्या अर्थ निकाला गया और कार्रवाई रोकने के संबंध में कोई औपचारिक आदेश जारी हुआ था या नहीं। इसलिए एक तरफ शिवराज के निर्देशों की अनदेखी का सवाल है, तो दूसरी तरफ वन विकास निगम अपनी पुरानी प्रक्रिया और जारी किए गए नोटिसों का हवाला दे रहा है। मामले की जांच से ही इन पहलुओं पर स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

शिवराज पहले भी सरकार के सामने सवाल उठा चुके हैं?

जवाब: हां। मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद कुछ ऐसे मौके आए हैं, जब शिवराज के बयान या कदम सरकार के रुख से अलग दिखाई दिए। आदिवासियों के अधिकार, किसानों की उपज की खरीद और लाड़ली बहना योजना से जुड़े उनके बयान इसी सिलसिले में देखे जा रहे हैं।

1. खिवनी में आदिवासियों के घर गिराने पर जताई थी नाराजगी

जून 2025 में देवास के खिवनी अभयारण्य क्षेत्र में करीब 50 कच्चे घरों को गिराए जाने के बाद आदिवासियों ने विरोध जताया था। प्रभावित लोग सीहोर कलेक्ट्रेट पहुंचे, जहां शिवराज ने उनके पक्ष में खड़े होते हुए कहा था कि आदिवासियों की जमीन कोई नहीं छीन सकता। उन्होंने वन विभाग की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा था कि ऐसे कदम सरकार की छवि खराब करते हैं।

इसके बाद शिवराज प्रभावित आदिवासियों को लेकर मुख्यमंत्री मोहन यादव से मिले। मामले में सरकार ने विभागीय जांच के आदेश दिए और सीहोर के तत्कालीन DFO का तबादला किया। साथ ही मानसून के दौरान इस तरह की कार्रवाई नहीं करने की बात कही गई। प्रस्तावित सरदार वल्लभभाई पटेल अभयारण्य की योजना भी विरोध के बाद आगे नहीं बढ़ सकी। इस प्रकरण में भी शिवराज ने आदिवासी परिवारों के पक्ष में आवाज उठाई थी, जबकि कार्रवाई वन विभाग ने की थी।

2. मूंग खरीदी को लेकर मुख्यमंत्री को लिखी थीं चिट्ठियां

जुलाई 2026 में मूंग की सरकारी खरीद को लेकर किसानों का आंदोलन तेज हुआ। किसान अपनी उपज की पूरी खरीद की मांग कर रहे थे। उस समय राज्य सरकार केंद्र से खरीद की सीमा बढ़ाने की मांग कर रही थी। इसी बीच केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 23 जुलाई को मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर खरीद की स्थिति की ओर ध्यान दिलाया। पत्र में बताया गया कि 16 जुलाई तक राज्य अपने निर्धारित लक्ष्य का केवल 2 प्रतिशत ही खरीद पाया था।

29 जुलाई को लिखे गए दूसरे पत्र में केंद्र से मंजूर 4.54 लाख टन मूंग में से करीब 60 हजार टन की खरीद होने का जिक्र किया गया। इसके बाद किसान भोपाल पहुंचे और सरकार के साथ बातचीत हुई। अंततः 60 प्रतिशत मूंग खरीदने पर सहमति बनी और आंदोलन समाप्त हो गया। यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि शिवराज केंद्र में कृषि मंत्री हैं और खरीद से जुड़े आंकड़ों के जरिए उन्होंने राज्य में प्रक्रिया की धीमी रफ्तार का मुद्दा उठाया था।

3. लाड़ली बहना योजना पर भी दिया था स्पष्ट संदेश

अक्टूबर 2026 में लाड़ली बहना योजना को लेकर मुख्यमंत्री मोहन यादव और शिवराज के बयानों की भी चर्चा हुई। 4 अक्टूबर को बुंदेली समागम में मुख्यमंत्री ने एक सवाल के जवाब में हंसते हुए कहा था कि लाड़ली बहना योजना ही बहुत महंगी पड़ गई है। हालांकि, उसी कार्यक्रम में उन्होंने यह भी कहा कि सरकार महिलाओं के लिए हर चुनौती का सामना करने को तैयार है।

इसके करीब एक सप्ताह बाद भोजपुर में शिवराज ने कहा कि हर सरकार को लाड़ली बहना योजना जारी रखनी पड़ेगी और बहनें नाराज हुईं तो फिर खैर नहीं होगी। उन्होंने योजना के तहत मिलने वाली राशि धीरे-धीरे बढ़ाकर 3,000 रुपये तक पहुंचने की बात भी कही। शिवराज ने इसी दौरान यह भी स्पष्ट किया कि मोहन सरकार योजना को जारी रखे हुए है।

MOHAN YADAV NEWS: शिवराज की नाराजगी के पीछे राजनीतिक रणनीति भी है?

