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विजय को तमिलनाडु में सरकार बनानी है, तो छोटे दलों के बड़े महत्व को समझें, वर्ना निराशा ही हाथ लगेगी

New Delhi: विजय को तमिलनाडु में सरकार बनानी है, तो छोटे दलों के बड़े महत्व को समझें, वर्ना निराशा ही हाथ लगेगी
New Delhi:  राजनीति में कहा जाता है कि चुनाव जीतना अलग बात है और सरकार बनाना कुछ और बात है।तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) के नेता विजय थलपति दो बार राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश कर चुके हैं, लेकिन अभी तक राज्यपाल ने उन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नहीं किया है। 234 सीटों वाली विधानसभा में विजय की पार्टी टीवीके ने 108 सीटें जीती हैं। सरकार बनाने के लिए उसे कांग्रेस के पांच विधायकों का समर्थन तो मिल गया, लेकिन इसके बावजूद वह 118 का जादुई आंकड़ा नहीं छू पाई है।यदि वे छोटी पार्टियों या वाम दलों का समर्थन हासिल कर लेते तो उनकी ताजपोशी संभव हो जाती, लेकिन वे इसमें असफल साबित हो रहे हैं।ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अभिनेता विजय मुख्यमंत्री की कुर्सी से वंचित रह जाएंगे ?

अनुभव की कमी लगती है

विजय के कुर्सी से वंचित रहने के सवाल उठने स्वाभाविक भी हैं।अब यह बात उन्हें समझ आ ही गई होगी कि राज्यपाल उसी स्थिति में उन्हें  सरकार बनाने बुलाएंगे जब वे पर्याप्त संख्या बल जुटाने में समर्थ हो जाएंगे।विजय इसमें असफल हो रहे हैं। उनकी असफलता की वजह राजनीति में अनुभव की कमी लगती है। राज्य में 4 मई को चुनावी नतीजे आने के साथ ही विजय ने सरकार बनाने की कोशिशें शुरू कर दी थी, लेकिन अब तक उन्हें सफलता नहीं मिल पाई है। उन्हें मंथन करना होगा कि आखिर उनके प्रयासों में कहां कमी है?  वे कई दलों से समर्थन के लिए बातचीत कर रहे हैं, लेकिन सरकार बनाने के लिए पर्याप्त संख्या बल नहीं जुटा पाए हैं।

खुद चलना पड़ता है

दरअसल, विजय को समझना चाहिए कि उनकी पार्टी राज्य में बड़ी अवश्य है, लेकिन आज जो राजनीतिक हालात बन गए हैं, उनमें छोटी पार्टियों का बहुत बड़ा महत्व है। उन्हें वाम दलों और वीसीके सहित उन पार्टियों के नेताओं के पास बड़ी विनम्रता से समर्थन की मांग करनी होगी जिनके पास एक या दो विधायक हैं।मसलन राज्य में वीसीके के दो विधायक हैं, लेकिन वीसीके ने उन्हें समर्थन देने से इनकार कर दिया।वीसीके ने तो विजय को घमंडी तक करार दे दिया है। वीसीके महासचिव सिंथनाई सेल्वन ने नाराजगी व्यक्त की है कि यदि वे WhatsApp के माध्यम से समर्थन मांगेंगे और हमसे जवाब चाहेंगे तो ऐसे कैसे संभव होगा। वाकई राजनीति में समर्थन मांगने के लिए खुद जाना पड़ता है। जिनसे समर्थन मांगा जाता है, उनके भी कुछ ऐसे मुद्दे हो सकते हैं जिनके आधार पर वे समर्थन देंगे। कोई भी अपनी शर्तों और मुद्दों पर समर्थन देता है। विजय के पास अभी मौका है, वे छोटी पार्टियों के बड़े महत्व को समझें तो बेहतर होगा। उन्हें समझना होगा कि भारतीय राजनीति में कई ऐसे अवसर आए जब बड़े राजनेताओं ने अपनी जरूरत के लिए अहं को किनारे रखकर दूसरों के दरवाजों पर जाकर दस्तक दी।
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