New Delhi: जीने की चाहत में लोग अपना सबकुछ गंवा देते हैं।महंगी जीवन रक्षक दवाइयां खरीदने के लिए अपनी पैतृक जमीनें और आशियाने तक बेच देते हैं, लेकिन उन्हें क्या पता कि जिन दवाइयों के भरोसे वे स्वस्थ जीवन की आशा कर रहे हैं, वे नकली हैं और धोखा देने वाली हैं।चिंता का विषय यह है कि नकली दवाइयों का यह काला कारोबार देश के किसी एक राज्य तक सीमित नहीं रहा।
अस्पतालों तक पहुंच रही हैं कैंसर की नकली दवाइयां!
इस बीच कर्नाटक के बेंगलुरु में कैंसर और कई गंभीर बीमारियों की नकली दवाइयों से जुड़े एक रैकेट का भंडाफोड़ हुआ है।संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि इस खतरनाक नेटवर्क से जुड़े लोगों ने तमाम अस्पतालों, क्लीनिकों और मेडिकल स्टोर्स को कैंसर की दवाइयां, जीवन रक्षक दवाइयां और आईसीयू इंजेक्शन सप्लाई किए।आरोप है कि करीब 90 अस्पतालों में 50 प्रतिशत की छूट पर ये दवाइयां सप्लाई की गई। जांचकर्ताओं को संदेह है कि एक्सपायर हो चुकी दवाइयों को नए कंटेनरों में फिर से पैक किया गया और उन पर नकली लेबल लगाए गए।इनमें से कुछ लेबल जानी-मानी फार्मास्युटिकल कंपनियों की ब्रांडिंग से मिलते-जुलते हैं।
New Delhi: पहले भी बिकती रही नकली दवाइयां
देश में नकली दवाइयों का यह कोई पहला मामला नहीं है। पिछले माह यानी अगस्त 2026 में दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने नकली कैंसर दवाइयों के एक बड़े अंतरराज्यीय गिरोह का भंडाफोड़ किया था, जिसमें 588 भरी हुई कैंसर रोधी शीशियां, छह खाली शीशियां और लगभग 9 करोड़ रुपये की दवाइयां बरामद की गई थी। सत्रह लोगों को गिरफ्तार किया गया था। बरामद दवाओं में डार्ज़लेक्स, इम्फिन्ज़ी, एर्बिटक्स, ओपडिटा, गैज़ीवा, बैवेंशियो, एडसेट्रिस और कीट्रूडा शामिल थीं, जो सभी उच्च मूल्य वाली इम्यूनोथेरेपी और लक्षित कैंसर की दवाइयां हैं, जिनकी प्रत्येक खुराक की कीमत लाखों रुपये थी।
New Delhi: अंतरराष्ट्रीय गिरोह का भंडाफोड़
जून 2024 में दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने कैंसर और शुगर की नकली दवा बेचने वाले अंतरराष्ट्रीय गिरोह का भंडाफोड़ किया था। इसमें एक सीरियाई नागरिक सहित चार लोगों को गिरफ्तार किया गया था।सीरियाई नागरिक मोनिर अहमद तुर्की, मिस्र और भारत में दवाइयों की आपूर्ति करता था।गिरफ्तार किए गए अन्य आरोपियों की पहचान नवीन आर्य ,सौरभ गर्ग और करण खानेजा के रूप में हुई थी।पुलिस ने इन लोगों से करोड़ों रुपये की कैंसर और मधुमेह में इस्तेमाल होने वाली कई अंतरराष्ट्रीय ब्रांड लाइफ सेविंग्स की दवाइयां जब्त की थी।
New Delhi: कीमोथेरेपी की दवाइयां भी नकली
