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नेशनल हाईवे पर हर घंटे 7 मौतें क्यों? 1.46 लाख KM सड़क, 6,358 ब्लैक कॉरिडोर का पूरा सच

National Highway Accident: देश में नेशनल हाईवे का नेटवर्क करीब 1.46 लाख किलोमीटर है, लेकिन सड़क हादसों में होने वाली मौतों का बड़ा हिस्सा इन्हीं हाईवे पर दर्ज होता है। 2025 में राष्ट्रीय राजमार्गों पर 62,122 लोगों की मौत हुई। यानी औसतन हर घंटे करीब 7 लोगों ने जान गंवाई। आखिर हाईवे पर हादसों और मौतों की इतनी बड़ी संख्या की वजह क्या है और सरकार इससे निपटने के लिए क्या कर रही है?

2025 में नेशनल हाईवे पर कितनी मौतें हुईं?

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में नेशनल हाईवे पर 62,122 लोगों की मौत हुई। 2024 में यह संख्या 64,772 थी। यानी एक साल में मौतों की संख्या करीब 4.1 फीसदी कम हुई। 62,122 मौतों को पूरे साल के 8,760 घंटों में बांटें तो औसतन करीब 7 मौतें हर घंटे बैठती हैं। हालांकि, यह सिर्फ औसत है। इसका मतलब यह नहीं है कि हर घंटे ठीक सात मौतें हुईं। 2025 में नेशनल हाईवे पर कुल 1,43,526 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज हुईं।

National Highway Accident:देशभर के हादसों में हाईवे की हिस्सेदारी कितनी?

2025 में पूरे देश में 5,13,563 सड़क दुर्घटनाएं हुईं और इनमें 1,83,382 लोगों की मौत हुई। नेशनल हाईवे देश के कुल सड़क नेटवर्क का करीब 2.3 फीसदी हिस्सा हैं, लेकिन सड़क हादसों में होने वाली कुल मौतों में इनकी हिस्सेदारी 36 फीसदी से ज्यादा बताई गई है। राष्ट्रीय राजमार्गों पर हर 100 किलोमीटर सड़क पर सालाना औसतन 42.1 मौतें दर्ज होने का आंकड़ा भी सामने आया है। यानी हाईवे का नेटवर्क कुल सड़क नेटवर्क की तुलना में छोटा है, लेकिन यहां होने वाले हादसों की गंभीरता और मौतों का आंकड़ा चिंता का विषय बना हुआ है।

National Highway Accident: हाईवे पर हादसों की बड़ी वजह क्या है?

हाईवे पर हादसों के पीछे कई कारण होते हैं। इनमें तेज रफ्तार, गलत दिशा में वाहन चलाना, लेन अनुशासन का पालन नहीं करना, मोबाइल फोन का इस्तेमाल और सड़क डिजाइन से जुड़ी समस्याएं शामिल हैं। इनमें ओवरस्पीडिंग लगातार प्रमुख कारणों में बनी हुई है। 2025 के आंकड़ों के अनुसार 82,124 सड़क दुर्घटनाएं तेज रफ्तार से जुड़ी थीं, जो उस साल दर्ज कुल सड़क दुर्घटनाओं का करीब 16 फीसदी है। तेज रफ्तार का असर सिर्फ दुर्घटना होने की संभावना तक सीमित नहीं रहता। हादसे के समय वाहन की गति ज्यादा होने पर टक्कर की गंभीरता भी बढ़ सकती है, जिससे मौत या गंभीर चोट का जोखिम बढ़ता है।

पैदल चलने वालों के लिए हाईवे क्यों चुनौती हैं?

नेशनल हाईवे सिर्फ लंबी दूरी तय करने वाले वाहनों के लिए नहीं हैं। इनके आसपास बड़ी संख्या में गांव, कस्बे, बाजार और आबादी वाले इलाके भी मौजूद हैं। 27 जुलाई 2026 तक के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक राष्ट्रीय राजमार्गों पर 24,446 पैदल यात्रियों की मौत दर्ज हुई। राज्यों में बिहार में 2,423, तमिलनाडु में 2,328 और महाराष्ट्र में 2,002 पैदल यात्रियों की मौत दर्ज हुई। यह आंकड़ा हाईवे पर पैदल यात्रियों की सुरक्षित आवाजाही के सवाल को भी सामने लाता है। कई जगह सड़क पार करने के लिए सुरक्षित क्रॉसिंग, फुट ओवरब्रिज, अंडरपास या पैदल यात्री सुविधाओं की जरूरत पड़ती है।

National Highway Accident: ब्लैक कॉरिडोर क्या होते हैं?

