Opinion: अरुणाचल प्रदेश में सीमा (LAC) पर चीनी सेना (PLA) और भारतीय सुरक्षा बलों के बीच ‘फेस-ऑफ’ (आमने-सामने की स्थिति) बनी हुई है।भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के महानिदेशक शत्रुजीत सिंह कपूर ने एक कार्यक्रम के दौरान जवानों को संबोधित करते हुए कहा कि अरुणाचल प्रदेश में कई जगहों पर दोनों तरफ की सेनाएं आमने-सामने हैं।तनाव की यह स्थिति जुलाई माह से बनी हुई है।
दरअसल, चीन की टेढ़ी चाल के कारण सीमा पर निरंतर तनाव के हालात बनते रहे हैं। यह पहली बार नहीं है जब चीन ने अपनी ओछी हरकत का परिचय दिया, बल्कि अरुणाचल से लेकर उत्तराखंड तक उसके सैनिक कई बार भारतीय क्षेत्र में घुसने की अनाधिकार चेष्टा करते रहे हैं। हालांकि भारतीय जवान उन्हें खदेड़कर वापस भेज देते हैं, लेकिन चीन अपनी चालबाजी पर अंकुश लगाने को तैयार नहीं है।
अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन का खोखला दावा
चीन की भारत विरोधी चालबाजी का नतीजा यह है कि 1962 से उसने भारत के जम्मू-कश्मीर राज्य में लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर अवैध कब्जा कर रखा है। इसके अलावा, 1963 के तथाकथित चीन-पाकिस्तान “सीमा समझौते” के तहत पाकिस्तान ने अवैध रूप से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में 5180 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र चीन को सौंप दिया। चीन अरुणाचल प्रदेश में लगभग 90,000 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र पर अपना दावा करता है। आश्चर्यजनक है कि भारत की ओर से चीन को उच्च स्तरीय स्तर पर साफ शब्दों में बताया जा चुका है कि अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर भारत के अभिन्न और अविभाज्य अंग हैं, इसके बावजूद वह अपनी टेढ़ी चाल चलता आ रहा है। चीन लगातार अरुणाचल प्रदेश को ‘जांगनान’ (Zangnan) यानी दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा मानता है।अरुणाचल प्रदेश के करीब 90,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर चीन का दावा का ऐतिहासिक, कानूनी और व्यावहारिक आधार पर एकदम गलत और निराधार है।दुनिया जानती है कि अरुणाचल प्रदेश के लोग और वहां की सांस्कृतिक पहचान हमेशा से भारत का अंग रही है।
Opinion: शिमला समझौता मानने के लिए तैयार नहीं
चीन की मनमानी का आलम यह है कि वह अंतरराष्ट्रीय नियमों को मानने के लिए भी तैयार नहीं है। उल्लेखनीय है कि भारत और तिब्बत के बीच 1914 में हुए शिमला समझौते के तहत मैकमोहन रेखा को दोनों पक्षों ने आधिकारिक सीमा के रूप में स्वीकार किया था, लेकिन चीन इस समझौते को यह कहकर खारिज करता है कि तब तिब्बत को ऐसा समझौता करने का अधिकार नहीं था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार यह रेखा भारत और तिब्बत के बीच वैध सीमा तय करती है। चीन का कुतर्क है कि समझौते के समय तिब्बत एक स्वतंत्र देश नहीं था और उसे सीमा तय करने का अधिकार नहीं था, जबकि सच्चाई यह है कि 1911 में चीन में किंग राजवंश के पतन के बाद 13 वें दलाई लामा ने 1912 में तिब्बत की स्वतंत्रता की पुष्टि की थी। इसके बाद तिब्बत ने बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के लगभग चार दशकों तक अपने विदेश मामलों और शासन का संचालन स्वयं किया।
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के नियमों को नहीं मानता
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) के नियमों के अनुसार केवल पुराने ऐतिहासिक दावों या जबरन नाम बदलने से किसी क्षेत्र पर संप्रभुता साबित नहीं होती है। इस दृष्टि से चीन द्वारा अरुणाचल प्रदेश के विभिन्न स्थानों के नाम बदलकर ‘मानकीकृत’ (standardise) करने के प्रयास पूरी तरह से अवैध और बनावटी हैं। चीन ने अपनी संप्रभुता दिखाने के लिए समय-समय पर अरुणाचल प्रदेश के विभिन्न स्थानों के नाम बदले, जिसका कि भारत ने कड़ा विरोध किया। सवाल यह है कि चीन द्वारा जगहों, नदियों या पहाड़ों के नाम बदल देने से क्या उन पर उसका अधिकार हो जाएगा, क्या अंतरराष्ट्रीय नियमों के उल्लंघन की उसे मनमानी छूट है?








