Opinion: आईआईटी बॉम्बे के छात्र रवींद्र वाकोडे की आत्महत्या के बाद इस मुद्दे पर किसी राजनीतिक या सामाजिक मोर्चेबंदी को उचित नहीं माना जा सकता है।इसके बजाय अब सामूहिक रूप से एक ऐसे स्थाई समाधान पर विचार किया जाना चाहिए, ताकि फिर कभी किसी छात्र के कालकवलित होने की दुखद खबर सुनने को न मिले।आज इस दिशा में सोचने की बहुत जरूरत है कि आखिर उच्च शिक्षा संस्थानों के छात्र निरंतर आत्महत्या क्यों करते जा रहे हैं? जिनकी आंखों में भविष्य के सुनहरे सपने तैरते हैं, वें क्यों मौत को गले लगाने के लिए विवश हो रहे हैं?
बेहद चिंताजनक स्थिति
आईआईटी बॉम्बे में आत्महत्या का यह कोई पहला मामला नहीं है, बल्कि स्थिति बेहद चिंताजनक है।पूर्व में देश के जाने-माने आईआईटी संस्थानों के छात्र आत्महत्या कर चुके हैं।इनमें आईआईटी हैदराबाद ,खड़गपुर, दिल्ली, कानपुर, मद्रास, वाराणसी जैसे संस्थान शामिल हैं।वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच देश के 23 आईआईटी (IIT) संस्थानों के 45 छात्रों ने आत्महत्याएं की।वर्ष 2022-23 में 6, वर्ष 2023-24 में 16 तो वर्ष 2024-25 के दौरान 13 छात्रों की आत्महत्याएं की।पिछले कुछ माह के दौरान ही आईआईटी बॉम्बे के चार छात्रों ने आत्महत्याएं की।यह सिलसिला यहीं थम जाएगा, इसकी गारांटी फिलहाल कोई नहीं दे सकेगा।
Opinion: विचार-विमर्श की जरूरत
पिछले वर्षों के दौरान आत्महत्या करने वाले छात्र सभी वर्गों के थे।इनमें अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के साथ ही समान्य वर्ग के छात्र भी शामिल थे।एक छात्र आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) से भी था।जब सभी वर्गों के छात्र आत्महत्या करने वालों में शामिल थे, तो इस मुद्दे पर किसी खास वर्ग के पक्ष या विपक्ष में राजनीतिक अथवा सामाजिक मोर्चा खोलने के बजाय यह सोचना ज्यादा बेहतर होगा कि कैसे आपसी-विचार-विमर्श के बाद समस्या का स्थाई समाधान निकाला जाए, ताकि आत्महत्याओं के इस खतरनाक सिलसिले पर हमेशा के लिए विराम लग सके।
मोर्चेबंदी से नुकसान ही होगा
किसी भी गंभीर विषय पर मोर्चेबंदी से पहले यह सोचना जरूरी होता है कि आखिर इसका देश और समाज पर क्या असर पड़ सकता है? इसके क्या नुकसान झेलने पड़ सकते हैं? यदि आईआईटी बॉम्बे के छात्र रवींद्र वाकोडे के साथ अन्याय हुआ है, तो उसे न्याय मिलना ही चाहिए।मामले की जांच भी चल रही है।छात्र के परिजनों ने उसकी आत्महत्या के लिए जिन प्रोफेसर को दोषी ठहराया है, वे भी इस्तीफा दे चुके हैं।ऐसे में किसी भी तरह की मोर्चेबंदी मामले की निष्पक्ष जांच के साथ ही आईआईटी बॉम्बे के शैक्षणिक वातावरण को भी प्रभावित कर सकती है। इससे छात्रों और शिक्षकों का तनाव बढ़ सकता है और उनकी पढ़ाई व रिसर्च वर्क पर बुरा असर पड़ना स्वाभाविक है।लिहाजा मामले की जांच पूरी होने तक धैर्य बनाए रखना होगा।
Opinion: छात्रों को दबावमुक्त रखने पर विचार हो
यह सच है कि राजनीति बहुत कुछ है, लेकिन यह भी सच है कि अकेले राजनीति सबकुछ तय नहीं कर सकती।लिहाजा सरकार इस गंभीर समस्या के समाधान हेतु समाजशास्त्रियों, मनोचिकित्सकों, शिक्षाविदों, छात्रों, अभिभावकों और राजनेताओं की एक उच्चस्तरीय कमेटी गठित कर सकती है। आईआईटी संस्थान भी साल भर में कम से कम दो ऐसे कार्यक्रम आयोजित कर सकते हैं, जिनमें छात्रों के अभिभावकों को बुलाकर उन्हें विशेषज्ञों के द्वारा सलाह दी जा सकती है कि वे कैसे अपने बच्चों को दबावमुक्त रख सकते हैं? ध्यान रहे कि राजनीतिक या सामाजिक मोर्चेबंदी के चलते दुनियाभर में आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों की साख भी प्रभावित हो सकती है।









