New Delhi: कर्नाटक में सिद्धारमैया ने मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया है, लेकिन वे दबाव की ऐसी रणनीति अपना रहे हैं जिससे आलाकमान की चुनौतियां बढ़ गई हैं। खबरों के मुताबिक सिद्धारमैया राज्य की नई सरकार में अपने समर्थकों को अच्छे पद दिये जाने के पक्ष में हैं और उन्होंने अपनी इस भावना से आलाकमान को भी अवगत करा दिया है। ऐसे में नए मुख्यमंत्री के साथ ही पार्टी नेतृत्व को सोचना पड़ेगा कि राज्य में कैसे सामांजस्य बिठाकर सिद्धारमैया को संतुष्ट किया जाए। राज्यसभा जाने का प्रस्ताव ठुकराकर वे पहले ही आलाकमान पर दबाव की रणनीति बना चुके हैं।
सामंजस्य बिठाने में सोचना पड़ेगा
बताया जाता है कि सिद्धारमैया राज्य सरकार में अपने बेटे यतींद्र सिद्धारमैया के लिए चिकित्सा शिक्षा, पिछड़ा वर्ग कल्याण, उद्योग और जल संसाधन जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय चाहते हैं। अपने समर्थकों को भी वे अच्छे मंत्रालय दिलाना चाहते हैं। इसके अलावा उन्होंने राज्यसभा और विधान परिषद (एमएलसी) के लिए अपने करीबियों के नाम पार्टी नेतृत्व को सुझा दिये हैं। यदि वे महत्वपूर्ण जगहों पर अपने करीबियों को बिठाने के लिए अड़े रहे, तो ऐसे में राज्य के नए मुख्यमंत्री और कांग्रेस आलाकमान के लिए सत्ता संतुलन बनाने में दिक्कतें खड़ी हो जाएंगी।आखिर नए मुख्यमंत्री और पार्टी हाईकमान के पसंदीदा नेताओं की भी अच्छे पदों पर बैठने की अपेक्षाएं होंगी, उन्हें कैसे संतुष्ट किया जाएगा ? दोनों ओर से महत्वपूर्ण पदों की खींचतान मुख्यमंत्री के साथ ही केंद्रीय नेतृत्व के लिए भारी चुनौती साबित हो सकती है।सिद्धारमैया और उनके समर्थक दबाव की रणनीति अपनाए हुए हैं।सिद्धारमैया ने राज्यसभा जाने का प्रस्ताव ठुकराया, तो उनके समर्थकों ने राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड्गे के पोस्टरों व तस्वीरों को आग के हवाले कर जताया है कि वे अपनी उपेक्षा बर्दाश्त नहीं करेंगे।
New Delhi: अंदरूनी कलह रोकनी जरूरी
कांग्रेस नेतृत्व के सामने चुनौती यह है कि वह सिद्धारमैया और उनके समर्थकों को दरकिनार भी नहीं कर सकता।सिद्धारमैया की राज्य में अच्छी पकड़ है। वे जनाधार वाले नेता हैं। AHINDA (अल्पसंख्यक, पिछड़े और दलित) और ओबीसी वर्गों के बीच वे काफी लोकप्रिय हैं। इसके अलावा सिद्धरमैया की छवि एक साफ-सुथरे नेता की भी है। उनके समर्थकों को नई कैबिनेट में उचित सम्मान नहीं मिला, तो राज्य में अंदरूनी कलह पैदा हो जाएगी, जो कि राज्य में पार्टी के लिए बहुत खतरनाक साबित होगी। कहीं ऐसा न हो कि राज्य में सत्ता हस्तांतरण भविष्य में पार्टी के लिए कोई बड़ी मुसीबत बन जाए, इसलिए कांग्रेस नेतृत्व को सोच-समझकर निर्णय लेने होंगे।