मार्च 2024 में दिल्ली पुलिस ने नकली कीमोथेरेपी दवाओं के एक रैकेट का भंडाफोड़ किया और प्रवर्तन निदेशालय ने इस मामले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग के सिलसिले में दिल्ली-एनसीआर में 10 ठिकानों पर छापेमारी की।मई 2026 में, क्राइम ब्रांच ने नकली कैंसर दवाओं के एक अलग मामले में चार लोगों को गिरफ्तार किया, जिसमें 10 करोड़ रुपये की दवा शामिल थी। राजस्थान के एक अस्पताल से सरकारी कैंसर दवाओं को अवैध बाजार में बेचा जा रहा था। 3,000 से 6,000 रुपये में खरीदी गई खाली शीशियों में नकली पदार्थ भरकर उन्हें 40,000 से 50,000 रुपये में बेचा जा रहा था।
New Delhi: सुदूर क्षेत्रों तक सक्रिय धंधेबाज
जुलाई 2026 में उत्तराखंड स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) और औषधि प्रशासन विभाग की संयुक्त टीम ने ऊधमसिंहनगर के बाजपुर स्थित औद्योगिक क्षेत्र में बड़ी कार्रवाई करते हुए नकली एलोपैथिक दवाइयों के एक बड़े सिंडिकेट का भंडाफोड़ किया था।टीम ने कोविल बायोटैक पर छापेमारी कर अवैध रूप से प्रतिष्ठित कंपनियों के नाम से बनाई जा रही नकली दवाइयों का जखीरा बरामद किया था। मौके से यूपी के बुलंदशहर निवासी धीरेंद्र पुत्र ब्रह्म सिंह को गिरफ्तार किया गया था।
जांच में सामने आया कि आरोपी आयुर्वेदिक एवं फूड लाइसेंस की आड़ में स्टैडमेड, मैकलियोड्स, इंटास और सन फार्मा सहित कई नामी कंपनियों के नाम से नकली एलोपैथिक एवं जीवन रक्षक दवाइयों का निर्माण कर बाजार में सप्लाई कर रहा था। छापेमारी में करीब एक लाख टैबलेट और 15 हजार सिरप की बोतलें बरामद हुई हैं, जिनका उपयोग अम्लता, एंटीबायोटिक, दर्द, नसों की बीमारी, प्रोस्टेट, कैल्शियम एवं आयरन की कमी जैसे उपचारों में किया जाता है।
New Delhi: कैसे बनती हैं नकली दवाइयां?
बताया जाता है कि नकली दवाइयों के काले कारोबार में लिप्त लोग अस्पतालों से इस्तेमाल हो चुकी महंगी दवाओं की खाली शीशियां चुरा लेते हैं। इसके लिए वे अस्पताल कर्मचारियों से लेकर कूड़ा-कचरा बीनने वालों तक की मदद लेते हैं।इन खाली शीशियों में सामान्य पानी, ग्लूकोज या बेहद सस्ती एंटीबायोटिक दवाएं भरकर उन्हें दोबारा सील कर दिया जाता है। इसके बाद इन्हें लाखों रुपये में असली बताकर बेच दिया जाता है। बेंगलुरु और अन्य शहरों में पकड़े गए गिरोहों में से पता चला है कि नकली दवाइयों के धंधेबाज एक्सपायर्ड जीवन रक्षक दवाओं को नए कंटेनरों में ट्रांसफर कर देते हैं। इसके बाद नामी-गिरामी फार्मा कंपनियों के फर्जी लेबल, होलोग्राम और स्टैम्प बनाकर इन दवाइयों पर चिपका दिये जाते हैं।
New Delhi: बिचौलियों की बड़ी भूमिका
नकली दवाइयों तैयार करने के बाद अब बिचौलियों और अनधिकृत डीलरों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।ये अस्पतालों की फार्मेसियों और क्लीनिकों को लालच देकर अपने जाल में फंसाते हैं और नकली दवाइयां सप्लाई करने में कामयाब हो जाते हैं।संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि बेंगलुरु में 90 से अधिक अस्पताल इस संदिग्ध सप्लाई चेन के लपेटे में आए हैं।
New Delhi: डॉक्टरों की मिलीभगत!