जवाब: शिवराज सार्वजनिक रूप से कोसमी की कार्रवाई को आदिवासी परिवारों के साथ अन्याय बता रहे हैं। उनका आरोप है कि कुछ अधिकारियों के कदमों से भाजपा की छवि खराब हो रही है। वहीं, राजनीतिक विश्लेषक उनके लगातार सक्रिय रहने को पार्टी के भीतर अपनी भूमिका बनाए रखने की कोशिश से जोड़कर देखते हैं। हालांकि, किसी बयान या घटना के आधार पर उनकी मंशा को निश्चित रूप से तय नहीं किया जा सकता। इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए तीन पहलुओं पर गौर करना जरूरी है।

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1. आदिवासी, किसान और महिलाओं से जुड़े मुद्दे

आदिवासी अधिकार, किसानों की उपज का उचित मूल्य और महिलाओं को आर्थिक सहायता जैसे मुद्दे मध्य प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण हैं। इन विषयों पर आवाज उठाने से किसी नेता का सीधा जुड़ाव उन वर्गों से बनता है, जिनका चुनावी और सामाजिक महत्व भी है।

राजनीतिक विश्लेषक के मुताबिक, शिवराज जल, जंगल और महिलाओं जैसे संवेदनशील मुद्दों को उठाकर अपनी राजनीतिक मौजूदगी भी दर्ज करा रहे हैं। उनका आकलन है कि शिवराज ऐसा करते हुए भाजपा की तय राजनीतिक सीमा का भी उल्लंघन नहीं कर रहे।

इस नजरिए से देखें तो आदिवासियों के पक्ष में धरना देना, किसानों की खरीद का मुद्दा उठाना और लाड़ली बहना योजना के समर्थन में बयान देना इन सभी घटनाओं में एक समानता दिखाई देती है। शिवराज ऐसे मुद्दों पर सक्रिय हैं, जिनसे उनका पुराना राजनीतिक जुड़ाव रहा है।

2. विरोध दर्ज कराने का तरीका पहले भी अपनाते रहे हैं शिवराज

शिवराज का इस तरह किसी मुद्दे पर सीधे मैदान में उतरना नया नहीं है। जून 2019 में, जब कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी, तब भी उन्होंने सीहोर के सैकड़ों बरेला आदिवासियों के साथ भोपाल में प्रदर्शन किया था। उस समय आदिवासियों के ट्रैक्टर रोके जाने पर शिवराज उनके साथ ट्रैक्टर पर बैठ गए थे। उस घटना में वह तत्कालीन कांग्रेस सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। अब कोसमी में वह भाजपा की अपनी सरकार के अधिकारियों की कार्रवाई पर सवाल उठा रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषक का मानना है कि भाजपा में अपनी जगह बनाए रखना शिवराज के लिए महत्वपूर्ण है। उनके आकलन में, शिवराज प्रदेश की राजनीति में हाशिये पर जाने को स्वीकार नहीं करना चाहते। राजनीतिक पंडित को कहना है कि शिवराज केवल मूकदर्शक बने रहने के बजाय राजनीतिक और प्रशासनिक मामलों में अपनी भागीदारी बनाए रखना चाहते हैं। ये विश्लेषकों के आकलन हैं।

3. शिवराज ने मुख्यमंत्री के बजाय अधिकारियों को घेरा

कोसमी मामले में शिवराज के बयानों का एक अहम पहलू यह भी है कि उन्होंने सीधे मुख्यमंत्री मोहन यादव को जिम्मेदार नहीं ठहराया। उन्होंने कार्रवाई को कुछ अधिकारियों की साजिश बताते हुए कहा कि ऐसे कदमों से मुख्यमंत्री की छवि खराब हो रही है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रभावित परिवारों ने भाजपा को वोट दिया है और इन्हीं परिवारों के वोट से मोहन यादव मुख्यमंत्री बने हैं। कोसमी और भोजपुर, दोनों शिवराज के विदिशा लोकसभा क्षेत्र में आते हैं। खिवनी में प्रभावित आदिवासी परिवार भी उनसे मिले थे, जबकि मूंग खरीद का मामला उनके केंद्रीय कृषि मंत्रालय से जुड़ा था।

राजनीतिक विश्लेषक के मुताबिक, शिवराज प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन बनाए रखना चाहते हैं। उनका मानना है कि शिवराज की प्राथमिकता अब केवल मुख्यमंत्री पद तक सीमित नहीं है, बल्कि वह राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका को भी मजबूत रखना चाहते हैं। शिवराज भाजपा के शीर्ष नेताओं में अपनी मौजूदगी का एहसास कराना चाहते हैं। लेकिन इन विश्लेषणों से यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि उनके और मोहन यादव के बीच किसी निश्चित राजनीतिक संघर्ष की स्थिति बन चुकी है।

MOHAN YADAV NEWS: शिवराज और मोहन यादव के बीच सब ठीक नहीं है?