अब आते हैं हादसों की सबसे संवेदनशील जगहों पर- ब्लैक कॉरिडोर। ब्लैक कॉरिडोर ऐसे सड़क खंडों को कहा जाता है जहां एक निश्चित अवधि में बार-बार गंभीर सड़क दुर्घटनाएं होती हैं और दुर्घटनाओं तथा मौतों का पैटर्न सामान्य हिस्सों की तुलना में ज्यादा गंभीर होता है। सरकार ने IIT कानपुर के AI आधारित टूल्स की मदद से 2023 से 2025 के बीच 6,358 ब्लैक कॉरिडोर की पहचान की। इनकी कुल लंबाई करीब 6,409.7 किलोमीटर बताई गई है। इन कॉरिडोर पर 2023 से 2025 के बीच तीन वर्षों में 37,164 लोगों की मौत हुई। यानी समस्या सिर्फ एक-दो खतरनाक मोड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि हजारों किलोमीटर के ऐसे सड़क खंड मौजूद हैं जहां दुर्घटनाओं का जोखिम लगातार बना हुआ है।

सबसे ज्यादा ब्लैक कॉरिडोर किन राज्यों में?

2023 से 2025 के बीच पहचाने गए 6,358 ब्लैक कॉरिडोर में सबसे ज्यादा संख्या तमिलनाडु में 958 बताई गई है। इसके बाद: उत्तर प्रदेश – 671, कर्नाटक – 607। यहां एक दिलचस्प अंतर भी सामने आता है। 2025 में तमिलनाडु में नेशनल हाईवे पर दुर्घटनाओं की संख्या 71,387 बताई गई, जबकि उत्तर प्रदेश में नेशनल हाईवे पर मौतों की संख्या 27,550 रही। इससे पता चलता है कि सिर्फ दुर्घटनाओं की संख्या देखकर सड़क सुरक्षा की पूरी तस्वीर नहीं समझी जा सकती। किसी राज्य में हादसे ज्यादा हो सकते हैं, जबकि दूसरे राज्य में हादसों की गंभीरता के कारण मौतों की संख्या ज्यादा हो सकती है।

National Highway Accident: ब्लैक स्पॉट और ब्लैक कॉरिडोर में क्या अंतर है?

दोनों शब्द अक्सर एक साथ इस्तेमाल होते हैं, लेकिन इनके स्तर में अंतर है। ब्लैक स्पॉट आम तौर पर किसी खास जगह या सीमित हिस्से को संदर्भित करता है जहां बार-बार दुर्घटनाएं होती हैं। यह कोई जंक्शन, मोड़, पुल या सड़क का विशेष हिस्सा हो सकता है। वहीं ब्लैक कॉरिडोर अपेक्षाकृत लंबा सड़क खंड होता है, जहां एक से ज्यादा स्थानों पर दुर्घटनाओं का लगातार पैटर्न दिखाई देता है। इसी वजह से 6,358 ब्लैक कॉरिडोर का आंकड़ा सिर्फ 6,358 मोड़ों या चौराहों का आंकड़ा नहीं है।

National Highway Accident
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देश में कितने ब्लैक स्पॉट चिन्हित किए गए?

सरकार के आंकड़ों के मुताबिक देशभर के नेशनल हाईवे पर 13,795 ब्लैक स्पॉट की पहचान की गई थी। इन जगहों पर दुर्घटनाओं को कम करने के लिए दो स्तरों पर काम किया जाता है।

तत्काल सुधार क्या होते हैं?

इनमें सड़क पर सफेद पट्टियां, चेतावनी संकेत, रोड स्टड, डिलिनेटर और क्रैश बैरियर लगाना जैसे उपाय शामिल हैं। इनका उद्देश्य दुर्घटना संभावित जगह को तत्काल ज्यादा सुरक्षित बनाना होता है।

स्थायी सुधार कैसे होते हैं?

स्थायी समाधान में सिर्फ साइन बोर्ड लगाना पर्याप्त नहीं होता। इसमें सड़क की ज्यामिति बदलना, जंक्शन का डिजाइन सुधारना, अंडरपास या ओवरब्रिज बनाना और जरूरत के मुताबिक सड़क संरचना में बदलाव शामिल हो सकते हैं। ऐसे कामों में जमीन अधिग्रहण और पर्यावरण या वन संबंधी मंजूरी जैसी प्रक्रियाओं के कारण समय लग सकता है।

National Highway Accident: सरकार ने हाईवे को सुरक्षित बनाने के लिए क्या कदम उठाए?