जानकारों के अनुसार नकली दवाइयों की सप्लाई में बिचौलिये और अनधिकृत डीलर ही नहीं, बल्कि कुछ लालची डॉक्टर और फार्मासिस्ट भी शामिल होते हैं, जो अपने फायदे के लिए मरीजों को नकली दवाइयां खरीदने की सलाह देते हैं।
New Delhi: विदेशों तक नेटवर्क
कैंसर की दवाइयों का नेटवर्क विदेशों तक फैला हुआ है। जानकारों के अनुसार कई ऐसी दवाइयां हैं, जिन्हें आधिकारिक तौर पर भारत में बेचने की मंजूरी (Approval) नहीं है, लेकिन इन दवाइयों को तस्करी के माध्यम से लंदन, आयरलैंड या अमेरिका आदि जगहों से भारत लाया जाता है। इन्हें आवासीय इलाकों या गुप्त गोदामों में छिपाकर रखा जाता है। इसके बाद दलालों के जरिए बेचा जाता है।
New Delhi: मरीजों की मजबूरी
नकली दवाइयों के धंधेबाज गरीब मरीजों की मजबूरी का नाजायज फायदा उठाते हैं। दरअसल, कैंसर का महंगा इलाज हर मरीज के लिए आसान नहीं होता।गरीब लोग इलाज कराते-कराते आर्थिक रूप से टूट जाते हैं। ऐसे में वे स्स्ते दामों में मिलने वाली इन नकली दवाइयों को खरीदने के लिए विवश हो जाते हैं।नकली दवाइयों के सिंडिकेट अस्पतालों, क्लीनिकों और मरीजों को 50 प्रतिशत तक के भारी डिस्काउंट का लालच देते हैं।
New Delhi: क्या कदम उठा रही है सरकार?
नकली और घटिया दवाइयों के निर्माण, बिक्री और वितरण पर रोक लगाने के लिए ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 के तहत सख्त कानूनी प्रावधान किए गए हैं।नकली दवाइयों के जानलेवा रैकेट को रोकने के लिए ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) और राज्य पुलिस की स्पेशल टीमें (SIT) निरंतर छापेमारी करती रही हैं। सरकार अब कैंसर की दवाइयों पर अनिवार्य QR कोड और बारकोड ट्रैकिंग सिस्टम लागू करने पर विचार कर रही है। इसके तहत हर शीशी और स्ट्रिप पर मैन्युफैक्चरिंग डेट, एक्सपायरी डेट और यूनिक आईडी कोड जैसी 9 जरूरी जानकारियां होंगी, जिससे मरीज खुद दवा की असलियत को ट्रैक कर सकेंगे।
New Delhi: नकली दवाइयों से कैसे बचें?
आम लोग कुछ सावधानियां रखकर नकली दवाइयों से बच सकते हैं।लोगों को चाहिए कि किसी रजिस्टर्ड मेडिकल मेडिकल स्टोर से ही दवाइयां खरीदें और उनका पक्का बिल अवश्य लें।बिल पर दवाई का बैच नंबर (Batch Number) और नाम होना जरूरी है, जो दवाई के असली होने का प्रमाण होता है।किसी भी दवाई पर मिलने वाली भारी छूट या डिस्काउंट के लालच में न पड़ें तो अच्छा होगा।सरकारी नियमों के अनुसार कई प्रमुख दवाइयों पर यूनिक क्यूआर कोड आने लगा है। इसे स्कैन करके कंपनी, मैन्युफैक्चरिंग डेट, एक्सपायरी और बैच की पूरी जानकारी ऑनलाइन जांची जा सकती है। सोशल मीडिया पर प्रचारित की जा रही किसी दवाई पर आसानी से विश्वास करने के बजाय अपने फिजिशियन की सलाह पर विश्वास करें।