जवाब: सार्वजनिक तौर पर दोनों नेताओं के बीच किसी सीधे टकराव की पुष्टि नहीं हुई है। शिवराज मुख्यमंत्री की तारीफ भी कर चुके हैं और कोसमी के मामले में उन्होंने मुख्य रूप से अधिकारियों को निशाने पर लिया। दूसरी ओर, कई मुद्दों पर उनके बयानों और सरकार के रुख में अंतर जरूर दिखाई दिया है।

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सार्वजनिक मंचों पर एक-दूसरे का सम्मान

अगस्त 2026 में शिवराज ने मोहन यादव की तारीफ करते हुए कहा था कि मुख्यमंत्री में उनसे कई गुना ज्यादा ऊर्जा है। कोसमी के मामले में भी उन्होंने मुख्यमंत्री को सीधे जिम्मेदार ठहराने के बजाय अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए। इससे संकेत मिलता है कि कम से कम सार्वजनिक बयानों में शिवराज ने मुख्यमंत्री के साथ सीधे टकराव से दूरी बनाए रखी है।

MOHAN YADAV NEWS:  मुख्यमंत्री ने जांच का भरोसा दिया

कोसमी की घटना के बाद मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि उन्होंने अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी है और मुख्य सचिव को भी मामले से अवगत करा दिया है। उन्होंने भरोसा जताया कि जांच के बाद पूरी स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि उनकी सरकार संवेदनशील है और अगर किसी वरिष्ठ नेता ने कोई मुद्दा उठाया है, तो उसकी जांच कराने में कोई बुराई नहीं है। इस तरह मुख्यमंत्री ने मामले की जांच कराने की बात कही, लेकिन शुरुआती बयान में कार्रवाई को पूरी तरह गलत ठहराने या संबंधित अधिकारियों को दोषी घोषित करने से परहेज किया।

भाजपा के भीतर तालमेल को लेकर भी उठे सवाल

राजनीतिक विश्लेषक ने बताया कि  इस घटनाक्रम को केवल शिवराज और मोहन यादव के बीच के संबंधों तक सीमित नहीं मानते। उनके मुताबिक, भाजपा के कुछ अन्य वरिष्ठ नेताओं की भूमिका और पार्टी के भीतर संवाद को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कहा कि कैलाश विजयवर्गीय और प्रहलाद पटेल जैसे नेताओं का जिक्र करते हुए पार्टी के भीतर संवाद की स्थिति पर सवाल उठाए। उनका यह भी आकलन है कि मूंग खरीद के आंदोलन के दौरान राज्य और केंद्र के स्तर पर तालमेल को लेकर मुश्किलें दिखाई दी थीं। यह विश्लेषक की राय है, भाजपा की ओर से पार्टी के भीतर संवाद खत्म होने की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

MOHAN YADAV NEWS: कांग्रेस ने ‘मोहन-मामा’ कहकर साधा निशाना

कोसमी की घटना को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री और शिवराज के बीच कथित खींचतान से जोड़ दिया। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने घटना का वीडियो साझा करते हुए आरोप लगाया कि ‘मोहन-मामा’ की आपसी खींचतान में आदिवासी परिवारों के घर उजड़ रहे हैं।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने भी दावा किया कि शिवराज के रोकने के निर्देश के बावजूद राज्य सरकार ने कार्रवाई होने दी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस आदिवासी अधिकारों की लड़ाई जमीन पर लड़ेगी। कांग्रेस के इन बयानों को विपक्ष के राजनीतिक आरोप के रूप में देखा जाना चाहिए। केवल इन आरोपों के आधार पर दोनों भाजपा नेताओं के बीच अंदरूनी टकराव को स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।

आगे क्या होगा? जांच के नतीजों पर टिकी निगाहें

कोसमी की कार्रवाई को लेकर अब दो स्तरों पर जवाबदेही का सवाल उठ रहा है। पहला, राज्य सरकार की ओर से मांगी गई रिपोर्ट। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से पूरे मामले की जानकारी मांगी है। इस रिपोर्ट से कार्रवाई की प्रक्रिया, अधिकारियों की भूमिका और शिवराज की ओर से दिए गए कथित निर्देशों से जुड़े सवालों पर स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

दूसरा, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की ओर से जारी नोटिस। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, आयोग ने मामले पर राज्य सरकार से जवाब और दस्तावेज मांगे हैं। मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक, वन विभाग के प्रमुख सचिव, सीहोर कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक समेत संबंधित अधिकारियों से तीन दिन में जवाब देने को कहा गया है। इन जांचों के निष्कर्ष महत्वपूर्ण होंगे, क्योंकि फिलहाल एक तरफ वन विकास निगम पुरानी बेदखली प्रक्रिया का हवाला दे रहा है, जबकि दूसरी तरफ शिवराज अधिकारियों की कार्रवाई पर सवाल उठा रहे हैं।

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