सड़क सुरक्षा के लिए सरकार की रणनीति सिर्फ सड़क निर्माण तक सीमित नहीं है। इसमें सड़क इंजीनियरिंग, तकनीक और हादसे के बाद तत्काल चिकित्सा सहायता जैसे कई पहलू शामिल हैं।

1. ब्लैक स्पॉट में सुधार

चिह्नित ब्लैक स्पॉट पर सड़क संकेत, क्रैश बैरियर, रोड स्टड, डिलिनेटर और अन्य सुरक्षा उपाय किए जा रहे हैं। जहां जरूरत है, वहां स्थायी इंजीनियरिंग सुधार भी किए जाते हैं।

2. AI और कैमरों का इस्तेमाल

सरकार ने AI आधारित ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम (ATMS) का इस्तेमाल बढ़ाया है। इसमें AI कैमरे, नंबर प्लेट रिकग्निशन कैमरे और सर्विलांस सिस्टम शामिल हैं। इनका इस्तेमाल ट्रैफिक नियमों की निगरानी, वाहन पहचान और घटनाओं पर तेजी से प्रतिक्रिया के लिए किया जा सकता है।

3. हादसे के बाद ‘गोल्डन आवर’

सड़क हादसे के बाद शुरुआती समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। सरकार ने दुर्घटना पीड़ितों के लिए ‘गोल्डन ऑवर’ के दौरान कैशलेस इलाज जैसी व्यवस्था पर जोर दिया है।इसका उद्देश्य हादसे के बाद घायलों को जल्द से जल्द चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना है।

National Highway Accident: कुछ राज्यों में हाईवे मौतों में कमी भी आई

उपलब्ध आंकड़ों में कुछ राज्यों में नेशनल हाईवे पर मौतों में कमी दर्ज हुई है। उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा 9,560 से घटकर 7,573 बताया गया है। मध्य प्रदेश में 4,644 से घटकर 3,610 और पंजाब में 1,562 से घटकर 1,022 हुआ। हालांकि, किसी राज्य में मौतों में कमी को केवल एक कारण से जोड़ना सही नहीं होगा। सड़क डिजाइन, पुलिस निगरानी, वाहन गति, हेलमेट और सीट बेल्ट का इस्तेमाल, आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था और अन्य कई कारक सड़क सुरक्षा को प्रभावित करते हैं।

2026 में क्या स्थिति है?

27 जुलाई 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक इस साल के पहले सात महीनों में नेशनल हाईवे पर 77,234 दुर्घटनाएं दर्ज हुईं। वहीं 2026 के पहले छह महीनों में पूरे देश में 2,85,770 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गईं। इससे साफ है कि पिछले साल मौतों में कमी आने के बावजूद सड़क दुर्घटनाओं की समस्या खत्म नहीं हुई है।

National Highway Accident: क्या नेशनल हाईवे अब सुरक्षित हो रहे हैं?

आंकड़ों में एक तरफ सुधार का संकेत दिखाई देता है- 2025 में नेशनल हाईवे पर मौतें 2024 की तुलना में कम हुईं। दूसरी तरफ 62,122 मौतों, हजारों ब्लैक स्पॉट और 6,358 ब्लैक कॉरिडोर का आंकड़ा बताता है कि सड़क सुरक्षा की चुनौती अभी बड़ी है। सबसे अहम सवाल सिर्फ यह नहीं है कि हाईवे कितने किलोमीटर बनाए गए, बल्कि यह भी है कि उन पर वाहन कितनी गति से चलते हैं, सड़क का डिजाइन कितना सुरक्षित है, पैदल यात्रियों के लिए क्या व्यवस्था है और दुर्घटना होने के बाद घायल को कितनी जल्दी इलाज मिलता है।

हाईवे की सुरक्षा सिर्फ सड़क बनाने से तय नहीं होगी

भारत का नेशनल हाईवे नेटवर्क लगातार बढ़ रहा है। लेकिन सड़क की लंबाई बढ़ने के साथ उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना भी जरूरी है। 2025 में 62,122 मौतें और हर घंटे औसतन करीब 7 मौतों का आंकड़ा बताता है कि चुनौती केवल सड़क निर्माण की नहीं, बल्कि स्पीड मैनेजमेंट, सुरक्षित डिजाइन, ब्लैक स्पॉट सुधार, पैदल यात्रियों की सुरक्षा, नियमों के पालन और तेज मेडिकल रिस्पॉन्स की भी है। इसलिए नेशनल हाईवे को सुरक्षित बनाने की तस्वीर को सिर्फ एक साल में मौतों की कमी से नहीं, बल्कि लंबे समय में दुर्घटनाओं, मौतों और गंभीर चोटों के आंकड़ों के साथ देखना ज्यादा सही होगा।

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